नज़रिया: चीन के 'वन बेल्ट वन रोड' का ऐसे जवाब देंगे भारत और जापान?

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जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो अबे भारत की यात्रा पर हैं और नरेंद्र मोदी ने अपने गृहराज्य गुजरात में उनका गर्मजोशी से स्वागत किया.

दोनों नेताओं ने खुली जीप में आठ किलोमीटर लंबा रोड शो किया.

मोदी की महत्वाकांक्षी बुलेट ट्रेन परियोजना के अलावा एक और योजना चर्चा में है. वो है- एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडॉर.

चीन की निगाहें शिंज़ो अबे के दौरे पर लगी हुई हैं. चीनी मीडिया में भी इस दौरे की चर्चा है.

चीनी सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि भारतीय प्रधानमंत्री ने जापान के सामने एशिया अफ़्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का प्रस्ताव रखा है. ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि दोनों देश 'वन बेल्ट वन रोड' की काट ढूंढ रहे हैं.

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भारत और जापान की दोस्ती की वजह चीन?

भारतीय मीडिया में भी कहा जा रहा है कि इस कॉरिडोर पर कोई घोषणा मोदी और अबे कर सकते हैं.

इसके बारे में बीबीसी संवाददाता हरिता काण्डपाल ने अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफेसर हर्ष पंत से बात की. यहां पढ़ें उनका आंकलन-

भारत और जापान के बीच 40 अरब अमरीकी डॉलर की इस परियोजना में सहयोगी बनने की योजना प्रस्तावित है. इस परियोजना का लक्ष्य अफ्रीकी देशों में डेवेलपमेंट पार्टनरशिप करना है, जिसमें जापान की तरफ़ से 30 अरब डॉलर और भारत की तरफ़ से 10 अरब डॉलर का निवेश किया जाएगा.

इस रकम को अफ्रीका में स्थानीय सामुदायिक प्रॉजेक्ट के तहत इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में लगाया जाएगा.

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चीन पिछले कुछ समय से अफ्रीका में अपना प्रभुत्व बढ़ा रहा है. ऐसे में भारत और जापान खुद को डेवलेपमेंटल शक्तियों के तौर पर दिखाना चाहते हैं.

चीन के वन बेल्ट वन रोड प्रॉजेक्ट का जवाब?

चीन का वन बेल्ट वन प्रॉजेक्ट वैश्विक स्तर की योजना है लेकिन भारत और जापान विकास का एक अलग वैकल्पिक मॉडल खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं.

चीन का ओरआरओबी प्रॉजेक्ट वो टॉप -डाउन मॉडल है, जिसमें चीन ने फैसला किया है कि यूरोप से लेकर मध्य पूर्व और अफ्रीका तक किस तरह से निवेश करेगा और क्या आधारभूत ढांचा विकसित करेगा .

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लेकिन भारत और जापान का बॉटम-अप मॉडल होगा जिसमें अफ्रीकी देशों से पूछा जाएगा कि उनकी क्या ज़रूरतें हैं. इस योजना से सिर्फ़ अपना फ़ायदा नहीं देखा जा रहा बल्कि अफ्रीकी देशों की क्षमता भी बढ़ाई जाएगी और वहां पर आर्थिक विकास को बढ़ावा दिया जाएगा.

अफ्रीका पर ध्यान क्यों?

अफ्रीका में आधारभूत ढांचे के विकास की बहुत ज़रूरत है.

अफ्रीकी महाद्वीप में कई अर्थव्यवस्थाएं बेहतर कर रही हैं, वो भी ऐसे समय में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था की सेहत बहुत अच्छी नज़र नहीं आती.

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चीन ने अफ्रीका में कई देशों में बड़े पैमाने पर निवेश किया है.

अफ्रीका में कई चीनी कंपनियां चीन की सरकार की मदद से पैसा लगाती हैं लेकिन वहां पर स्थानीय क्षमताएं विकसित नहीं कर पा रही हैं. चीनी कंपनियां इसे निवेश के अवसर के तौर पर देखती हैं. ऐसे में कहीं न कहीं एक पुश बैक की स्थिति पैदा हो रही है. एक वैकल्पिक मॉडल की ज़रूरत थी, इसलिए भारत और जापान सामने आए हैं.

भारत के भी अफ्रीका के साथ ऐतिहासिक रिश्ते रहे हैं. भारत पहले भी अफ्रीकी देशों में निवेश करता रहा है.

भारत की छवि बदलने की कोशिश

भारत की अब तक की भूमिका विकास के लिए सहायता लेने वाले देश की रही है. लेकिन अब वो इसमें बदलाव करने जा रहा है. भारत चाहता है कि न सिर्फ अन्य देशों की आर्थिक मदद करे बल्कि विकासशील देशों को इस प्रक्रिया में भागीदार भी बना सके.

जापान और भारत एशिया प्रशांत में लोकतांत्रिक देश हैं और दोनों ही विकसित देशों के रूप में उभरने की कोशिश कर रहे हैं.

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जापान तकनीक के क्षेत्र में काफ़ी आगे है और उसके पास संसाधन भी हैं. भारत में नेतृत्व है, जो जापान के पास नहीं है. ऐसे में इन दोनों को मिलाकर एक अहम साझेदारी बन सकती है.

भारत और जापान के द्वीपक्षीय संबंधों में नए भू राजनीतिक समीकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.

दोनों को एशिया प्रशांत में चीन का प्रभाव परेशान करता रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापानी प्रधानमंत्री शिंज़ो अबे के रिश्ते भी काफ़ी घनिष्ठ हैं. इसलिए दोनों देशों का पास आना लाज़िमी है.

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