'ज़िन्दा शिशु को मृत बताने की जांच के आदेश'

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दिल्ली में एक बड़े अस्पताल के एक ज़िंदा बच्चे को मृत बताकर उसके रिश्तेदारों को सौंपे जाने का मामला सामना आया है. मामला दिल्ली के शालीमार बाग़ स्थित मैक्स सुपरस्पेशलिटी अस्पताल का है जिस पर लापरवाही का आरोप लगाया गया है.

परिवार का आरोप है कि अस्पताल से बाहर निकलने के बाद उन्हें पता चला कि एक बच्चे की सांसे चल रही हैं. उनका आरोप है कि अस्पताल की ज़रा सी लापरवाही के कारण एक जीवित बच्चे की मौत हो जाती.

इस मामले में दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने कहा है कि मामला उनके संज्ञान में आया है और इसकी जांच शुरू कर दी गई है. उन्होंने कहा है कि सरकार 72 घंटों के भीतर इस मामले में प्राथमिक रिपोर्ट देगी और एक सप्ताह के भीतर फ़ाइनल रिपोर्ट जारी की जाएगी.

बीबीसी ने अस्पताल प्रबंधन से बात करने की कोशिश की लेकिन ख़बर के लिखने तक बात नहीं हो पाई.

एक बयान में अस्पताल ने एनडीटीवी को बताया है, "22 हफ्ते के प्रीमैच्योर बेबी को जब उनके रिशतेदारों को सौंपा गया था उसके शरीर में कोई हरकत नहीं थी. हम इस घटना से सकते में हैं और इस मामले में जांच शुरू कर दी गई है."

अस्पताल का कहना है, "मामले से संबंधित डॉक्टर को छुट्टी पर भेज दिया गया है. हम बच्चे के परिवार के साथ संपर्क में हैं और उनकी हरसंभव मदद कर रहे हैं."

पीड़ित परिवार के आरोप

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प्रताप विहार किराड़ी के रहने वाले प्रवीण ने अपनी बेटी वर्षा की शादी नांगलोई के पास निहाल विहार में रहने वाले आशीष से की थी.

उनकी बेटी वर्षा गर्भवती थी और उन्हें पीतमपुरा के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था. कॉम्प्लिकेशन के कारण अस्पताल में वर्षा को मैक्स सुपरस्पैशलिटी अस्पताल के लिए रेफर किया था.

28 तारीख को दोपहर 12 बजे वर्षा को मैक्स अस्पताल में भर्ती कराया. 30 तारीख सवेरे 7.30 को वर्षा ने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया. बेटे का वज़न था 655 ग्राम था. 12 मिनट बाद वर्षा ने एक बेटी को जन्म दिया जिसका वज़न 585 ग्राम था.

बच्चे के नाना प्रवीण ने बीबीसी को बताया, "हमसे कहा गया कि वहां अच्छे, प्रोफेशनल डॉक्टर्स हैं अच्छा इलाज होगा. हमने पैसे की तरफ नहीं देखा और बेटी को लेकर मैक्स अस्पताल चले गए."

'बच्चे को तीन महीने वेंटिलेटर पर रखने को कहा'

उन्होंने आगे बताया, "डॉक्टर के कहने पर हमने बाहर से और इंजेक्शन मंगवाए और अस्पताल ने भी अपनी तरफ से कई इंजेक्शन लगाए. डॉक्टर कहते रहे कि वर्षा की तबीयत में सुधार हो रहा है."

"अचानक 29 की रात साढ़े आठ बजे के करीब डॉक्टर ने बताया कि वर्षा को अधिक ब्लीडिंग हो रही है और डिलीवरी तुरंत करानी होगी. अगले दिन सवेरे ऑपरेशन हुआ."

प्रवीण बताते हैं कि बच्चों के जन्म के बाद डॉक्टर ने बताया कि नवजात बच्ची की मौत हो गई है और दूसरे नवजात बच्चे की सांस अभी चल रही है. उनका आरोप है कि अस्पताल ने बच्चे को लगभग तीन महीने वेंटिलेटर पर रखने के लिए कहा था.

परिवार ने आर्थिक असमर्थता दिखाते हुए कहा कि वो दूसरे अस्पताल में बच्चे का इलाज करवाएंगे.

'हम श्मशान घाट जा रहे थे'

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प्रवीण का कहना है कि ये कहने के कुछ घंटों बाद अस्पताल में उन्हें बताया गया कि दूसरा बच्चा भी नहीं रहा. वो कहते हैं, "अस्पताल ने दोनों बेबी को अलग-अलग पार्सल जैसा बना कर हमें दे दिया. उन्होंने एक पॉलीथीन में डालकर बच्चों को हमें दे दिया."

"हम बच्चों को मृत समझ कर उन्हें ले कर श्मशान घाट जा रहे थे. करीब दो-ढाई किलोमीटर आगे चले होंगे कि मेरे पास जो पार्सल है उसमें मुझे कुछ हरकत महसूस हुई. गाड़ी रुकवाकर पैकेट खोला तो देखा कि बच्चा जीवित था."

वो कहते हैं कि बच्चों की पैकिंग देख कर हम हैरान हो गए- पांच परतों में बच्चे को लपेटा गया था. पहले कपड़ा फिर पॉलीथीन, फिर कपड़ा, फिर पॉलीथीन, फिर कपड़ा.

वो बताते हैं कि बच्चे को फिलहाल पीतमपुरा के अग्रवाल अस्पताल में भर्ती कराया गया है और बच्चे की स्थिति ठीक है.

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प्रवीण बताते हैं कि बाद में उनके पास मैक्स अस्पताल का फ़ोन आया जो वर्षा को डिस्चार्ज कराने के संबंध में था. पूछने पर नर्स ने बताया कि दो डॉक्टरों ने बच्चों को मृत घोषित किया था.

शालीमार बाग थाने में मौजूद पुलिस अधिकारी ऋषिपाल सिंह ने बीबीसी को बताया कि पुलिस थाने में आईपीसी की धारा 308 (ग्रीवियस इंज्यूरी) के तहत मामला दर्ज कर लिया है.

"पुलिस अब इस संबंध में अस्पताल की लापरवाही जांच करेगी और दिल्ली मेडिकल काउंसिल को भी इस बारे में सूचित करेगी."

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