सुप्रीम कोर्ट: प्रशांत भूषण पर अवमानना की कार्रवाई नहीं

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सुप्रीम कोर्ट ने लखनऊ के एक मेडिकल कॉलेज से संबंधित भ्रष्टाचार के मामले की जाँच एक पूर्व न्यायाधीश से कराने की मांग करने वाली कामिनी जायसवाल और प्रशांत भूषण की याचिका खारिज कर दी है.

प्रशांत भूषण का कहना था कि भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को इन मामलों पर कोई प्रशासनिक या न्यायिक निर्णय नहीं लेना चाहिए क्योंकि वे इस मामले में एक पक्ष हो सकते हैं.

जस्टिस आरके अग्रवाल, जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस एएम खानविलकर की बेंच ने फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि ये मामला अपमानजनक है और ये अवमानना का केस बनता है, लेकिन कोर्ट अवमानना की कार्रवाई नहीं करेगा.

जस्टिस अरुण मिश्रा ने आदेश के ऑपरेटिव हिस्से को पढ़ते हुए कहा, "आरोप अपमानजनक और अवमानना के लायक हैं, लेकिन हम कोई कार्रवाई नहीं करेंगे. हमें उम्मीद है कि बेहतर समझ की जीत होगी, इस संस्थान की महानता के लिए हम लोगों को मिलकर काम करना है. हम ये याचिका ख़ारिज करते हैं और उम्मीद करते हैं कि मामला यहां ख़त्म हो गया."

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विवाद

सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने ये माना कि इस पूरे विवाद से संस्थान का नुकसान हो रहा है, लिहाज़ा भविष्य में कोर्ट की गरिमा के लिए मिलकर काम करेंगे. सुप्रीम कोर्ट की ओर से ये भी कहा गया कि इस मामले में पहले से याचिका के लंबित होने के बाद भी जिस तरह से दूसरी याचिका दाखिल की गई, वह 'फ़ोरम शॉपिंग' का मामला है जिसमें अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है.

'फ़ोरम शॉपिंग' न्यायिक शब्दावली का हिस्सा है जिसमें अपने पक्ष में फ़ैसला लेने के लिए लोग एक साथ कई अदालतों में जाने की कोशिश करते हैं, ताकि अनुकूल फ़ैसला हासिल किया जा सके.

कामिनी जायसवाल के अलावा इस मामले में प्रशांत भूषण ने दूसरी याचिका दाखिल की थी. इस बारे में अरुण मिश्रा ने मंगलवार को कहा, "आप (प्रशांत भूषण) गुरुवार को ये जानते थे कि भारत के मुख्य न्यायाधीश के ख़िलाफ़ ऐसे ही आरोपों वाली एक याचिका आपके ही समूह कैंपेन फॉर ज्यूडीशियल एकाउंटीबिलिटी एंड रिफॉर्म्स (सीजेएआर) की याचिका जस्टिस सिकरी की अदालत में लंबित है. इसके बाद भी आपने दूसरी याचिका दाखिल की और इस बात पर ज़ोर दिया कि उसकी सुनवाई उसी दिन जस्टिस चेलमेश्वर की अदालत में हो. ये अवमानना और फ़ोरम शॉपिंग का मामला है."

इस मामले में सोमवार को भारत के एटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि जिस तरह से इस मामले में दो याचिकाएं दाख़िल हुई हैं वह न्यायपालिका और सुप्रीम कोर्ट बार के लिए गहरा घाव है, इसे भरने में काफ़ी वक्त लगेगा.

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Image caption सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा

जस्टिस अरूण मिश्रा ने कहा कि नुकसान हो चुका है, लोग सर्वोच्च अदालत पर बेवजह शक कर रहे हैं.

कामिनी जायसवाल की ओर से शांति भूषण और प्रशांत भूषण दलील पेश कर रहे थे. इन दोनों ने अदालत में कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश के ख़िलाफ़ कोई सीधा आरोप नहीं है, न ही एफ़आईआर में उनका नाम है, लेकिन यह हितों के टकराव का मामला हो सकता है.

प्रशांत भूषण की आपत्ति

इस पूरे मामले में शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में उस वक्त अजीब स्थिति देखने को मिली थी जब प्रशांत भूषण, मुख्य न्यायाधीश की अदालत से नाराज़ होकर बाहर निकल आए थे, उनका कहना था कि उन्हें अपना पक्ष रखने का मौक़ा नहीं दिया जा रहा है.

इस मामले में मुख्य न्यायाधीश एक पक्ष हो सकते हैं इसलिए उन्हें इस मामले से अलग रहना चाहिए, जब प्रशांत भूषण ने ये दलील दी तो मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा कि एफ़आईआर में उनका नाम नहीं है और ऐसा कहना अदालत की अवमानना है.

दरअसल, वरिष्ठ वकील कामिनी जायसवाल की याचिका की सुनवाई जस्टिस चेलमेश्वर की कोर्ट में चल रही थी. वे सुप्रीम कोर्ट के दूसरे सबसे वरिष्ठ जज हैं. उन्होंने मेडिकल इंस्टीट्यूट मामले को पांच सबसे वरिष्ठ जजों की खंडपीठ के पास भेजा था, लेकिन जस्टिस दीपक मिश्रा ने जस्टिस चेलमेश्वर के फ़ैसले को बदल दिया, उन्होंने ये मामला पाँच सबसे वरिष्ठ जजों के बदले, अन्य जजों के साथ ख़ुद सुनने का फ़ैसला किया.

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इस पर प्रशांत भूषण ने आपत्ति दर्ज कराई जिसके जवाब में जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि बेंच गठित करने का अधिकार केवल मुख्य न्यायाधीश के पास है, किसी और के पास नहीं.

आख़िर क्या है मेडिकल कॉलेज का मामला

दरअसल, ये पूरा मामला लखनऊ के प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस के प्रमोटरों से जुड़ा है. केंद्र सरकार ने मानकों को पूरा न कर पाने पर 46 मेडिकल कॉलेजों पर दो साल पहले रोक लगा दी गई थी, उनमें प्रसाद इंस्टीट्यूट भी शामिल है.

इस रोक के ख़िलाफ़ इंस्टीट्यूट के मालिकों का मामला सुप्रीम कोर्ट में है. दूसरी ओर, सीबीआई की एक जाँच रिपोर्ट के मुताबिक़, प्रसाद इंस्टीट्यूट के प्रमोटरों ने ओडिशा हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज आइएम कुद्दूसी से संपर्क किया.

रिपोर्ट में कहा गया है कि कुद्दूसी ने अपने संपर्कों का इस्तेमाल करके केस में अनुकूल फ़ैसला दिलाने का आश्वासन दिया. इस मामले में सीबीआई ने कुद्दूसी को 21 सितंबर को गिरफ़्तार भी किया. इस मामले में अब तक पांच अन्य लोग गिरफ़्तार किए जा चुके हैं.

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सीबीआई की एफ़आईआर में दावा किया गया है कि ये सभी सुप्रीम कोर्ट से मेडिकल कॉलेज की मान्यता को बहाल कराने के लिए जजों को प्रभावित करने की साज़िश में शामिल थे.

इतना ही नहीं, सीबीआई इस मामले में नई दिल्ली, लखनऊ और भुवनेश्वर स्थित ठिकानों पर छापेमारी करके लगभग दो करोड़ रुपए बरामद कर चुकी है.

वैसे एटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में ये भी दलील दी थी, "कुद्दूसी के बयान के अलावा ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है जिससे ये ज़ाहिर होता हो कि जजों या किसी जज को रिश्वत देने के लिए पैसे जमा किए गए थे."

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