छत्तीसगढ़: रायपुर में घुसा जंगली हाथियों का दल

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छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शनिवार की सुबह लोगों को पता चला कि रायपुर और नया रायपुर के बीच जंगली हाथियों का एक दल घूम रहा है.

हाथियों के इस दल ने ऐसे समय में राजधानी में दस्तक दी है, जब महीने भर पहले ही सरकार ने हाथी कॉरिडोर में कोयला खनन को मंज़ूरी दी है.

वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार नया रायपुर के इलाके के पास पहुंचे इस दल में 18 हाथी हैं, जिनमें से कई ख़तरनाक भी हैं.

हाथियों को भगाने के लिए वन विभाग का अमला मुस्तैद है लेकिन इन्हें भगाया कैसे जाए, ये सबसे बड़ा सवाल है. ऐसे में लाठी लेकर भीड़ को हाथी के इलाके से दूर रखने को ही वन विभाग सबसे बड़ी चुनौती मान रहा है.

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वन्य जीव विशेषज्ञ मीतू गुप्ता कहती हैं, "एक वयस्क हाथी 35 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से दौड़ सकता है. आप अनुमान लगा लें कि शहर के बीचों-बीच पहुंचने में हाथियों को कितना वक़्त लगेगा. आख़िर हाथियों को अपना घर छोड़कर आबादी वाले इलाके की ओर क्यों आना पड़ रहा है- यह सवाल कहीं अधिक महत्वपूर्ण है."

वन विभाग के अधिकारियों की मानें तो पिछले छह महीने से ये हाथी ओडिशा से छत्तीसगढ़ में प्रवेश कर रहे हैं और लगातार फ़सलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं.

राज्य के वन मंत्री महेश गागड़ा के अनुसार राज्य के बारनवापारा अभयारण्य में हाथी आ रहे हैं. खेतों में कटाई के बाद रखी धान की फसल और अरहर की आसान उपलब्धता के कारण हाथी गांवों का रुख कर रहे हैं.

लेकिन छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला का दावा है कि सरकार हाथियों और दूसरे वन्य जीवों को लगातार बेघर कर रही है और फिर उन्हें आबादी के इलाके में आने के लिये बाध्य कर रही है.

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Image caption आलोक शुक्ला

आलोक शुक्ला कहते हैं, "सरकार पूरे राज्य में इन हाथियों के घरों में कोल माइनिंग कर रही है तो आखिर हाथी जाएंगे कहां? हाथी यहां से वहां भटक रहे हैं, लोगों को मार रहे हैं और खुद भी मारे जा रहे हैं."

आलोक शुक्ला के आरोपों को नकारा भी नहीं जा सकता. छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जंगलों में लगभग 400 हाथी हैं. राज्य बनने के कुछ सालों तक तो राज्य सरकार इन हाथियों को बाहरी बताकर अपना पल्ला झाड़ती रही. कभी इन्हें ओडिशा से आया हाथी बताया गया तो कभी झारखंड का.

लेकिन जब हाथियों से होने वाला नुक़सान बढ़ गया तो राज्य सरकार ने कोरबा, रायगढ़ और सरगुजा के घने जंगलों वाले इलाके को चिन्हित करके एलिफेंट रिज़र्व बनाने का संकल्प विधानसभा से पारित कर केंद्र सरकार को भेजा.

लेकिन असली खेल इसके बाद शुरू हुआ और 375 हाथियों वाले हसदेव अरण्य और मांड रायगढ़ के इलाके में दो एलिफेंट रिज़र्व बनाने के लिए केंद्र सरकार की सहमति के बाद राज्य सरकार ने इस पर चुप्पी साध ली.

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Image caption कोयला खदान

हाथी वाले इलाके कंपनियों को

साल 2011 में जब केंद्र ने नाराजगी जताई तो पता चला कि जिन इलाकों में सबसे अधिक हाथी रहते थे, उसी इलाके को कोयला खनन के लिए कई निजी कंपनियों को दे दिया गया. यहां तक कि केंद्र सरकार ने साल 2009 में जिसे 'नो गो एरिया' घोषित कर रखा था, उसे भी 2011 में कोल ब्लॉक के लिए बांट दिया गया.

जब एलिफ़ेंट रिज़र्व को लेकर हंगामा हुआ तो सरकार ने पहले से ही संरक्षित बादलखोल, तमोरपिंगला और सेमरसोत वन्यजीव अभयारण्य को एलिफ़ेंट रिज़र्व घोषित कर दिया. यानी एलिफ़ेंट रिज़र्व तो बना नहीं, उलटा हाथियों के इलाके में कोल माइनिंग शुरू कर दी गई.

इसका परिणाम ये हुआ कि कोरबा, सरगुजा, रायगढ़ और जशपुर जैसे इलाकों में हाथियों ने घरों, लोगों और उनकी फसलों पर हमला बोलना शुरू किया.

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आंकड़े बताते हैं कि 2015 से इस साल जनवरी तक करीब 175 लोग हाथियों के हमले में मारे गए हैं, वहीं 43 हज़ार से अधिक घरों को हाथियों ने तोड़ दिया और फसलों को नुकसान पहुंचाया. इस दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने हाथियों को भी मार डाला.

लेकिन सरकार ने इन घटनाओं से कोई सबक लिया हो ऐसा लगता नहीं है. सरकार ने सेमरसोत, तमोरपिंगला और बादलखोल अभयारण्य के जिस इलाके को एलिफेंट रिज़र्व का इलाका घोषित किया था, उसी में अब साउथ इस्टर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड कोयला खदान बनाने जा रही है.

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला कहते हैं, "पिछले महीने ही सरकार ने हाथी कॉरिडोर के 686.151 हेक्टेयर इलाके में कोल खदान को हरी झंडी दे दी है. सदियों से हाथियों के आने-जाने और रहवास वाले सूरजपुर ज़िले के जगन्नाथपुर के इलाके में जब कोयले के लिए खुदाई होगी तो फिर भड़के हुए हाथियों के लिए आप किसे ज़िम्मेवार ठहराएंगे?"

लेकिन राज्य के वन मंत्री महेश गागड़ा के पास हाथियों से बचने के अपने उपाय हैं, जिस पर वो काम करने की बात कह रहे हैं.

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कर्मचारियों को प्रशिक्षण

वनमंत्री गागड़ा कहते हैं, "हम हाथियों पर काबू पाने की कोशिश कर रहे हैं. कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और असम में जिस तरह से जंगली हाथियों को प्रशिक्षित किया जाता है, उसी तरह से यहां भी हाथियों को काबू में लाने के लिए कर्मचारियों को प्रशिक्षण के लिए कर्नाटक भेजा गया है. जो हुड़दंग मचाने वाले हाथी हैं, उनके लिये तमोरपिंगला अभयारण्य में रेसक्यू सेंटर बनाया जा रहा है."

कभी हाथियों को पकड़कर उन्हें घायल होते, मरते या बांधकर रखने की क्रूर कोशिश हो या करोड़ों रुपये की लागत से कई सौ किलोमीटर तक सोलर फेंसिंग कर हाथियों को रोकने की कोशिश, सरकार पैसा खर्च करने के अलावा कोई और उल्लेखनीय सफलता अब तक अपने खाते में नहीं दर्ज करवा पाई है.

ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि वन मंत्री की ताज़ा कोशिश राज्य में मानव-हाथी संघर्ष रोकने में सफल होगी या इसका भी वही हश्र होगा, जैसा सरकार की दूसरी योजनाओं का हुआ है.

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पान का शौकीन हाथी!

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