'आज़ादी' बचाए रखने के लिए कई मोर्चों पर जूझ रही है जादवपुर यूनिवर्सिटी

जादवपुर यूनिवर्सिटी का गेट नंबर चार
Image caption जादवपुर यूनिवर्सिटी का गेट नंबर चार

जादवपुर यूनिवर्सिटी का गेट नंबर चार. पिछले साल मई में एक फ़िल्म की स्क्रीनिंग को लेकर हुए विवाद के दौरान कथित तौर पर आरएसएस और एबीवीपी के समर्थक यहीं से कैंपस में आने की कोशिश कर रहे थे और यूनिवर्सिटी के छात्र और शिक्षक ह्यूमन चेन बनाकर उन्हें रोक रहे थे.

यह घटना पूरे देश के मीडिया में छाई रही. मगर यह पहला मौका नहीं था जब जादवपुर यूनिवर्सिटी चर्चा में रही. कभी छात्रों द्वारा 'कश्मीर की आज़ादी' के नारे लगाने को लेकर इसने सुर्ख़ियां बटोरीं तो कभी अच्छे शिक्षण स्तर के लिए मिली शानदार रैंकिंग की वजह से.

इस गेट से तीन दिनों तक कई बार आना-जाना हुआ, मगर न तो किसी ने पहचान पत्र मांगा न ही टोका कि किससे मिलना है. छात्रों और अध्यापकों से बात करने पर पता चला कि जादवपुर यूनिवर्सिटी का माहौल हमेशा से ऐसा ही है.

मगर जिस आज़ादी पर यहां के छात्र और फ़ैकल्टी मेंबर गर्व करते हैं, आज वे उसपर ख़तरा महसूस कर रहे हैं. एक छात्र ने कहा कि आज आप जैसे यहां आकर हमसे बात कर रहे हैं, कल शायद इसके लिए भी परमिशन लेनी पड़े.

कैसा है कैंपस का माहौल?

छात्रों का कहना है कि यूनिवर्सिटी में उन्हें पूरी स्वतंत्रता है और यह माहौल छात्रों, फैकल्टी और स्टाफ़ ने मिलकर बनाया है.

केमिकल इंजिनियरिंग के छात्र प्रांतर दत्ता ने कहा, "जादवपुर यूनिवर्सिटी में सभी विचारों का समावेश है. यहां कुछ नक्सलवादी विचारधारा के हैं, लेफ्ट लिबरल हैं और कुछ दक्षिणपंथी भी हैं. लेकिन हम हिंसा में नहीं, बातचीत में यकीन रखते हैं."

फ़िज़िक्स के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर और जादवपुर यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के असिस्टेंट सेक्रेटरी डॉक्टर पार्थ प्रतिम राय कहते हैं, "छात्रों और अध्यापकों की भावनाएं यूनिवर्सिटी से जुड़ी हुई हैं. हम ड्यूटी आवर्स नहीं देखते. सुबह से आकर शाम तक रहते हैं. इसे हम अपनी यूनिवर्सिटी समझते हैं."

'एंटी-नेशनल का टैग'

यूनिवर्सिटी में छात्र और शिक्षक राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ज़ोर देते हैं. मगर कुछ ये भी मानते हैं कि मीडिया ने यूनिवर्सिटी की ग़लत इमेज पेश की है.

एक छात्र दीपांजन घोष ने कहा, "मैं भारत में बहुत सी जगहों पर प्रॉजेक्ट के लिए गया हूं. जब मैं बताता हूं कि जादवपुर से हूं तो कोई न कोई टिप्पणी कर देता कि कहीं तुम एंटी-नैशनल तो नहीं हो. मीडिया जिस तरह से चीज़ों को पेश करता है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है."

Image caption दीपांजन घोष और प्रांतर दत्ता (बाएं से दाएं) केमिकल इंजीनियरिंग के छात्र हैं

आईआर में बीए सेकंड इयर के छात्र देबोप्रिय शोम से मुलाकात हुई, जो पिछले साल एक वीडियो में 'कश्मीर की आज़ादी' का नारा लगाते नजर आए थे. इसी के बाद सोशल मीडिया पर जादवपुर यूनिवर्सिटी को जेएनयू की ही तरह 'एंटी-नैशनल' का ठप्पा लगाने की कोशिश की गई थी.

देबोप्रिय कहते हैं, 'आरएसएस ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों पर कार्यक्रम किया था तो मैंने पोस्टर लगाकर कुछ सवाल पूछे थे. उन पोस्टरों को फाड़ दिया गया और मुझे शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया. तो हमने नारे लगाकर सवाल किए थे कि भारत में कश्मीरी, मणिपुरी और नगा वगैरह जो अल्पसंख्यक हैं, उनपर होने वाले अत्याचारों पर आपकी क्या राय है. मगर हमें ग़लत ढंग से दिखाया गया था."

Image caption देबोप्रिय शोम का कहना है कि मीडिया ने उन्हें ग़लत ढंग से पेश किया है

देबोप्रिय शोम मूलत: असम के रहने वाले हैं. उन्होंने बताया कि इस घटना के बाद यूनिवर्सिटी कैंपस में तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई, मगर असम में करीब 150 लोगों की भीड़ ने उनके घर पर धावा बोलकर दीवार पर लिखा था- 'हम माफ़ नहीं करेंगे.'

जूटा के सहायक सचिव डॉक्टर पार्थ प्रतिम रे नारों को लेकर हुए विवाद पर कहते हैं, "एक या दो छात्र ऐसा बोल सकते हैं, ये उनकी आज़ादी है. कुछ उनके विरोध में भी बोलते हैं. मगर एक ही पक्ष दिखाना और दो छात्रों की राय के आधार पर पूरे विश्वविद्यालय को लेबल करना ग़लत है."

आज़ादी पर रोक-टोक

जादवपुर यूनिवर्सिटी में वामपंथी विचारधारा का दबदबा रहा है मगर छात्र हवा में थोड़ा बदलाव देख रहे हैं.

केमिकल इंजिनियरिंग कर रहे दीपांजन घोष बताते हैं कि कैंपस में दक्षिणपंथी छात्रों का प्रभाव बढ़ा है और उन्हें बाहर से समर्थन मिल रहा है. उन्होंने कहा, "पहले से लड़का-लड़की आराम से साथ चल सकते हैं, बैठ सकते हैं. मगर अब फ़ेसबुक और सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर लोग फोटो खींचकर डाल रहे हैं कि ये है जादवपुर का हाल. यह सब दुखद है."

Image caption यूनिवर्सिटी कैंपस में ऐसे कई तालाब हैं

इसी तरह से दीपशुभ्र कहते हैं कि 'दो-तीन महीने पहले बाहरी लोग कैंपस में आकर साथ बैठे लड़के-लड़कियों को टोक रहे थे. मोरल पुलिसिंग की कोशिश हो रही है.'

छात्र यूनियन पर मंडराता ख़तरा

यूनिवर्सिटी कैंपस में जगह-जगह #HokUnion के नारे और पोस्टर लगे नज़र आते हैं.

यूनिवर्सिटी के छात्रों ने साल 2014 में कैंपस में छात्रा से हुई छेड़छाड़ के विरोध में एक #HokKolrob आंदोलन किया था. उसके बाद से यह अभियान जारी है, जिसके तहत विभिन्न मुद्दे उठाए जाते हैं.

अभी छात्र 'हकयूनियन' अभियान के ज़रिये राज्य सरकार के उस बिल का विरोध कर रहे हैं, जिसके तहत विश्वविद्यालय से स्टूडेंट यूनियन खत्म करके काउंसिल सिस्टम लागू किया जाएगा.

अभी यूनिवर्सिटी में आर्ट्स, साइंस और इंजिनियरिंग विभागों की अपनी अलग-अलग यूनियन हैं, जिसके प्रतिनिधियों का सीधा चुनाव छात्र करते हैं. मगर नए प्रस्ताव के तहत छात्र सिर्फ़ क्लास रिप्रेजेंटेटिव चुन पाएंगे. फिर तीनों विभागों से प्रशासन एक का चयन करेगा, जो छात्रों का प्रतिनिधित्व करेगा.

इंडिपेंडेंट फ़ोरम से जुड़ीं इंग्लिश थर्ड इयर की छात्रा अंगना कुंडू कहती हैं, "काउंसिल लाकर हमारी आवाज़ को दबाने की कोशिश हो रही है. आज छात्र खुद सांस्कृतिक कार्यक्रम कर सकते हैं, मगर काउंसिल आने पर हर चीज़ के लिए परमिशन लेनी होगी. यह हमारी राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आज़ादी को दबाने की कोशिश है."

Image caption अंगना कुंडू इंग्लिश थर्ड इयर की छात्रा हैं और इंडिपेंडेंट फ़ोरम से जुड़ी हैं

ऐसा नहीं है कि छात्र ही इस बात को लेकर चिंतित हैं. प्रोफ़ेसर भी मानते हैं कि यह एक तरह से छात्रों पर बंदिश लगाने की कोशिश है.

इंग्लिश फ़ैकल्टी में 'हिस्ट्री ऑफ़ प्रॉटेस्ट' पढ़ाने वालीं डॉक्टर नीलांजना देब कहती हैं, "मैं गर्व से कह सकती हूं कि जादवपुर यूनिवर्सिटी में छात्रों को मिलने वाली स्वायत्ता पूरे देश के लिए मिसाल है. मगर अब यूनियन को बंद करके सेंट ज़ेवियर्स मॉडल लाने की बात हो रही है. इसे लेकर छात्रों में असंतोष है."

उन्होंने कहा, "हम यही तो चाहते हैं कि छात्र इस तरह से तैयार हों कि कल को उनमें से कुछ अच्छे नेता बनें. छात्र चाहे लेफ़्ट विंग के हों या राइट विंग के, कैंपस में वे पढ़ाई के साथ-साथ समाज और राजनीति के बारे में बहुत कुछ सीखते हैं. अगर स्कूल की तर्ज़ पर यहां भी प्रतिनिधि नामित होंगे तो वे क्या सीखेंगे?"

Image caption डॉक्टर नीलांजना देब

राज्य सरकार का बढ़ता दबाव

विश्वविद्यालय की असल समस्या है राज्य सरकार की तरफ़ से पड़ रहा दबाव, जो न सिर्फ इसे आर्थिक पहलुओं को प्रभावित कर रहा है बल्कि अकादमिक मामलों पर भी असर डाल रहा है.

हिस्ट्री फ़ैकल्टी में प्रोफ़ेसर अमित भट्टाचार्य कहते हैं, "विभिन्न विभागों में बहुत से पद खाली हैं. इंजिनियरिंग फैकल्टी के कई विभाग तो रिटायर हो चुके गेस्ट फ़ैकल्टी से चल रहे हैं. सरकार पूछती है कि पद क्यों नहीं भरे जा रहे, मगर मंजूर पदों के लिए ख़ुद पैसा नहीं दे रही. यूनिवर्सिटी ख़ुद इतना फंड कहां से लाएगी?"

Image caption प्रोफ़ेसर अमित भट्टाचार्य

जेयू में इंजीनियरिंग और साइंस विभाग में ईवनिंग सेक्शन है और आर्ट्स के भी कुछ विभागों में ईवनिंग क्लासेज़ चलती हैं. आशंका जताई जा रही है कि अगर राज्य सरकार से पैसा नहीं मिला तो ये बंद हो सकती हैं.

जूटा के असिस्टेंट सेक्रेटरी डॉक्टर पार्थ प्रतिम रे कहते हैं, "हायर एजुकेशन मंत्री कहते हैं कि पैसा हम देते हैं तो हम नियंत्रित करेंगे. पिछले साल यूनिवर्सिटी के खर्च का बड़ा हिस्सा सरकार ने नहीं दिया. इससे सैलरी भी जानी है और लैब का खर्च भी निकलना है. पैसा नहीं मिला तो बहुत से कोर्स, खासकर ईवनिंग कोर्स या तो बंद हो जाएंगे या फिर छात्रों की फ़ीस पर इसका दबाव पड़ेगा. आज यह नंबर वन स्टेट यूनिवर्सिटी है, मगर इससे अकैडमिक स्डैंडर्ड खराब होगा."

शिक्षकों में इस बात को लेकर भी नाराज़गी है कि सरकार 'एंट्रेंस टेस्ट' ख़त्म करके मेरिट के आधार पर एडमिशन देने की बात कर रही है. डॉक्टर रे कहते हैं, "बोर्ड ऑफ़ स्टडीज़ तय करता है कि कैसे ऐडमिशन होगा. सरकार ने ख़ुद पीजी में एंट्रेंस ज़रूरी कर दिया और अब वही कह रही है कि एंट्रेंस में पारदर्शिता नहीं होती."

केंद्र से नहीं आ रहे रिसर्च प्रॉजेक्ट

प्रोफ़ेसर रे कहते हैं कि केंद्र में एनडीए सरकार बननने के बाद से अध्यापकों को एक भी मेजर रिसर्च प्रॉजेक्ट नहीं मिला है.

उन्होंने कहा, "जेयू अकादमिक संस्थान है. यहां बहुत से रिसर्च प्रॉजेक्ट केंद्र सरकार से आते थे. जब से केंद्र में एनडीए सरकार बनी है, तब से टीचर्स को मेजर रिसर्च प्रॉजेक्ट नहीं मिले हैं. सेंट्रल फ़ंडिंग एजेंसी ने रिसर्च का बजट भी घटा दिया है. इससे रिसर्च प्रभावित हुआ है."

क्यों निशाने पर है जेयू?

डॉक्टर नीलांजना देब कहती हैं, "सेंट्रल यूनिवर्सिटी में केंद्र में सत्ताधारी पार्टी का प्रेशर रहता है और स्टेट यूनिवर्सिटी में राज्य में सत्ताधारी पार्टी का. यहां पिछली सरकार में हर कैंपस, कॉलेज या यूनिवर्सिटी पर रूलिंग पार्टी का प्रेशर रहता था. मौजूदा सरकार ने पिछली सरकार से अच्छा सबक सीखा है और वे कैंपस पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं. यह पूरे देश का दुखद सत्य है."

वहीं जूटा के पदाधिकारी डॉक्टर पार्थ प्रतिम रे का कहना है, "यूनिवर्सिटी को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि यहां के छात्र और टीचर सरकार की नीतियों पर चर्चा करते हैं और आलोचना करते हैं. इसलिए पैसे न देकर प्रेशर बनाने की कोशिश हो रही है."

सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनने से सुलझेगी समस्या?

कुछ दिन पहले जेयू को आईआईटी में बदलने का प्रस्ताव आया था, मगर अध्यापकों ने इसका विरोध किया था. दरअसल यूनिवर्सिटी में साइंस और इंजिनियरिंग के साथ-साथ आर्ट्स फ़ैकल्टी भी है.

डॉक्टर पार्थ प्रतिम रे कहते हैं, "अभी फ़ंड को लेकर जो हालात हैं, जाने भविष्य में क्या होगा. क्या पता हमें शायद केंद्र सरकार के पास जाना पड़े. जब आईआईटी का प्रस्ताव आया था तो हमने सेंट्रल यूनिवर्सिटी की डिमांड की थी और स्मृति ईरानी को चिट्ठी भेजी थी. क्योंकि आईआईटी के बजाय सेंट्रल यूनिवर्सिटी का ढांचा हमारे लिए सही रहेगा."

मगर इसे लेकर भी अध्यापकों के बीच एक राय नहीं है. डॉक्टर नीलांजना देब कहती हैं, "अभी छोटे स्केल पर ही इतना प्रेशर है तो सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनने पर माहौल और अलग होगा. बेशक फंडिंग ज़्यादा मिलेगी मगर कुछ बंदिशें भी तो जुड़ेंगी. इसीलिए चर्चा चल रही है कि इस तरफ जाएं या न जाएं. ज़्यादातर टीचर ऐसा नहीं चाहते."

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