शशि कपूर और जेनिफ़र की शादी कैसे हुई?

शशि कपूर

शशि कपूर का जन्म 18 मार्च, 1938 को कोलकाता में हुआ था, तब उनके पिता पृथ्वी राज कपूर न्यू थिएटर में काम किया करते थे.

शशि कपूर का सिर बचपन से बड़ा था लिहाजा उनकी मां को उन्हें जन्म देने में खासी तकलीफ़ का सामना करना पड़ा था और उस वक्त घर की माली हालात ऐसी नहीं थी कि उन्हें अस्पताल ले जाया जाए.

उनके बड़े सिर के चलते ही उनकी मां ने बचपन से बेटे के बाल को घुंघराले रखने शुरू किए थे, ताकि बड़ा माथा ज़्यादा दिखे नहीं.

शशि की दादी मां ने उनका नाम रखा था बलबीर राज कपूर. ये नाम उनकी मां को पसंद नहीं था और बचपन से शशि को चांद देखने का शौक था लिहाज़ा उनकी मां ने उनका नाम शशि रखा.

शशि के जन्म के अगले साल ही पृथ्वी राज कपूर का परिवार मुंबई आ गया. छह साल के जब शशि हुए तो उनका नाम मुंबई के डॉन बास्को स्कूल में लिखाया गया, शुरुआती दिनों में शशि कपूर फारुख़ इंजीनियर के साथ एक ही बेंच पर बैठते थे, बाद में इंजीनियर भारत के मशहूर क्रिकेटर बने.

ये दोनों स्कूल की आख़िरी दो क्लास बंक मार दिया करते थे. एक को एक्टिंग सीखने के लिए रॉयल ऑपेरा हाउस जाना होता था और दूसरे को क्रिकेट की अकादमी.

शशिकपूर ने बाल कलाकार के रूप में अपना फ़िल्मी करियर 'आग' से साल 1948 में शुरू किया और उस वक़्त उनकी उम्र नौ साल थी.

इसके बाद फ़िल्म 'आवारा' में राजकपूर के बचपन के क़िरदार ने उन्हें इतना मशहूर किया कि उनका मन पढ़ाई से उचट गया.

'द कपूर- द फर्स्ट फैमिली ऑफ़ इंडियन सिनेमा' में मधु जैन ने पूरे कपूर खानदान के फ़िल्मी सफ़र को संकलित किया है. शशि कपूर ने अपनी पढ़ाई के बारे में उन्हें बताया था, "मैं पढ़ाई में अच्छा नहीं था और पास नहीं हुआ. जब मैं मैट्रिक में फेल हुआ तो किसी ने मुझे डांटा नहीं. मैंने अपने पिता को कहा कि मैं कॉलेज कैंटीन में बैठकर आपके पैसे बर्बाद करना नहीं चाहता."

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Image caption पत्नी जेनिफ़र के साथ शशि कपूर (फ़ाइल फ़ोटो)

पढ़ाई और ड्रामा कंपनी

इसके बाद महज़ 15 साल की उम्र में शशि को उनके पिता ने पृथ्वी थिएटर में नौकरी दे दी, तन्ख्वाह थी 75 रुपये महीना. 1953 में ये शानदार सैलरी थी.

इसके तीन साल के भीतर वे 'शेक्सपियराना' से भी जुड़ गए. ये एक खानाबदोश थिएटर था जिसे शशि के ससुर जेओफ़्रे कैंडलर चलाया करते थे. 18 साल की उम्र में शशि जेनिफ़र से पहली बार मिले.

जेनिफ़र की छोटी बहन और ब्रिटिश रंगमंच की जानी मानी अदाकारा फैलिसिटी कैंडल ने अपनी पुस्तक 'व्हाइट कार्गो' में शशि कपूर और जेनिफ़र के रिश्तों की शुरुआत के बारे में लिखा है.

वो लिखती हैं, "जेनिफ़र अपने दोस्त वैंडी के साथ नाटक 'दीवार' देखने रॉयल ओपेरा हाउस गई थी. शशि तब 18 साल के थे और उनका नाटक में एक छोटा सा क़िरदार था. नाटक शुरू होने से पहले उन्होंने दर्शकों का अंदाज़ा लगाने के लिए पर्दे से झांका और उनकी नजर चौथी कतार में बैठी एक लड़की पर गई. काली लिबास और सफेद पोल्का डॉट्स पहने वो लड़की ख़ूबसूरत थी और अपनी सहेली के साथ हंस रह थी. शशि के मुताबिक वे उसे देखते ही दिलो-जान से उस पर फिदा हो गए थे."

उस शो के बाद शशि कपूर भागकर जेनिफ़र के पास पहुंचे थे और उन्हें पेशकश की कि क्या वो रंगमंच के पीछे चलकर स्टेज देखना चाहेंगी. शशि सोच रहे थे कि मंच के पीछे के कलाकारों को देखना इस लड़की के लिए नई बात होगी, जेनिफ़र चुपचाप उनके साथ चलने को तैयार भी हो गईं.

हालांकि ये बात दूसरी है कि उस वक्त 21 साल की जेनिफ़र अपने पिता की ड्रामा कंपनी की मुख्य अभिनेत्री थीं, जिसकी तन्ख्वाह शशि की तुलना में तीन गुना ज़्यादा थी.

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जेनिफ़र से प्यार

पहली नज़र का प्यार शुरू हो गया था. 1956 में जेनिफ़र के चलते वे 'शेक्सपियराना' में भी शामिल हो गए. शशि उनके पिता को प्रभावित कर सकें, इसके लिए जेनिफ़र ने शशि की अंग्रेज़ी और बोलने के अंदाज़, चलने के तौर-तरीकों को संवारने में काफ़ी मेहनत की. लेकिन इन सबका कोई फ़ायदा नहीं हुआ.

20 साल की उम्र में शशि और 23 साल की जेनिफ़र की शादी बड़े ही अप्रत्याशित अंदाज़ में हुई. शशि कपूर उस वक्त सिंगापुर में 'शेक्सपियाराना' समूह के साथ नाटक खेलने गए थे और एक दिन जेनिफ़र ने तय किया कि उनके पिता शशि के साथ उनकी शादी को तैयार नहीं हैं लिहाज़ा वो उनका घर छोड़ देंगी.

शशि और जेनिफ़र नाटक कंपनी से निकल तो आए. लेकिन उनके पास कोई पैसे नहीं थे. जेनिफ़र के पिता ने शशि कपूर का मेहनताना देने से भी मना कर दिया था क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि शशि उनकी बेटी से शादी करें.

ऐसी स्थिति में शशि कपूर एयर इंडिया के दफ़्तर गए और वहां से उन्होंने राज कपूर को ट्रंक कॉल किया और कहा कि दो टिकटों का पैसा भेज दीजिए. राज कपूर ने सिंगापुर से बॉम्बे के लिए प्रीपेड ट्रैवल एडवांस के ज़रिए टिकट की व्यवस्था कराई.

मधु जैन ने इस शादी के बारे में लिखा है कि विलायती लड़की से शादी की बात पर कपूर खानदान में भी कोई ख़ास उत्साह नहीं था. ये शादी महज़ तीन घंटे की आर्य समाजी रीति-रिवाज़ से 2 जुलाई, 1958 को पृथ्वी राज कपूर के मांटुगा स्थित घर में हुई.

इस शादी में हिस्सा लेने कि लिए पृथ्वी राज कपूर, जो तब मुग़ले आज़म की शूटिंग जयपुर में कर रहे थे, वहां से महज़ तीन चार घंटे के लिए आ पाए थे, वो भी के. आसिफ़ ने निजी विमान करके उन्हें भेजा था.

जब निर्माता पैसे वापस मांगने लगे

शादी के एक साल के अंदर शशि कपूर पिता भी बन गए. 1960 में उनके पिता की थिएटर कंपनी भी आर्थिक अभावों के चलते बंद हो गई. इसके बाद ही शशि कपूर ने फ़िल्मों में काम करने की कोशिश शुरू की थी.

लेकिन ये इतना भी आसान नहीं था. फिल्मी दुनिया एक और कपूर के लिए तैयार नहीं थी. ना तो पृथ्वी राज कपूर शशि की कोई मदद कर पाए और ना ही राज कपूर.

इसके बाद शशि कपूर ने वही किया जो मुंबई आने वाले हर नौजवान किया करते हैं. फ़िल्मिस्तान के बाहर एक बेंच पर बैठकर खुद को स्पॉट किए जाने का इंतज़ार.

शशि कपूर ने इस बारे में मधु जैन को बताया था, "पिकनिक फिल्म के लिए धर्मेंद्र और मनोज कुमार के साथ मैंने ये बेंच साझा की था. ये फिल्म मनोज कुमार को मिली थी."

शशि कपूर को जब काम मिला तो उनकी शुरुआती फिल्में 'चार दीवारी', बीआर चोपड़ा की 'धर्मपुत्र' और विमल राय की 'प्रेमपत्र', सब फ्लॉप हो गईं.

उन दिनों ऐसी स्थिति हो गई थी कि निर्माता, निर्देशक शशि कपूर से साइनिंग अमाउंट वापस मांगने लगे थे. 1965 में जाकर 'जब जब फूल खिले' से शशि कपूर ने कामयाबी का स्वाद चखा.

लेकिन असुरक्षा की भावना ऐसी थी कि 1966 में एक फ़िल्म के साइनिंग अमाउंट के तौर पर शशि कपूर को पांच हज़ार रुपये मिले तो जेनिफ़र ने उन पैसों को छह महीने तक हाथ नहीं लगाया. डर था कि कहीं निर्माता वापस मांगने ना आ जाएं.

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कामयाबी का दौर

लेकिन 'जब जब फूल खिले' के बाद शशि कपूर का अपना दौर आया. 'प्यार का मौसम', 'प्यार किए जा', 'नींद हमारी ख़्वाब तुम्हारे', 'हसीना मान जाएगी', 'शर्मीली', 'आ गले लग जा', 'चोर मचाए शोर' और 'फ़कीरा' जैसी फ़िल्मों से उन्होंने कामयाबी का दौर देखा.

मल्टी स्टारर फ़िल्में 'वक्त', 'दीवार', 'कभी कभी', 'रोटी कपड़ा और 'मकान', 'सिलसिला' जैसी फ़िल्मों में भी वे अपनी भूमिका के साथ न्याय करते नज़र आए.

जो राज कपूर शशि कपूर के लिए कोई फिल्म नहीं बना पाए थे, वो तब 'सत्यम शिवम सुंदरम' के लिए हीरो तलाश रहे थे और उनकी तलाश शशि कपूर पर जाकर पूरी हुई थी.

इस फ़िल्म की थीम के मुताबिक, एक सबसे बदसूरत लड़की के प्यार में पड़े सबसे ख़ूबसूरत लड़के को राज कपूर फ़िल्माना चाहते थे और उन्हें उस दौर में शशि कपूर से ख़ूबसूरत कोई दूसरा स्टार नहीं मिला था, हालांकि ऋषि कपूर ने अपनी आटोबायोग्राफी 'खुल्लम खुल्ला' में लिखा है कि इस फिल्म के लिए राज कपूर पहले राजेश खन्ना को लेना चाहते थे.

कभी बच्चन उनके साथ एक्स्ट्रा में काम किया

बहरहाल, हिंदी फिल्मों के साथ शशि कपूर ऐसे पहले भारतीय अभिनेता थे, जिन्हें इंटरनेशनल स्तर पर सराहा गया. उन्होंने इस्माइल मर्चेंट और जेम्स आइवरी के साथ मिलकर 'द हाउसहोल्डर', 'शेक्सपीयर वाला', 'बॉम्बे टाकी', 'हीट एंड डस्ट' जैसी फ़िल्मों में अदाकरी के जलवे बिखेरे.

बहुत कम लोगों को ये मालूम होगा कि 'बॉम्बे टाकी' फ़िल्म में अमिताभ बच्चन ने एक्स्ट्रा की भूमिका निभाई थी.

'शशि कपूर - द हाउसहोल्डर द स्टार' किताब में असीम छाबरा ने लिखा है कि अमिताभ बच्चन ने 'दीवार' के प्रीमियर के मौके पर ये कहा था, "हमने कभी एक-दूसरे को नहीं कहा. लेकिन जब मेरे पास मां है... का डायलॉग वाला क्षण आया था मुझे एक नरम हाथ महसूस हुआ. वो शशि जी का हाथ था. उन्होंने कुछ नहीं कहा लेकिन उन्होंने जिस अंदाज़ में मेरा हाथ पकड़ा था वो सबकुछ कह रहा था. ये उस कलाकार के लिए सबकुछ मिलने जैसा था, जिसने जेम्स आइवरी की फिल्म 'बॉम्बे टाकी' में उनके सामने एक्स्ट्रा कलाकार का रोल अदा किया था और उसने कभी नहीं सोचा था कि उसे इनके साथ काम करने का मौका मिलेगा."

वैसे दिलचस्प ये भी है कि बॉम्बे टाकी के जिस दृश्य में अमिताभ अतिरिक्त कलाकार के तौर पर नज़र आए थे वह दृश्य फिल्म से काट दिया गया था.

बहरहाल जेंटलमैन शशि कपूर के फिल्म और अभिनय के बारे में संजीदगी देखनी हो तो उनके दो काम ज़रूर ध्यान में आते हैं. उनमें से एक है पृथ्वी थिएटर की पुर्नस्थापना.

1978 में उन्होंने अपनी पत्नी जेनिफ़र के साथ उसी जगह पर इसे शुरू किया था, जहां उनके पिता के समय पर इसका पर्दा गिरा था. पृथ्वी थिएटर को शुरू करने के लिए राज कपूर और शम्मी कपूर सामने नहीं आए, ये काम शशि कपूर ने किया और इसके लिए उन्होंने अपनी कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा लगाया, क्योंकि पृथ्वी थिएटर के लिए ज़मीन उन्हें बजाज परिवार से खरीदनी पड़ी थी.

पिता के काम को आगे बढ़ाया

शायद शशि को इसका अहसास रहा हो कि उन्हें अपने पिता के सपनों को नया जीवन देना हो. इसकी झलक दीपा गहलोत के साथ उनके लिखे 'पृथ्वीवालाज़' में मिलती है.

इसमें पृथ्वी राज कपूर के आख़िरी पलों का जिक्र है. कैंसर से पीड़ित पृथ्वी राज कपूर टाटा मेमोरियल अस्पताल में थे, शशि उस वक्त इंग्लैंड में थे. डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था.

शशि कपूर ने लिखा है, "जब पापाजी ने दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनी तो जल्दी से मुड़े. राज जी ने मुझे बताया कि वे तो हिल भी नहीं पा रहे थे लेकिन मेरी मौजूदगी का अहसास होते ही उन्होंने अपना सिर हिलाया. उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, मैं उनके बगल में बैठ गया, उनका हाथ पकड़कर, कुछ घंटों बाद वे चले गए. पूरी रात वह जिंदा रहे थे और राज जी उनके कान में फुसफुसाते रहे थे - शशि आ रहा है."

शशि कपूर ने पृथ्वी थिएटर के अलावा अपने पिता के परोपकार के कामों को भी आगे बढ़ाया. पृथ्वीराज कपूर मेमोरियल ट्रस्ट की ओर से सैकड़ों विधवाओं को वो हर महीने सहायता राशि भेजते रहे.

शशि कपूर ने 'फिल्मवालाज़' की स्थापना करके उन्होंने 'जुनून', '36 चौरंगी लेन', 'कलयुग', 'विजेता', 'उत्सव' और 'अजूबा' जैसी फिल्में बनाई. इनमें 'जुनून', '36 चौरंगी लेन' और 'कलयुग' को समानांतर फिल्मों में बेहद अहम माना जाता है.

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नुकसान उठाकर बनाईं फ़िल्में

शशि कपूर ने मधु जैन को बताया था, "मैंने 'कलयुग' में दस लाख, 'विजेता' में 40 लाख, '36 चौरंगी लेन' में 24 लाख, 'उत्सव' में डेढ़ करोड़ और 'अजूबा' में साढ़े तीन करोड़ रुपये गंवा दिए."

शशि कपूर की पत्नी जेनि़फर का निधन भी कैंसर से 1984 में हुआ था, तब तक शशि कपूर बॉलीवुड के सबसे आकर्षक अभिनेता बने रहे, उनके शरीर पर चर्बी का एक इंच नहीं चढ़ा.

पत्नी के निधन के बाद शशि मोटे होते हो गए और काफ़ी हद तक एकाकी भी. लेकिन इसके बाद 'न्यू देहली टाइम्स' जैसी अहम फ़िल्म में उन्होंने अपनी अदाकारी के जलवे दिखाए थे.

शशि कपूर की पर्सनेलेटी कैसी थी, इसके बारे में फेलिसिटी कैंडल ने व्हाइट कार्गो में लिखा है, "वे काफी हंसमुख और आकर्षक थे. मैं इतने ज़्यादा इश्कबाज़ इंसान से कभी नहीं मिली. वो प्यार से तारीफ़ें करने और साथ ही हड़काने का काम बखूबी अंजाम देते, वो भी मोहक अंदाज में कि कोई उन्हें रोक नहीं सकता. वो बेहद दुबले थे, लेकिन आंखें खूब बड़ी-बड़ी, लंबी घनी पलकों का किनारा लगता कि और बहका रही हों. उनके चमकदार सफेद दांत और गालों पर पड़ते शरारती डिंपल के साथ वह महिलाओं और पुरुषों में किसी के भी दिल में अपना रास्ता बना लेते."

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