नजरियाः बीजेपी का अनफिनिश्ड एजेंडा है अमेठी

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विधानसभा चुनाव गुजरात में होने वाला है पर कांग्रेस और बीजेपी की राजनीतिक लड़ाई उत्तर प्रदेश के अमेठी में हो रही है.

गुजरात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का गढ़ है तो अमेठी गांधी परिवार का अब तक सुरक्षित किला.

गांधी परिवार से अमेठी का हो रहा मोहभंग?

अमेठी राजनीतिक अखाड़े का शिकार बन गया?

बीजेपी vs कांग्रेस

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Image caption अमेठी में राहुल गांधी

राहुल गांधी गुजरात में मोदी-शाह को चुनौती दे रहे हैं. जवाब में अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और स्मृति ईरानी ने मंगलवार को अमेठी से राहुल गांधी और कांग्रेस को ललकारा है.

राहुल गांधी गुजरात के विकास का मजाक उड़ाते हुए कह रहे हैं कि विकास पागल हो गया है तो अमित शाह पूछ रहे हैं तीन पीढ़ियों से गांधी परिवार को जिताने वाले अमेठी के लोग विकास के लिए क्यों तरस रहे हैं.

कांग्रेस को लग रहा है कि गुजरात में बीजेपी के किले को ढहा दिया तो 2019 का रास्ता खुल सकता है. गुजरात में पाटीदार आँदोलन, दलितों की नाराज़गी और पिछड़े वर्ग के एक हिस्से का आंदोलन और बाइस साल की ऐंटी इन्कम्बेंसी, सब मिलाकर जीत का फार्मूला बनाते हैं.

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पर गुजरात की टूटी-फूटी कांग्रेस इस बात से खुश लग रही है कि दो दशक बाद पहली बार वह बीजेपी से लड़ने की स्थिति में है.

राहुल गांधी ने विकास के मुद्दे पर गुजरात में चुनौती दी है तो बीजेपी देश और गुजरात के लोगों को दिखाने की कोशिश कर रही है कि हमारे विकास की आलोचना करने वाले राहुल गांधी और उनके परिवार ने अपने घर में विकास का कैसा मॉडल तैयार किया है.

अमेठी कांग्रेस की दुखती रग

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अमेठी, कांग्रेस और गांधी परिवार की दुखती रग है. इस लोकसभा क्षेत्र में गांधी परिवार की गिरती लोकप्रियता एक ऐसी वास्तविकता है जिसको जानते हुए भी दोनों ही स्वीकार नहीं करना चाहते.

2014 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी के सामने बीजेपी ने बाहरी उम्मीदवार स्मृति ईरानी को खड़ा किया. चुनाव जैसे जैसे आगे बढ़ा कांग्रेस को पसीना छूटने लगा. आखिर में राहुल गांधी को खुद मोर्चा संभालना पड़ा.

यह सब इसके बावजूद कि उनकी बहन और कांग्रेस की भविष्य की उम्मीद प्रियंका गांधी उनकी चुनाव एजेंट थीं. सोनिया गांधी और राबर्ट वाड्रा तक सबने चुनाव प्रचार किया.

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नतीजे के बाद चर्चा इस बात की थी कि राहुल गांधी हारते हारते जीत गए या स्मृति ईरानी जीतते जीतते हार गईं. पर दो तथ्यों का नजरअंदाज नहीं किया सकता. एक, स्मृति ईरानी चुनाव हार गईं और दूसरा, राहुल गांधी की जीत का अंतर बहुत घट गया. इसके बावजूद कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने उम्मीदवार नहीं खड़ा किया.

समाजवादी पार्टी ने तो राहुल गांधी का समर्थन भी किया. उस समय राज्य में समाजवादी पार्टी सरकार होने का भी राहुल गांधी को फायदा मिला.

गांधी परिवार कुछ देने की स्थिति में नहीं

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चुनाव हारने के बाद स्मृति ईरानी ने अमेठी के लोगों से वादा किया कि वे चुनाव भले ही हार गई हैं पर अमेठी से नाता नहीं तोड़ेंगी. पिछले साढ़े तीन साल में ईरानी के अमेठी दौरे राहुल गांधी से ज्यादा नहीं तो कम तो नहीं ही हुए हैं. केंद्र की तमाम योजनाएं लेकर वे अमेठी जाती रहीं. अब राज्य में भी बीजेपी की सरकार है तो उनके हाथ में देने के लिए बहुत कुछ है.

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लोकसभा चुनाव और फिर 2017 के विधानसभा चुनाव में अमेठी के लोगों में यह खूब चर्चा रही कि गांधी परिवार अब कुछ देने की स्थिति में तो है नहीं. उस पर सितम यह कि क्षेत्र के लोगों से मिलते भी नहीं.

कई कांग्रेस समर्थकों ने तो सीधे प्रियंका से यह बात कही कि दीदी आप चुनाव के समय ही दिखाई देती हैं. प्रियंका के पास कोई जवाब नहीं था. उन्होंने यह कहकर बात को टाला कि उसके बाद आउंगी तो बहुत विवाद हो जाएगा. इशारा शायद उनके राजनीति में आने की चर्चाओं की तरफ था.

अमेठी में प्रियंका को काले झंडे

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Image caption प्रियंका गांधी

2017 के विधानसभा चुनाव में पहली बार गांधी परिवार के किसी व्यक्ति (प्रियंका) को रायबरेली में काले झंडे दिखाए गए. विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से समझौते के बावजूद अमेठी संसदीय क्षेत्र (अमेठी जिले में विधानसभा की चार ही सीटें हैं) की पांच में से चार सीटें बीजेपी ले गई.

एक सवाल जरूर उठता है कि बीजेपी के नेता बार बार अमेठी क्यों जा रहे हैं.

दरअसल अमेठी 2014 लोकसभा चुनाव का बीजेपी अनफिनिश्ड एजेंडा है.

2019 में अमेठी में राहुल गांधी की हार कांग्रेस और गांधी परिवार का मनोबल तोड़ने में जो भूमिका निभाएगी वह कोई और हार नहीं. बीजेपी और स्मृति ईरानी को लगता है कि अमेठी में 2014 की हारी हुई बाजी 2019 में जीती जा सकती है.

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बीजेपी के इस आक्रामक प्रचार से कांग्रेस में चिंता है. राहुल गांधी के कुछ करीबी नहीं चाहते कि वे अमेठी से चुनाव लड़ें. पर सीधे कह नहीं सकते.

इसलिए एक सुझाव दिया गया कि पार्टी का अध्यक्ष पद संभालने के बाद वे घोषणा कर दें कि 2019 लोकसभा का चुनाव वे नहीं लड़ेंगे और अब बाकी बचा समय पार्टी को सत्ता में वापस लाने में लगाएंगे. पर इस प्रस्ताव को यह कहकर रद्द कर दिया गया कि इससे मैदान से भागने का संदेश जाएगा.

राहुल के लिए अमेठी का दुर्ग बचाना कठिन

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Image caption स्मृति ईरानी

इसलिए 2019 के लोकसभा चुनाव तक अमेठी खबरों में रहेगा. पिछली बार स्मृति ईरानी ऐन वक्त पर चुनाव में उतरी थीं. तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष ने एक दिन अचानक उन्हें फोन किया और सीधे पूछा लोकसभा चुनाव लड़ोगी. स्मृति ने पूछा कहां से. जवाब मिला अमेठी से. स्मृति ने कहा बताती हूं. स्मृति ने तो फिर हां कर दी पर बात आगे नहीं बढ़ी.

दरअसल पार्टी अमेठी से स्मृति और रायबरेली से उमा भारती को चुनाव में उतारना चाहती थी. पर उमा भारती चाहती थीं कि वे झांसी से भी उम्मीदवार रहें. इसलिए उनका नाम कट गया.

उसके बाद ही स्मृति से चुनाव लड़ने के लिए कहा गया. 2019 में उनकी दावेदारी पांच साल पुरानी होगी. राज्य सरकार की ताकत भी होगी. इसलिए राहुल गांधी के लिए अमेठी का दुर्ग बचाना 2014 से भी ज्यादा कठिन होगा.

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