जया जेटली की ज़िंदगी में 'बिच्छू' और 'डंक'

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वैसे तो भारत की राजनीति में महिलाओं का आना कोई नई बात नहीं है, लेकिन उसका राजनीति के अपने अनुभवों को कागज़ पर उकेरना ज़रूर दुर्लभ बात है.

उनकी किताब का शीर्षक पढ़ने से पहले पहल ये आभास मिलता है कि राजनीति में उनके अनुभव बहुत सुखद नहीं रहे हैं और शायद इसीलिए वो राजनीति के अपने राहगीरों को 'बिच्छू' की संज्ञा देती हैं.

लेकिन जया जेटली का कहना है कि उन्होंने अपनी आत्मकथा का नाम 'लाइफ़ अमंग द स्कॉरपियंस' इसलिए रखा क्योंकि, "बिच्छू के डीएनए में है कि वो डंक मारता और काटता है. एक बार मलेशिया में एक महिला स्वेच्छा से 2 गुना 6 फीट के शीशे के कमरे में करीब 2700 ज़हरीले बिच्छुओं के साथ 30 दिनों तक रही थी. जब वो पिंजड़े से बाहर निकली तो उसे 7 डंक लग चुके थे. लेकिन इसके बावजूद उसे 'स्कॉरपियन क्वीन' का ख़िताब दिया गया."

वो कहती हैं, "मैंने जब ये कहानी पढ़ी तो मुझे लगा कि मेरी स्थिति शीशे के पिंजड़े में रह रही उस महिला की तरह है, जिसके एक एक कदम को बाहर खड़े लोग देख रहे हैं."

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कैंब्रिज में राजीव गाँधी से मुलाकात

1942 में शिमला में जन्मीं जया जेटली ने अपनी पढ़ाई दिल्ली के मशहूर मिरांडा हाउस और अमरीका के स्मिथ कालेज में की. पढ़ाई के बाद उन्होंने कुछ दिनों तक लंदन के एयर इंडिया के दफ़्तर में काम भी किया. उन दिनों वहाँ कमलेश शर्मा, उनके भावी पति अशोक जेटली, मणिशंकर अय्यर और राजीव गाँधी भी पढ़ रहे थे.

जया बताती हैं, "मैं लंदन में एक क्लर्क का काम कर रही थी. उसकी वजह ये थी कि मेरे पास भारत वापस आने के लिए पैसे नहीं थे और एयर इंडिया अपने कर्मचारियों को भारत आने के लिए फ़्री टिकट दिया करता था. दूसरे मुझे थोड़ी सी आज़ादी चाहिए थी ताकि मैं एक साल बिल्कुल अकेले रहूँ. सप्ताहांत में मैं कैंब्रिज जाया करती थी."

उन्होंने बताया, "उस ज़माने में हम देखा करते थे कि राजीव गाँधी सोनिया से दोस्ती बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे. वो रेस्तराओं और डांस पार्टियों में साथ साथ जाया करते थे. हम लोगों का मामूली परिचय था और जब भी मैं उन्हें देखती थी, हैलो ज़रूर कहती थी. बाद में मेरी जब अशोक जेटली से शादी हुई और वो आईएएस होकर कश्मीर आ गए. उस समय तक राजीव इंडियन एयरलाइंस के विमान उड़ाने लगे थे."

वो बताती हैं, "जब हम कभी किसी को हवाई अड्डे लेने जाते थे तो राजीव गांधी हमें वहाँ की कॉफ़ी शॉप में अकेले बैठे दिखाई दे जाते थे और हम सोचते थे कि प्रधानमंत्री का बेटा अकेले बैठा हुआ है. चलो उसके साथ बैठ कर कॉफ़ी पियो."

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Image caption जया जेटली और जॉर्ज फ़र्नान्डीस

नाटक खेलने के दौरान मुलाकात हुई थी अशोक जेटली से

अशोक जेटली से जया की मुलाकात उस समय हुई जब वो मिरांडा हाउस में पढ़ा करती थीं और वो दिल्ली के सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज में.

जया बताती है, "एक बार मिरांडा हाउस में एक नाटक खेला जा रहा था जिसका नाम था 'द चिल्ड्रेन हाउस.' उसमें एक पुरुष पात्र की भूमिका अशोक को दी गई. वो हमारे कॉलेज आकर हमारे साथ रिहर्सल किया करते थे. वो कभी कभी मुझे काफ़ी पिलाने ले जाते थे. उस ज़माने में कोका कोला 25 पैसे का आता था. मजेदार बात ये थी वो नाटक 'लेसबियनिज़्म' की थीम पर आधारित था."

वो कहती हैं, "जब अभिभावकों को इसके बारे में पता चला तो उन्होंने मांग की कि ये नाटक कॉलेज में न खेला जाए. इसलिए टिकट छप जाने के बावजूद उसका मंचन रद्द कर दिया गया. लेकिन हमारी दोस्ती बरकरार रही. वो कैंब्रिज पढ़ने चले गए और मैं अमरीका. फिर भारत वापस आ कर हमने शादी कर ली."

Image caption बीबीसी दफ़्तर में जया जेटली के साथ रेहान फ़ज़ल

'गुर्जरी' में काम

लंदन से दिल्ली वापस आने पर जया जेटली ने पहले गुजरात इंपोरियम 'गुर्जरी' में काम करना शुरू किया.

उन दिनों स्मिता पाटिल, शबाना आज़मी, रत्ना पाठक, तेजी बच्चन, नीना गुप्ता और यहाँ तक कि सोनिया गाँधी गुर्जरी आकर गुजराती छापे के कपड़े खरीदा करती थीं.

जया बताती हैं कि तेजी उन्हें बताया करती थी कि पुपुल जयकर एक ही करघे पर तीन साड़ियाँ बनवाती थीं, एक तेजी बच्चन के लिए, दूसरी इंदिरा गाँधी के लिए और तीसरी खुद अपने लिए. इसके बाद बुनकर से कहा जाता था कि वो इस तरह की साड़ी किसी के लिए भी नहीं बुने.

जया जेटली बताती हैं, "एक बार मैंने एक मशहूर अभिनेत्री जो कि अक्सर गुर्जरी आया करती थी, से कहा कि आप एक बार अपने आने वाली फ़िल्म में गुर्जरी की साड़ी पहन कर शूट कराएं और फ़िल्म के अंत में ये कैप्शन जाए कि इन साड़ियों को गुर्जरी ने डिज़ाइन किया है. उन्होंने ये कहते हुए ऐसा करने से इंकार कर दिया कि वो नहीं चाहतीं कि जो साड़ियाँ वो पहन रही हैं, उन्हें कोई और भी पहने."

दिल्ली हाट बनाने में भूमिका

दिल्ली की मशहूर 'दिल्ली हाट' की स्थापना में भी जया जेटली ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

जया बताती हैं, "दिल्ली हाट इसलिए शुरू हुई, क्योंकि मैं देखती थी कि साधारण कारीगर, कुम्हार, टोकरी और पंखा बनाने वाले लोग सड़क पर ही रह कर अपना काम करते थे, वहीं रहते थे और अपना माल भी बेचते थे. अक्सर पुलिस वाले उनसे पैसे भी वसूलते थे."

वो कहती हैं, "एक बार मैं एक कुम्हार के पास गमला लेने गई. वो रो रहा था, क्योंकि पुलिसवालों ने आकर उससे कहा था कि वहाँ छतरपुर में राजीव गांधी के फ़ार्म हाउस में जाने का रास्ता बन गया है. इसलिए कुम्हार का उस किनारे पर बैठना एक सुरक्षा जोखिम बन गया है. उन दिनों सरकार खुद घर तोड़ने से डरती थी, इसलिए उन्होंने उस कुम्हार से कहा कि तुम खुद अपना सामान हटाओ और किसी दूसरी जगह जाकर बस जाओ."

वो बताती हैं, "तब मैं उनके लिए अदालत गई कि उन्हें अपना रोज़गार कमाने का अधिकार होना चाहिए. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और उसने नगरपालिका को आदेश दिया कि इस तरह विस्थापित किए गए कारीगरों के लिए कोई जगह बनाई जाए. मैं प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह से मिली और उनसे मांग की कि ऐसा बाज़ार बनाया जाए जहाँ विस्थापित कारीगर अपने सामान को आसानी से बेच सकें. उन्होंने इसकी इजाज़त दे दी लेकिन इसे खड़ा करने में मुझे 6 साल लग गए."

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जॉर्ज फ़र्नान्डीस से मुलाकात

1977 में जया जेटली की मुलाकात पहली बार समाजवादी नेता जार्ज फ़र्नान्डीस से हुई. उस समय वो जनता पार्टी सरकार में उद्योग मंत्री थे और जया के पति अशोक जेटली उनके स्पेशल असिस्टेंट हुआ करते थे.

जया ने जॉर्ज के साथ काम करना शुरू कर दिया और 1984 आते आते जॉर्ज जया ने अपने निजी दांपत्य जीवन की बातें भी बांटने लगे, जो कि उस समय बहुत उतार-चढ़ाव से गुज़र रहा था.

जया बताती हैं, "उस समय उनकी पत्नी अक्सर बीमार रहती थीं और लंबे समय के लिए अमरीका और ब्रिटेन चली जाती थीं. जार्ज जब बाहर जाते थे तो अपने बेटे शॉन को मेरे यहाँ छोड़ जाते थे."

Image caption जया जेटली की किताब 'लाइफ़ अमंग द स्कॉरपियंस'

मानवतावादी सोच के कारण जॉर्ज की मुरीद

मैंने जया जेटली से पूछा कि जॉर्ज आपके सिर्फ़ दोस्त थे या इससे भी कुछ बढ़ कर?

जया का जवाब था, "कई किस्म के दोस्त हुआ करते है और दोस्ती के भी कई स्तर होते हैं. महिलाओं को एक किस्म के बौद्धिक सम्मान की बहुत ज़रूरत होती है. हमारे पुरुष प्रधान समाज के अधिकतर लोग सोचते हैं कि महिलाएं कमज़ोर दिमाग और कमज़ोर शरीर की होती हैं. जॉर्ज वाहिद शख़्स थे जिन्होंने मुझे विश्वास दिलाया कि महिलाओं की भी राजनीतिक सोच हो सकती है."

वो कहती हैं, "दूसरे उनकी सोच बहुत मानवतावादी थी. एक बार वो जेल में थे. पंखे के ऊपर बनाए गए चिड़िया के घोंसले से उसके दो- तीन बच्चे नीचे गिर गए. वो उड़ नहीं सकते थे. उन्होंने अपनी ऊनी टोपी से उनके लिए एक घोंसला बनाया और उन्हें पाला. वो कहीं भी जाते थे, अपनी जेब में दो टॉफ़ी रखते थे. इंडियन एयरलाइंस की फ़्लाइट में वो टाफ़ियाँ मुफ़्त मिलती थीं. वो बच्चों के देखते ही वो टॉफ़ी उन्हें खाने के लिए देते थे. ये ही सब चीज़े थीं जिन्होंने हम दोनों को जोड़ा. इसमें रोमांस का पुट बिल्कुल नहीं था."

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जॉर्ज अपने कपड़े खुद धोते थे

जॉर्ज फ़र्नान्डीस एक विद्रोही राजनेता थे जिनका परंपराओं को मानने में यकीन नहीं था. हैरी पॉटर की किताबों से लेकर महात्मा गाँधी और विंस्टन चर्चिल की जीवनी तक-उन्हें किताबें पढ़ने का बहुत शौक था.

उनकी एक ज़बरदस्त लाइब्रेरी हुआ करती थी, जिसकी कोई भी किताब ऐसी नहीं थी, जिसे उन्होंने पढ़ा न हो.

जया जेटली बताती हैं, "अपनी ज़िदगी में उन्होंने न तो कभी कंघा खरीदा और न ही इस्तेमाल किया. अपने कपड़े वो खुद धोते थे. उनपर इस्त्री ज़रूर कराते थे लेकिन उन्हें सफ़ेद बर्राक कलफ़ लगे कपड़े पहनना बिल्कुल पसंद नहीं था."

वो कहती हैं, "लालू यादव ने एक बार अपने भाषण में कहा था कि जॉर्ज बिल्कुल बोगस व्यक्ति है. वो धोबी के यहाँ अपने कपड़े धुलवाते हैं. वहाँ से धुल कर आने के बाद वो उस मिट्टी में सान कर निचोड़ कर फिर पहन लेते हैं. जब ये कुछ टीवी वालों ने सुना जो वो जॉर्ज साहब के पास आए और बोले कि क्या हम अपने कपड़े धोते हुए आपको फ़िल्मा सकते हैं? जॉर्ज को ये सुन कर बहुत मज़ा आया और वो राजीव शुक्ला के रूबरू प्रोग्राम के लिए लुंगी पहन कर अपने गंदे कपड़े धोने के लिए तैयार हो गए."

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Image caption जया जेटली, अपने पति अशोक जेटली (बाएं से), दामाद अजय जडेजा और बेटी अदिति जेटली के साथ

खाने के शौकीन

जया बताती हैं, "जॉर्ज को खाने का बहुत शौक था. ख़ासतौर से कोंकड़ की मछली और क्रैब करी उन्हें बहुत पसंद थी. 1979 में एक बार हम ट्रेड यूनियन बैठक में भाग लेने मुंबई गए. वो हम सब लोगों को अशोक लंच होम नाम की एक जगह पर ले गए. वहाँ उन्होंने हमें मछली करी खिलाई."

वो कहती हैं, "मुझे बहुत अच्छा लगा जब उन्होंने ड्राइवर को भी अपने साथ एक ही मेज़ पर बैठा कर खाना खिलाया. आज कल तो बच्चों को संभालने वाली औरतों तक को मालिक के साथ रेस्तराँ में बैठने नहीं दिया जाता. जॉर्ज की सोच इसके बिल्कुल विपरीत थी. इन सब चीज़ों ने मुझे उनसे जोड़ा."

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जॉर्ज ने अपने निवास का गेट तुड़वाया

जॉ़र्ज फ़र्नान्डीस भारत के अकेले मंत्री थे जिनके निवास स्थान पर कोई गेट या सुरक्षा गार्ड नहीं था और कोई भी उनके घर पर बेरोकटोक जा सकता था. इसके पीछे भी एक किस्सा है.

जया जेटली याद करती हैं, "जॉर्ज साहब के घर के सामने गृह मंत्री शंकरराव चव्हाण रहा करते थे. उनके साथ बहुत बड़ा सिक्योरिटी बंदोबस्त चलता था. जॉर्ज साहब उन दिनों विपक्ष में बैठते थे. जब भी चव्हाण को संसद जाने के लिए अपने घर से निकलना होता, उनके सुरक्षाकर्मी जॉर्ज साहब का गेट बंद करवा देते ताकि उस घर में रहने वाला कोई शख़्स अंदर बाहर नहीं जा सकता था."

वो बताती हैं, "एक दिन जॉर्ज को इससे बहुत गुस्सा आ गया. उन्होंने कहा कि चव्हाण साहब की तरह मेरा भी संसद जाना बहुत ज़रूरी है. अगर उनकी सुविधा के लिए मुझे मेरे ही घर में बंद किया जाता है तो मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता. उन्होंने मेरे सामने ही रिंच से अपना गेट उखड़वा दिया. उन्होंने कभी अपने घर पर गार्ड नहीं रखा."

वो कहती हैं, "रक्षा मंत्री बनने के बाद भी वाजपेयी तक ने उनसे सुरक्षाकर्मी रखने के लिए अनुरोध किया, लेकिन उन्होंने उनकी बात नहीं मानी. आख़िर में उन्होंने गार्ड रखना तब स्वीकार किया जब संसद के ऊपर हमला हो गया. तब मैंने ही उनसे कहा था कि जॉर्ज फ़र्नान्डीस को मारा जाना इतनी बड़ी बात नहीं होगी, लेकिन अगर देश के रक्षा मंत्री को मारा जाता है, तो ये देश के लिए बहुत बड़ा धक्का होगा. तब उन्होंने अनमनेपन से अपने घर एक दो गार्ड रखने शुरू किए."

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Image caption अटल बिहारी वाजपेयी और जार्ज फर्नान्डेस

तहलका स्टिंग

जया जेटली के राजनीतिक करियर को उस समय बहुत बड़ा धक्का लगा जब 'तहलका' पत्रिका ने एक स्टिंग ऑपरेशन कर उन पर कुछ रक्षा सौदों के लिए रिश्वत लेने का आरोप लगाया.

जया बताती हैं, "जिन लोगों ने स्टिंग किया उनसे मैं पहले कभी नहीं मिली थी. बीच बातचीत में उन्होंने पूछा कि क्या मैं ये मैडम को दे दूँ? वो क्या दे रहे हैं, इसका मुझे पता ही नहीं था. उन्होंने पहले कहा था कि वो पार्टी के लिए कुछ देना चाहते हैं. पार्टी को डोनेशन देना कोई ग़ैरकानूनी बात नहीं है. जब उन्होंने ये कहा तो मैंने कहा कि इसे मैसूर भेज दो जहाँ हमारे एक मंत्री सम्मेलन कर रहे हैं. इस पर उन्होंने तीन बार अच्छा कहा. फिर वो बातों बातों में कहने लगे कि हमें रक्षा मंत्रालय में कुछ परेशानियाँ हो रही हैं."

वो कहती हैं, "मैंने तुरंत कहा कि रक्षा मंत्रालय वाले क्या करते हैं, मुझे नहीं पता. वो बार बार कहते रहे कि वो हमारी बात नहीं सुन रहे हैं और हमारी किसी चिट्ठी का जवाब नहीं दे रहे हैं. वो आभास दे रहे थे कि उनके साथ बहुत बड़ा अन्याय हो रहा है और मंत्रालय के लोग भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. मैंने यही कहा कि अगर कोई ग़लत काम हो रहा हो, तो मैं देखूंगी को वो लोग सबको बराबरी की नज़र से देखे. बाद में उन्होंने कहानी गढ़ी कि मैं रक्षा मंत्री के घर पर बैठ कर अक्सर पैसा लिया करती हूँ."

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Image caption बाएं से जॉर्ज फ़र्नान्डीस, दिग्विजय सिंह, शरद यादव और नीतीश कुमार

समता पार्टी से इस्तीफ़ा

सच्चाई जो भी हो, जया जेटली को इसकी बड़ी राजनीतिक क़ीमत चुकानी पड़ी. उनको पार्टी के अध्यक्ष पद से हटना पड़ा.

न सिर्फ़ उनको, बल्कि जॉर्ज फ़र्नान्डीस को भी रक्षा मंत्री के पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा.

जया बताती हैं, "मैं कभी भी राजनीति को करियर मान कर नहीं चली हूँ. मैं एक फ़र्ज़ निभा रही थी. जार्ज साहब के साथ काम करके मुझे अच्छा लगता था. उसके साथ साथ मैंने कारीगरों के हित को कभी नहीं छोड़ा. मैं राजनीति से कोई फ़ायदा लेने नहीं आई थी."

वो कहती हैं, "कम से कम मुझे इससे बदनामी तो बिल्कुल भी नहीं चाहिए थी. मुझे इस बात से बहुत धक्का पहुंचा कि पूरी ज़िंदगी ईमानदारी से गरीबों के लिए काम करने के बाद भी मुझे बदनाम किया गया. मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा दुख यही है कि मुझे पैसा लेकर देश को बेच देने वाले व्यक्ति की तरह दुनिया के सामने पेश किया गया. राजनीतिक करियर मेरे लिए बहुत ज़्यादा माने नहीं रखता है."

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Image caption जॉर्ज फर्नान्डीस, पत्नी लैला कबीर, पुत्रवधु और पोते के साथ

जॉर्ज की ज़िंदगी से बाहर

एक दिन ऐसा भी आया कि जया जेटली को जॉर्ज फर्नान्डीस की पत्नी लैला कबीर ने जॉर्ज की जिंदगी से 'परसोना-नॉन ग्राटा' घोषित करवा दिया.

जॉर्ज इस समय 'अलज़ाइमर' की बीमारी से पीड़ित हैं. उनकी याददाश्त और पहचानने की शक्ति जाती रही है.

2014 में काफ़ी मशक्कत और कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद जया जेटली को हर 15 दिनों पर सिर्फ़ 15 मिनटों के लिए जार्ज फ़र्नान्डीस से मिलने की अनुमति मिली है.

जया जेटली आज भी हर पंद्रह दिनों बाद ठीक 11 बजकर 5 मिनट पर सिर्फ़ 15 मिनटों के लिए जॉर्ज फ़र्नान्डीस से मिलने जाती हैं.

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