क्या अमेठी राजनीतिक अखाड़े का शिकार बन गया?

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उत्तर प्रदेश में अमेठी ज़िले की स्थिति ऐसी है कि इस ज़िले का आधिकारिक मुख्यालय भी यहां से क़रीब 12 किमी दूर गौरीगंज में है, लेकिन राजनीतिक तौर पर इस शहर की अहमियत तब से है जब अमेठी ज़िला भी नहीं बना था.

राजनीतिक रूप से अमेठी संसदीय क्षेत्र की पहचान गांधी परिवार के 'गढ़' के रूप में है. 1980 में संजय गांधी के यहां से लोकसभा चुनाव जीतने के साथ ही इस सीट पर अब तक ज़्यादातर गांधी परिवार के ही सदस्य जीतते रहे हैं.

1998 को यदि छोड़ दिया जाए तो तब से इस सीट पर कांग्रेस की कभी हार नहीं हुई है. 1998 में बीजेपी से जीतने वाले डॉक्टर संजय सिंह भी आज कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं.

'वीआईपी क्षेत्र' है अमेठी

क़स्बानुमा अमेठी शहर वैसे तो उत्तर प्रदेश के दूसरे शहरों से कोई बहुत अलग नहीं दिखता लेकिन मुख्य शहर की सीमा से कुछ हटकर देखने पर ये साफ़ मालूम चलता है कि ये कोई 'वीआईपी क्षेत्र' है.

यहां हिन्दुस्तान एयरोनॉटिकल लिमिटेड यानी एचएएल की इकाई, इंडोगल्फ़ फ़र्टिलाइज़र्स, बीएचईएल प्लांट, इंडियन ऑयल की यूनिट के अलावा तमाम शैक्षणिक और तकनीकी संस्थान हैं. आमतौर पर ऐसे संस्थान महानगरों या फिर उनके पास ही स्थापित किए जाते हैं.

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यही नहीं, वीआईपी क्षेत्र होने के नाते फ़ुरसतगंज में हवाई पट्टी तो है ही, विमान प्रशिक्षण स्कूल भी है. इसके अलावा राजीव गांधी पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट जैसे उच्च स्तरीय संस्थान की मौजूदगी इस इलाक़े के राजनीतिक प्रभुत्व को बयां करती है.

छोटे-मोटे कारखानों की बात की जाए तो स्थानीय लोगों के मुताबिक अकेले जगदीशपुर में कम से कम तीन सौ प्लांट होंगे. जगदीशपुर यहां का औद्योगिक क्षेत्र है.

क्या विकास से संतुष्ट हैं जनता?

बावजूद इसके, ऐसा नहीं है कि विकास के नाम पर यहां के लोग बहुत संतुष्ट हों या फिर विकास की योजनाएं यहां कुछ ज़्यादा धरातल पर दिखती हों.

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अभी विधानसभा चुनाव के दौरान ही अमेठी विधानसभा के परसौली गांव के लोगों ने ये कहते हुए मतदान का बहिष्कार कर दिया कि उनके इलाक़े में तीस साल से सड़क नहीं बनी है और तमाम दूसरी बुनियादी सुविधाओं से भी यह गांव वंचित है.

देखा जाए तो परसौली अमेठी का इकलौता गांव नहीं है बल्कि बुनियादी सुविधाओं से और भी गांव वंचित हैं, सड़कों की हालत यहां भी वैसी है जैसी कि राज्य के दूसरे इलाक़ों में और सरकारी योजनाओं के क्रियान्यवयन में यह क्षेत्र कोई अतिशयोक्ति वाला उदाहरण पेश नहीं करता.

राजीव गांधी के बाद रुक गया विकास

अमेठी के एक बुज़ुर्ग व्यक्ति राम लाल कहते हैं, "राजीव गांधी के समय में यहां का विकास ख़ूब हुआ, लेकिन उसके बाद कुछ नहीं हुआ. यहां जितनी बड़ी-बड़ी चीजें आप देख रहे हैं, सब उन्हीं के समय की हैं. उस समय चलने के लिए सड़कें और सिंचाई के लिए नहरें भी बनी थीं, लेकिन रख-रखाव न होने के चलते अब सब नष्ट हो रहे हैं."

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रामलाल बताते हैं कि उनके इलाक़े में सड़कें तब भी इतनी अच्छी थीं जब बहुत से क़स्बों और गांवों में सड़कें थीं ही नहीं, लेकिन अब सड़कों का भी बुरा हाल है.

पास में ही खड़े एक नौजवान वीरेंद्र सिंह जौनपुर से आए थे. उनके आने का मक़सद पूछा तो बोले, "संजय गांधी अस्पताल में अपनी आँख दिखाने आए हैं, क्योंकि यहां इलाज अच्छा होता है और हमारे शहर में इतनी अच्छी सुविधा नहीं है."

वीरेंद्र सिंह के साथ खड़े उनके कुछ और साथी कहते हैं कि जौनपुर, प्रतापगढ़, रायबरेली और सुल्तानपुर से सैकड़ों की संख्या में मरीज यहां आते हैं.

क्यों धीमा हो गया अमेठी का विकास?

लेकिन सवाल उठता है कि अमेठी के विकास की गति इतनी धीमी कैसी हो गई जबकि गांधी परिवार ही अभी भी यहां का प्रतिनिधित्व करता है और इस दौरान कुछ समय को छोड़ दिया जाए तो केंद्र में भी कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में ही सरकार भी थी.

हां, राज्य में भले ही 1989 के बाद कांग्रेस की सरकार नहीं बनी.

अमेठी के रहने वाले समाजसेवी बब्बन द्विवेदी कहते हैं, "विकास हुआ है. विकास की तमाम योजनाएं बतौर सांसद राहुल गांधी भी ले आए, लेकिन जब से केंद्र में बीजेपी सरकार बनी है, वो तमाम योजनाओं को यहां से हटा कर दूसरी जगहों पर ले जा रही है और जो योजनाएं चल रही हैं उनकी सहायता कम कर दे रही है."

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बब्बन द्विवेदी का सीधे तौर पर कहना है कि अमेठी का विकास राजनीति की भेंट चढ़ गया है. द्विवेदी उन्हीं तमाम योजनाओं को गिनाते हैं जिनका ज़िक्र कई बार राहुल गांधी संसद तक में कर चुके हैं. इन योजनाओं में मेगा फ़ूड पार्क, हिंदुस्तान पेपर मिल, आईआईआईटी, होटल मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट, तिलोई में 200 बेड का हॉस्पिटल, गौरीगंज में बनने वाला सैनिक स्कूल प्रमुख हैं.

इनमें से कई योजनाओं को 2014 के बाद केंद्र सरकार ने या तो रद्द कर दिया या फिर इन्हें हटाकर कहीं और स्थानांतरित कर दिया. आईआईआईटी यानी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंफ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी में तो 11 साल से पढ़ाई हो रही थी, बावजूद इसके इसे यहां से हटाकर इलाहाबाद के कैंपस में स्थानांतरित कर दिया गया और क़रीब 200 छात्रों को भी ज़बरन वहां भेज दिया गया.

इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस ने सड़क से लेकर संसद तक शोर मचाया था. लेकिन अमेठी के बीजेपी ज़िला अध्यक्ष दयाशंकर पांडेय योजनाओं को यहां से हटाने की बात को 'कोरा झूठ' करार देते हैं.

वो कहते हैं, "राहुल गांधी ने एक काम यहां नहीं किया है और इन योजनाओं के नाम पर सिर्फ़ ज़मीन हड़पने का काम किया है. जहां तक आईआईआईटी का सवाल है तो ये संस्थान अमेठी वालों के किसी काम का नहीं था. यहां बाहर से आकर लोग पढ़ते थे. उसे हटाकर अब आंबेडकर विश्वविद्यालय का सेटेलाइट कैंपस चलाया जा रहा है."

दयाशंकर पांडेय दबे मन से ये तो स्वीकार करते हैं कि राजीव गांधी के समय कुछ काम हुआ था. वे कहते हैं, "अमेठी में जो कुछ भी काम हुआ है वो माननीय सांसद वरुण गांधी के पिता और माननीय मंत्री मेनका गांधी के स्वर्गीय पति संजय गांधी ने शुरू कराए थे. हां, उन्हें पूरा कराने का काम ज़रूर राजीव गांधी ने किया."

बीजेपी क्यों नहीं जीत पाई अमेठी?

अमेठी के स्थानीय लोग बताते हैं कि भारतीय जनता पार्टी को इस बात का मलाल है कि वो मोदी लहर में भी अमेठी और रायबरेली की सीटें क्यों नहीं जीत पाई?

इसीलिए वो उन तमाम कामों को लोगों की निग़ाह से ग़ायब करना चाहती है जो कि राजीव गांधी, सोनिया गांधी या फिर राहुल गांधी के प्रयासों से किए गए हैं.

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अमेठी में ही एक गांव के प्रधान मोहम्मद अफ़ज़ल कहते हैं, "गांधी परिवार के लोगों ने जो काम किए हैं, वो दिख रहे हैं. इतनी फ़ैक्ट्रियों के चलते हज़ारों लोगों को रोज़गार मिला हुआ है. लेकिन बीजेपी चाहती है कि वो उन पर अपनी नेम प्लेट लगा दे ताकि लोग भूल जाएं कि ये सब काम किसने किए हैं."

मोहम्मद अफ़ज़ल तो यहां तक कहते हैं कि अमेठी संसदीय क्षेत्र में तो विपक्ष कभी लड़ने लायक स्थिति में नहीं था लेकिन पिछले चुनाव में जब से स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को टक्कर दी है तो पार्टी की उम्मीदें कुछ ज़्यादा बढ़ गई हैं.

बहरहाल, स्थानीय लोगों की मानें तो जिस तरह से इस क्षेत्र की पहचान 'वीआईपी क्षेत्र' के रूप में है तो इसका उन्हें फ़ायदा भी मिला है और नुकसान भी.

अमेठी के एक विद्यालय में पढ़ाने वाले दिनेश शुक्ल कहते हैं, "कुछ न कुछ कमियां हर जगह रहती हैं, वो यहां भी हैं. लेकिन ये कहना कि यहां कुछ नहीं हुआ है, ये लोगों की आँखों में धूल झोंकने जैसा है. ये ज़रूर है कि पिछले कुछ समय से चल रही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और आरोप-प्रत्यारोप की क़ीमत यहां के लोगों को चुकानी पड़ रही है और विकास कार्य ठप हो गए हैं."

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