महिला थाना बेहतर या थाने में महिला डेस्क?

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क्या आप जानते हैं कि देश में कुल कितने पुलिस स्टेशन हैं?

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...और महिला थाने कितने हैं?

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ब्यूरो ऑफ़ पुलिस रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट के ये आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के साथ बढ़ते अपराधों को ध्यान में रखें तो उनसे निबटने के लिए महिला थानों की संख्या बहुत कम है.

महिला थाने बनाए जाने के पीछे मक़सद ये था कि औरतें खुलकर अपनी बात पुलिस के सामने रख सकेंगी और पुलिस उन पर तेज़ी से कार्रवाई करेगी.

महिलाओं को इससे कितनी मदद मिल रही है?

महिला थाने और सामान्य पुलिस थानों के काम करने का तरीका समझने के लिए बीबीसी ने दो पुलिस थानों का मुआयना किया.

दिल्ली से सटे नोएडा का महिला थाना और ग़ाज़ियाबाद के इंदिरापुरम का सामान्य पुलिस स्टेशन.

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महिला पुलिस थानों में यौन हिंसा, दहेज के लिए अत्याचार, घरेलू हिंसा आदि की शिकायत दर्ज कराई जा सकती है.

हालांकि क़ानून के मुताबिक दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा को छोड़कर बाक़ी हर तरह की हिंसा और उत्पीड़न के लिए कार्रवाई संबंधित थाने में ही होती है, महिला थाने में नहीं.

हां, महिला थाने में एफ़आईआर ज़रूर कराई जा सकती है. ऐसे में इनकी उपयोगिता पर सवाल उठने लाज़मी हैं.

अगर कोई महिला यौन उत्पीड़न की शिकायत लेकर महिला थाने जाए तो उसे वहां क्या मदद मिलेगी?

"हम पीड़िता की बात सुनेंगे और पता करेंगे कि वो किस तरह की कार्रवाई चाहती है'', नोएडा महिला थाने की एसएचओ अंजू सिंह तेवतिया सधा हुआ ज़वाब देती हैं.

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उन्होंने बीबीसी को बताया कि आम तौर पर हमारे यहां रोज 8-10 मामले आते हैं. इनमें से ज़्यादातर 'पति-पत्नी के झगड़े' होते हैं.

पूछने पर पता चला कि दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा जैसे मामलों को वो 'पति-पत्नी का झगड़ा' कह रही हैं.

समझौता कराने पर ज़ोर

उन्होंने बताया,''हम पारिवारिक मामलों पर फ़ोकस करते हैं क्योंकि उनमें समझौते का स्कोप ज़्यादा होता है. हम ये झगड़े अक्सर सुलझा भी देते हैं. ऐसा कम ही होता है जब बात तलाक़ तक पहुंचे.''

वैसे तो महिला थाने में तैनात पुलिसकर्मियों को 'काउंसलिंग' की कोई पेशेवर ट्रेनिंग नहीं मिलती लेकिन उनका कहना है कि वो काम करते-करते ये चीज़ें सीख लेते हैं.

वो बताती हैं कि अमूमन यौन उत्पीड़न और बलात्कार जैसे मामलों को सम्बन्धित थाने में ट्रांसफ़र कर दिया जाता है क्योंकि महिला थानों में लोग कम होते हैं और सुविधाएं भी.

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ऐसे में अगर इन मामलों में पीड़िता को दूसरे थाने का रुख करना ही पड़ेगा तो वो पहले महिला थाने क्यों जाएगी?

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उन्होंने कहा,''हम उन्हें ये भरोसा दिलाते हैं कि क़ानून उनके साथ है. इससे उनमें हिम्मत आती है और वो आगे की लड़ाई के लिए तैयार हो जाती हैं.''

मुमकिन है कि कुछ महिला थानों में प्रभावी ढंग से काम होता हो लेकिन नोएडा के थाने में तो ऐसा कुछ नज़र नहीं आया.

अब बात करते हैं इंदिरापुरम पुलिस स्टेशन की.

एफ़आईआर डेस्क पर बैठे कांस्टेबल अनंग पाल राठी ने बताया कि यहां रोज़ तक़रीबन 25-20 शिकायतें आती हैं. इनमें महिलाओँ के साथ हिंसा के मामले सिर्फ़ तीन-चार ही होते हैं.

यहां आई संगीता बताती हैं कि उन्होंने अपनी बेटी राधा के साथ हो रहे घरेलू हिंसा की शिकायत महिला थाने में दर्ज करवा चुकी हैं.

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उन्होंने कहा,"हमारे वकील ने सुझाव दिया कि हमें अपने इलाक़े के थाने में भी एफ़आईआर करानी चाहिए, इसलिए हम यहां आए हैं.''

संगीता की बेटी राधा को एक मुस्लिम युवक से प्यार था. वो बताती हैं,''हमने इनकी शादी धूमधाम से कराई. लेकिन बेटी को ससुराल गए एक महीने भी नहीं हुए कि मेरा दामाद उसे प्रताड़ित करने लगा.''

राधा का आरोप है कि उनका पति उन पर इस्लाम क़बूल करने का दबाव डाल रहा है. उनका कहना है कि इनकार करने पर वो उन्हें मारता-पीटता है.

उन्होंने बताया,"वो चाहता है कि मैं अपने मां-बाप से सारे रिश्ते तोड़कर मुसलमान बन जाऊं वर्ना वो दूसरी शादी कर लेगा."

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पूछने पर पता चला कि राधा के वकील ने महिला थाने में चिट्ठी भेजी थी. उसके कुछ दिनों बाद उनके पति के पास थाने से फ़ोन गया.

राधा और उनके पति को 11 नवंबर को 'काउंसलिंग' के लिए थाने में बुलाया गया है.

रवैये में अंतर

जवाब में संगीता कहती हैं, "हमारे वकील ने कहा था कि महिला थाने में काम बहुत धीरे होता है. महीनों तक काउंसलिंग ही चलती है. यहां तुरंत एफ़आईआर हो गई. उसे जल्दी ही गिरफ़्तार करने की बात भी कही है.''

यानी महिला थाने और बाक़ी पुलिस थानों के काम करने का तरीके और पुलिसकर्मियों के रवैये में बड़ा अंतर है.

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महिला थाना जहां समझौता कराने पर ज़ोर देते हैं वहीं सामान्य पुलिस स्टेशनों में तुरंत शिकायत दर्ज करने और क़ानूनी कार्रवाई का चलन है.

महिला थाने में औरतों को काउंसलिंग मिलती है मगर क़ानूनी कार्रवाई नहीं. वहीं, बाक़ी पुलिस स्टेशनों में एफ़आईआर तो होती है लेकिन काउंसलिंग नहीं मिलती.

कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव (सीएचआरआई) की रिपोर्ट में पाया गया अलग महिला थानों की बजाय हर थाने में महिला डेस्क बनाया जाना बेहतर रास्ता साबित हो सकता है.

इससे महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के प्रति सभी पुलिसकर्मियों (महिला और पुरुष) की संवेदनशीलता बढ़ाने में मदद मिलेगी.

साथ ही शिकायतकर्या महिलाओं को दूर-दराज़ बने महिला थानों तक जाने की परेशानी भी नहीं उठानी पड़ेगी.

रही बात काउंसलिंग और क़ानूनी कार्रवाई की तो यह तय करने का हक़ महिला को दिया जाना चाहिए कि वो क्या चाहती है.

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