नज़रिया: जेएनयू में भगवा पर क्यों हावी है लाल झंडा?

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Image caption जेएनयू छात्र संघ चुनाव जीतने वाले छात्र

देश के मशहूर जवाहरलाल नेहरू विश्वविविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में इस बार फिर वामपंथियों ने अपनी शानदार जीत का परचम लहराया.

अध्यक्ष से लेकर सचिव तक, केंद्रीय पैनल के सभी पदों और कौंसिल की ज्यादातर सीटों पर 'आल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा)', स्टूडेंट्स फेडरेशन आफ इंडिया (एसएफआई) और डेमोक्रेटिक स्टूड़ेंट्स फेडरेशन (डीएसएफ) के वाम-एकता गठबंधन के प्रत्याशियों ने जीत हासिल की.

जेएनयू में वामपंथिय़ों की जीत कोई पहली बार नहीं हुई है. वाम-प्रभाव का यहां लंबा इतिहास है. बीच में यदा-कदा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसे धुर दक्षिणपंथी छात्र संगठन, कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई और शुरू के दौर में 'फ्री-थिंकर्स' जैसे गैर-पार्टी दायरे के संगठनों के प्रत्याशी भी चुनाव जीतते रहे.

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ख़ारिज हुआ टैंक

सबसे अधिक बार जीत का रिकॉर्ड वामपंथियों के नाम है. लेकिन इस बार के छात्रसंघ चुनाव में वामपंथी एकता गठबंधन की शानदार जीत के बेहद ख़ास मायने हैं. नतीजे से पहले, देश की सत्ताधारी पार्टी और आरएसएस के रणनीतिकार इस चुनाव को जेएनयू इतिहास का एक 'टर्निंग प्वॉइंट' मान रहे थे.

उनका आकलन था कि देश में जिस तरह की 'लहर' चल रही है, उससे जेएनयू अछूता नहीं रह सकता. पिछले दो सालों से जेएनयू प्रशासन भी छात्र संघ की राजनीति की धारा को बदलने में जुटा हुआ था. शायद, उसे एक अहम् एजेंडा के तौर पर यह कार्यभार सौंपा गया था.

तभी तो विश्वविद्यालय के कुलपति ने कुछ दिनों पहले कैंपस में 'राष्ट्रवादी विचारों की प्रतिष्ठा और प्रचार' के लिए एक बड़ा युद्धक टैंक रखवाने का प्रस्ताव रखा. निजी टीवी चैनलों पर अपने 'उग्र युद्ध-समर्थक बोल' के लिए विवादास्पद एक पूर्व सेनाधिकारी की मौजूदगी वाले समारोह में इस आशय का ऐलान हुआ.

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'राष्ट्रवादी' प्रशासन

सत्ताधारी खेमे के नेता और संघ प्रचारक अक्सर जेएनयू को 'देशद्रोहियों का अड्डा' बताते रहे. माहौल को 'राष्ट्रवादी' बनाने के लिए प्रशासन की तरफ़ से कैंपस में कभी 'करगिल विजय दिवस' तो कभी 'दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद' के नाम पर बड़े-बड़े आयोजन होते रहे.

छात्र संघ ने कैंपस में टैंक रखने के प्रस्ताव को एक 'घटिया सोच' बताया. बीते दो सालों के दौरान विभिन्न मुद्दों पर प्रशासन और छात्र-शिक्षकों के बड़े हिस्से के बीच लगातार टकराव जारी रहा. वाम-सेक्युलर धारा के संगठनों, छात्रों और यहां तक कि शिक्षकों के खिलाफ भी तरह-तरह के कदम उठाये गए.

वाम संगठनों की गतिविधियों पर तमाम तरह की पाबंदियां थोपी गईं. वामपंथ-समर्थक और दलित-पिछड़े समुदाय के कई छात्रों के ख़िलाफ़ अनुशासनिक कार्रवाई की गई. नतीजे से साफ़ लगता है, जेएनयू छात्रों ने कैंपस में टैंक रखने के प्रस्ताव को सिरे से ख़ारिज किया और कैंपस की छात्र-राजनीति में 'टर्निंग प्वॉइंट' नहीं आने दिया!

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'रणनीति' काम न आई!

वामपंथी छात्र संगठनों का प्रभाव सीमित करने के लिए इस बार जेएनयू प्रशासन खासतौर पर सक्रिय दिख रहा था. सन् 2017 के शैक्षणिक सत्र के लिए उसने अनेक संकायों-विभागों में एमफ़िल-पीएचडी की सीटों में भारी कटौती की, जबकि स्नातक-स्नातकोत्तर कक्षाओं की सीटों में कटौती नहीं हुई.

कैंपस में इसे लेकर भारी बावेला मचा. छात्रसंघ ने आरोप लगाया कि जेएनयू प्रशासन ने दाख़िले के लिए एकेडेमिक कौंसिल की सहमति के बगैर जो फ़ैसला किया, उसके पीछे शासकीय दबाव प्रमुख कारण है.

जेएनयू शिक्षक संघ के अध्यक्ष रह चुके प्रोफेसर चमन लाल के मुताबिक आमतौर पर जेएनयू में वाम धारा के छात्र संगठनों को एमफ़िल-पीएचडी के छात्रों का व्यापक समर्थन मिलता है. उसकी एक बड़ी वजह है कि ऐसे छात्र अपेक्षाकृत समझदार, प्रौढ़ और अनुभवी होते हैं! ऐसे छात्रों का एक हिस्सा स्वयं इसी कैंपस से होता है.

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सीटों में कटौती

एमए पास करने के बाद जेएनयू के अनेक छात्र एमफ़िल-पीएचडी कोर्स में दाख़िला पाते हैं. कैंपस के माहौल में रचे-बसे ऐसे छात्रों में वाम सोच वाले छात्रों की संख्या ज़्यादा होती है. बाहर से आने वाले शोध छात्रों का भी एक हिस्सा वाम खेमे से जुड़ता है.

एक रणनीति के तहत इस साल एमफ़िल-पीएचडी के दाख़िले की सीटों में अभूतपूर्व कटौती हुई. बहाना यूजीसी के फ़रमान का बनाया गया. एकेडेमिक काउंसिल में बहुमत इस कटौती के ख़िलाफ़ था. लेकिन प्रशासन ने अल्पमत की बात मानी.

कई अन्य शिक्षकों और छात्रों ने बताया कि प्रशासन को लगा होगा कि बाहर से आने वाले अपेक्षाकृत युवा छात्र एबीवीपी जैसे संगठन के लिए अनुकूल होंगे, इसलिए स्नातक-स्नातकोत्तर कोर्स में कटौती नहीं हुई. कटौती सिर्फ शोध-छात्रों के दाख़िले में की गई.

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दो-तरफ़ा चुनौती

लेकिन प्रशासन की यह कथित रणनीति भी देश के सत्ताधारी खेमे और कैंपस में एबीवीपी के लिये 'वरदान' नहीं साबित हो सकी. वामपंथी खेमे के सामने एक और बड़ी चुनौती थी. भाजपा-संघ संपोषित एबीवीपी के आक्रामक अभियान के बावजूद उसका अपना खेमा बुरी तरह विभाजित सा था.

विपक्षी-एकता की बात तो दूर रही, वाम-एकता भी पुख्ता नहीं थी. छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और मशहूर वामपंथी छात्र नेता कन्हैया कुमार का संगठन-एआईएसएफ वाम-गठबंधन से बाहर रहा. अध्यक्ष पद के लिए उसने वरिष्ठ भाकपा सांसद डी राजा की बेटी अपराजिता राजा को खड़ा कर दिया.

कन्हैया भी सुश्री राजा के लिये प्रचार कर रहे थे. दूसरी तरफ़, दलित-पिछड़ों के खेमे के प्रतिनिधित्व का दावा करने वाला 'बापसा' नामक छात्र-समूह पूरी ताकत के साथ अपना अलग पैनल लेकर मैदान में उतरा. पिछले चुनाव में ही 'बापसा' ने अपनी धमक से सबको चमत्कृत किया था. इस साल जीतने के लिए उसने पूरी ताक़त लगा दी.

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गौरी लंकेश की हत्या भी बना मुद्दा

लेकिन कहीं न कहीं, उसकी राजनीतिक विश्वसनीयता पर दलित-पिछड़े छात्रों के एक हिस्से में भी कुछ सवाल थे. मसलन, 'बापसा' के नेता यह साफ़ नहीं कर सके कि बहुजन हितों के मद्देनजर आज 'वामपंथियों के कथित अवसरवाद' और 'संघ-भाजपा के कथित फासीवादी मनुवाद' में ज़्यादा ख़तरनाक कौन है?

फिर भी उसके प्रत्याशियों को दलित-पिछड़ों के एक खेमे का उल्लेखनीय समर्थन मिला. एबीवीपी ने जीतने के लिए सबकुछ किय़ा. उसकी जीत सुनिश्चित करने के लिए भाजपा-संघ के नेता भी जुटे हुए थे.

चुनाव के अंतिम चरण में जेएनयू की पूर्व छात्रा रहीं निर्मला सीतारमण के देश का रक्षा मंत्री बनने को भी मोदी सरकार के बड़े क़दम के रूप में प्रचारित किया गया और छात्रों को प्रभावित करने की कोशिश की गई.

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निर्मला सीतारमण का असर!

लेकिन लगता है, एक समय की 'फ्री-थिंकर' निर्मला के रक्षा मंत्री बनने का जेएनयू में उतना असर नहीं पड़ा, जितना बंगलुरु में जानी मानी पत्रकार-लेखिका गौरी लंकेश के नृशंस ढंग से मारे जाने का पड़ा.

गौरी सेक्युलर-लोकतांत्रिक सोच की निर्भीक पत्रकार थीं, जिनसे कर्नाटक में भाजपा-संघ-श्रीराम सेने जैसे संगठनों के नेता बेहद कुपित रहते थे. भाजपा के नेताओं ने उनके ख़िलाफ़ मानहानि का मामला भी दर्ज किया, जिसमें उन्हें सजा हुई.

उन्होंने ऊपर की अदालत में सजा को चुनौती दी थी. जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्षीय डिबेट में गौरी हत्याकांड की भी चर्चा हुई. किसी ने किसी पर आरोप नहीं लगाया पर एबीवीपी बचाव की मुद्रा में दिखी.

वाम खेमे की जीत

इन तमाम कारणों से जेएनयू छात्रसंघ के चुनाव को लेकर देश के सियासी खेमों में इस बार ज़्यादा उत्सुकता थी. एक विवादास्पद कुलपति के ज़रिए जेएनयू प्रशासन पर संपूर्ण वर्चस्व कायम कर चुके संघ-भाजपा खेमे को लग रहा था कि इस बार छात्र-समुदाय के बीच भी वह 'जेएनयू-फतह' कर लेगा.

और सच पूछिये तो वाम-खेमा बचाव और बेचैनी की मुद्रा में था कि सांप्रदायिकता और दक्षिणपंथी उभार के मौजूदा माहौल में वह अपने इस 'मजबूत दुर्ग' को कैसे बचाए!

लेकिन लगता है कि नोटबंदी-जीएसटी के दुष्परिणामों, समाज में बढ़ते सामुदायिक-सांप्रदायिक विभाजन, उत्पीड़न, अपराध, असहमत लोगों के दमन, शिक्षा क्षेत्र में मची घोर अराजकता और सीट-कटौती जैसे पहलू जेएनयू में प्रभावी हो गए.

मौजूदा सत्ता से नाराज छात्रों ने वामपंथी-सेक्युलर खेमे को बेहतर विकल्प माना. यह देश या किसी प्रदेश का नहीं, एक विश्वविद्यालय के छात्रों का फ़ैसला है, जिसे स्वयं केंद्र भी अधिकृत तौर पर देश का सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय मानता है.

ऐसे में मानना होगा कि प्रतिभावान छात्रों के मशहूर कैंपस में यह वाम खेमे की जीत तो है ही, राजनीति के 'पुनरूत्थानवादी भगवा-खेमे' का पुरजोर 'रिजेक्शन' भी है!

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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