नज़रिया: क्या वाकई संघ से हमदर्दी रखते थे सरदार पटेल?

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सरदार पटेल पर सबसे बड़ा आरोप लगता है कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पक्षधर थे. सरदार को संघ का बचाव करने वाले संघ समर्थक के तौर पर जाना जाता है.

हिंदू महासभा की स्थापना 1915 में और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई. लेकिन ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि उस समय वल्लभभाई इस विचारधारा के प्रति आकर्षित हुए थे.

इन संगठनों के बारे में सरदार ने विभाजन के दौरान और ख़ासकर गांधी की हत्या के बाद अपने विचार ज़ाहिर किए थे.

गांधी ही हत्या का जश्न

गांधी जी का मानना था कि सांप्रदायिक हिंसा की स्थिति में हिंदुओं को अहिंसक प्रतिरोध करना चाहिए और अगर ऐसा न हो सके तो मर मिटना चाहिए.

गांधी जी का आदर्श था कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच की दूरी कम करने की ज़िम्मेदारी हिंदुओं की है.

लेकिन सरदार पटेल मुस्लिमों के प्रति हिंदुओं के विशेष कर्तव्य वाली बात में गांधी या नेहरू के विचारों के साथ नहीं थे.

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सरदार इस बात को जायज़ मानते थे कि संघ की शाखाओं में अनुशासन और स्वरक्षण के पाठ सिखाए जाएं. मगर नेहरू को संघ की इस नीति में फ़ासीवाद नज़र आता था.

सरदार ने संघ को गांधी की हत्या के तुरंत बाद प्रतिबंधित नहीं किया था. मगर संघ ने कुछ ठिकानों पर गांधी की हत्या का जश्न मनाया, यह पता लगने पर ही उन्होंने यह कदम उठाया.

इसके बावजूद संघ को जितना नापसंद नेहरू करते थे, सरदार कभी संघ को उतना नापसंद नहीं कर पाए.

संघ पर प्रतिबंध

गांधी की हत्या के बाद हिंदू महासभा और संघ के कार्यकर्ताओं पर हमले हुए. उस दौरान हमला करने वालों पर नरमी दिखाने के लिए उन्होंने बम्बई सरकार के मुख्यमंत्री को फटकार लगाई थी.

सरदार के इस रवैये को संघ या हिंदुत्व के समर्थन में भी देखा जा सकता है. ठीक ऐसे ही इस रवैये को ऐसे भी देखा जा सकता है कि वह क़ानून की हद से बाहर जाकर कोई कार्रवाई नहीं करना चाहते थे.

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व्यक्तिगत तौर पर सरदार की मुस्लिमों से दूरी परंपरागत थी.

सांप्रदायिक राजनीति और धर्म आधारित बंटवारे ने इसे और मज़बूत किया होगा. लेकिन इस दूरी को किस हद तक मुस्लिम द्वेष या संघ परिवार के साथ वैचारिक समानता माना जा सकता है, यह सोचने वाली बात है.

संघ पर प्रतिबंध लगने के बाद अलग-अलग तरह से चल रही संघ की गतिविधियों और उसके प्रचार पर नेहरू ने चिंता व्यक्त की थी. तब सरदार ने उन्हें लिखा था -

"ऐसी एक भी चीज़ नहीं चलने दी गई है जो आरएसएस की अब तक की गतिविधियों से मेल खाए. मगर मुख्य दुविधा यह है कि कुछ प्रांतों में पकड़े गए आरएसएस के लोगों को हाई कोर्ट ने छोड़ दिया है. अगर ऐसी परिस्थिति को सुलझाने के लिए हम सत्ता का इस्तेमाल करते हैं तो हम पर नागरिकों की आज़ादी के हनन का आरोप लग सकता है." - 4 मई, 1948

गांधी की हत्या में संघ की कोई भी भूमिका नहीं है, इसकी तकनीकी सच्चाई सरदार ने स्पष्ट शब्दों में नेहरू के सामने रखी. मगर इसी मुद्दे पर सरदार श्यामा प्रसाद मुखर्जी से भी भिड़े थे.

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सरदार और श्यामा प्रसाद मुखर्जी

नेहरू के संघ विरोधी रवैये की तरह मुखर्जी के संघ के प्रति उत्साह को खारिज करते हुए सरदार ने मुखर्जी को लिखा था-

"आरएसएस और हिंदू महासभा के बारे में मैं कहना चाहता हूं कि गांधी जी की हत्या का मामला अदालत में है. इसलिए इन दो संस्थाओं का इसमें हाथ है या नहीं, इस बारे में मैं कुछ भी नहीं कहना चाहता. मगर मेरे पहले के बयान इस बात का समर्थन करते हैं कि इन दो संस्थाओं, खासकर आरएसएस की गतिविधियों के कारण देश में ऐसा वातावरण बना, जिसकी वजह से ऐसी करुण घटना घटी."

"आरएसएस की गतिविधियां सरकार और राज्य के अस्तित्व के लिए जोखिम भरी थीं. रिपोर्ट्स बताती हैं कि ऐसी गतिविधियां बंद होने के बावजूद खत्म नहीं हुईं. समय के साथ-साथ आरएसएस का संगठन और अवज्ञा करता जा रहा है. उनकी विद्रोही गतिविधियां बढ़ती जा रही हैं.'' - 18 जुलाई, 1948

मुखर्जी ने सरदार को भेजे पत्र में मुस्लिमों पर टिप्पणी की थी. इसपर ऊपर वाले पत्र में सरदार ने कहा था, "मैं आपसे सहमत हूं कि भारत में कुछ तत्वों का हिस्सा होने से जोखिम बढ़ जाता है. हम सुरक्षा के लिए ऐसे कदम उठा रहे हैं, जो देश की धर्मनिरपेक्षता के अनुरूप हों."

हिंदू राष्ट्र का विचार

नेहरू को शक था कि गांधी की हत्या आरएसएस के किसी बड़े एजेंडे का हिस्सा थी और यह एजेंडा अब तक सामने नहीं आया है. इसके ऊपर सरदार ने कड़ी छानबीन के बाद लिखा था-

"अभियुक्तों की गवाही से स्पष्ट होता है कि आरएसएस की इसमें कोई भूमिका नहीं थी. सावरकर के नेतृत्व वाली हिंदू महासभा के एक धड़े ने इस साज़िश को गढ़ा था और अंजाम दिया था. आरएसएस और महासभा के जो लोग गांधी जी की विचारधारा और नीतियों के विरोधी थे, उन्होंने इस हत्या का स्वागत किया था. मगर इससे ज्यादा आरएसएस या हिंदू महासभा के और किसी व्यक्ति को. हमारे पास जो सबूत हैं, उनके आधार पर, इससे जोड़ना सही नहीं है. आरएसएस कई दूसरे पापों और गुनाहों के लिए जवाबदेह है, मगर इस पाप के लिए नहीं." -27 फरवरी, 1948

सरदार के इस बयान को संघ परिवार के लिए क्लीन चिट कहने वालों को श्यामाप्रसाद मुखर्जी को लिखा सरदार का पत्र याद रहना चाहिए और सरदार की सावरकर के प्रति राय भी.

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संघ की हिंदू राष्ट्र की या मुस्लिम विरोधी विचारधारा सरदार को आकर्षित नहीं करती थी.

नेहरू संघ के सांप्रदायिक उकसावे से भड़के हुए थे, जबकि सरदार सांप्रदायिक हिंसा में जल रहे देश में संघ के लोगों द्वारा हिंदू और सिखों को बचाने की कोशिश को देख रहे थे.

सरदार की कुछ शर्तें

वास्तव में सरदार ने हिंदू राष्ट्र के विचार को पागलपन भरा ख्याल करार दिया था.

वह चाहते थे कि हिंदू हित की राजनीति की बात करने वाले लोगों को खारिज करने के बजाय उन्हें कांग्रेस में लाकर राष्ट्रहित के काम में जुटा देना चाहिए. हिंदू महासभा और संघ के लोगों से सरदार ने इस संबंध में अपील भी की थी.

गांधी की हत्या के करीब डेढ़ साल बाद तक संघ पर चले प्रतिबंध को सरदार की मंजूरी के बाद कुछ शर्तों के साथ खत्म कर दिया गया था.

राजमोहन गांधी ने अपनी पुस्तक 'सरदार: एक समर्पित जीवन' में इन शर्तों का जिक्र किया है-

संघ अपना संविधान बनाए और उसे प्रकाशित करे. सांस्कृतिक गतिविधियों में ही संघ काम करे. हिंसा और गोपनीयता का त्याग करे. भारत के ध्वज और संविधान के प्रति वफ़ादार रहने की शपथ ले और लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाए.

संघ ने इनमें से कितनी शर्तों का यथावत पालन किया है, यह देखने के लिए सरदार जिंदा होते तो?

इतिहास में ऐसे 'जो' और 'तो' के मायने नहीं होते. लेकिन सरदार और संघ के संबंध को वर्तमान राजनीतिक स्थिति में तौलने के बदले उस समय की राजनीतिक, सामाजिक, सांप्रदायिक और कानून व्यवस्था की परिस्थितियों के संदर्भ में तौला जाए, तभी हम सच्चाई के और नजदीक पहुंच सकते हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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