'बेने' इसराइलियों के दिल में बसता है भारत

शर्ली पालकर इमेज कॉपीरइट SHIRLEY PALKAR

"मैं 18 साल की थी जब मैंने भारत छोड़ कर इसराइल में बसने का फ़ैसला किया. मेरे लिए ये कोई आसान फ़ैसला नहीं था." ये हैं शर्ली पालकर जो यहूदी हैं और अब इसराइल में बस गई हैं.

मराठी बोलने वाली शर्ली कहती हैं, "मुझे काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा. लेकिन किसी तरह से मैंने उन मुश्किलों को पार किया और अब यहीं रहती हूं. अब यही मेरा देश है. लेकिन भारत के लिए मेरे प्यार कुछ ऐसा है कि उसकी तुलना किसी के साथ नहीं कर सकती."

शर्ली मुंबई के नज़दीक ठाणे में श्रीरंग सोसाइटी में रहती थीं. उन्होंने ठाणे के प्रतिष्ठित सरस्वती एजुकेशन ट्रस्ट से अपनी अपनी पढ़ाई पूरी की.

आज इसराइल गए हुए उन्हें 20 साल से अधिक समय हो चुका है. वहं वो गेदेरा शहर में रहती हैं. वो शिक्षा विभाग में बतौर ऑफ़िस मैनेजर काम करती हैं.

वो कहती हैं, "यहां बसने से पहले मैं एक पर्यटक के रूप में यहां आई, मेरे अधिकतर कज़न भाई-बहन यहां रहते हैं. जब मैं 20 साल पहले यहां आई थी मैंने देखा कि यहां पर बेशुमार मौक़े हैं. मैंने फ़ैसला किया कि मैं यहां बस जाऊंगी."

'येरूशलम पर ट्रंप के क़दम के गंभीर परिणाम होंगे'

यरूशलम क्यों है दुनिया का सबसे विवादित स्थल?

इसराइली नागरिक के रूप में चुनौती

इमेज कॉपीरइट ABBAS MOMANI/AFP/GETTY IMAGES

किसी देश में बतौर पर्यटक जाना और असल में उसी देश का नागरिक बनने में काफ़ी फ़र्क़ है. शर्ली को जल्द ही इस बात का पता चल गया.

वो कहती हैं, "मेरे लिए सबसे बड़ी समस्या थी वहां की भाषा. हालांकि हम यहूदी हैं लेकिन हम मराठी ही बोलते थे और किसी और भारतीय की तरह हिंदी, अंग्रेज़ी में बात करते थे. लेकिन यहां इसराइल में हिब्रू जानना अनिवार्य है. अगर आग हिब्रू नहीं जानते तो आप कोई काम कर ही नहीं सकते."

वो अपने उन मुश्किल दौर को याद करती हैं, "मैंने हिब्रू भाषा सिखाने वाले एक सरकारी कार्यक्रम में अपना नाम लिखवा दिया. उस कार्यक्रम के बाद मैंने ख़ुद अपना ख़र्च संभाला और यहां का नागरिक बनने योग्य हिब्रू सीखा."

मुश्किलें सिर्फ भाषा सीखने तक ही सीमित नहीं थीं. खाना, कपड़े पहनने का तरीका, रीति-रिवाज़, संस्कृति.... हर चीज़ करना एक चुनौती की तरह था. लेकिन दूसरे बेने इसारइलों की तरह, जैसा कि यहां भारतीय यहूदियों को कहा जाता है- शर्ली ने भी धीरे-धीरे चुनौतियों पर जीत हासिल करना सीख लिया.

बेने इज़राइल यहूदियों का एक समूह है जो उन्नीसवीं शताब्दी में कोंकण क्षेत्र के गांवों से निकलकर पास के भारतीय शहरों में जाकर बस गया था.

यरूशलम में हिंसा, अमरीका ने दी चेतावनी

क्या कब्ज़े वाला पूर्वी यरुशलम फ़लस्तीनियों की राजधानी बनेगा?

इमेज कॉपीरइट SHIRLEY PALKAR

शर्ली कहती हैं, "लेकिन हमने अपने रीति -रिवाजों का पालन करना जारी रखा. हम बेने इसराइलियों के ख़ास रिवाजों का पूरी तरह पालन करते थे."

"देखा जाए तो हर देश में यहूदियों को कमतर समझा जाता है. कई देशों में उनके साथ क्रूर व्यवहार भी किया गया है. इसलिए अधिकांश इसराइलियों अपने-अपने देशों को भूल जाना चाहते हैं. वो उस देश के साथ घनिष्ठ संबंध नहीं बनाए रखना चाहते जहां पर उनका जन्म हुआ."

शर्ली भारत के लिए अपने प्यार के बारे में कहती हैं, "लेकिन हम बेने इसराइलियों की बात कुछ और है. भारत में हमारे साथ प्यार और सम्मान के साथ व्यवहार किया जाता है और हम इस बात की कद्र करते हैं."

हिंदू और यहूदी धर्म में क्या कॉमन है?

भारतीय यहूदी चाहते हैं इसराइली संसद में प्रतिनिधित्व

बेने इसराइलियों का इतिहास

इमेज कॉपीरइट SHIRLEY PALKAR
Image caption मुंबई के पनवेल में मौजूद बेनमे इसराइलियों का सिनेगॉग यानी यहूदी मंदिर

शर्ली पालकर अकेली ऐसी मराठी भाषी बेने इसराइली नहीं हैं जो इसराइल में जा कर बस गई हैं. प्रोफ़ेसर विजय तापस मराठी भाषा कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए इसराइल गए.

वो इस बात पर रोशनी डालते हैं कि 1948 से यहूदी राष्ट्र के गठन के साथ, मराठी भाषी यहूदी धीरे-धीरे 'ईश्वर का देश' की ओर पलायन कर रहे हैं. वो कहते हैं कि एक अनुमान के मुताबिक़ आज बीरशेवा, अशदोद अशक्लोन, लोद, रामले, येरुहम, डिमोना और हैफा आदि शहरों में 50 हजार बेने इसराइली बसे हुए हैं.

हिब्रू बाइबल के अनुसार ईश्वर ने अब्राहम और उनके वंशजों को 'ईश्वर के देश' का वादा किया था. माना जाता है कि ये इलाक़ा मिस्र नदी और यूफ्रेट्स नदी के बीच में मौजूद है.

लेकिन ये पहली बार नहीं है कि बेने इसराइली स्थानांतरण कर रहे हैं. 2000 साल पहले भी वो स्थानांतरण कर रहे थे. लेकिन उस वक्त वो इसराइल से महाराष्ट्र की ओर आ रहे थे.

इसराइल ने हरम-अल शरीफ़ से मेटल डिटेक्टर हटाए

कान- मंत्री की 'येरूशलम ड्रेस' से सोशल पर बवाल

इमेज कॉपीरइट SHIRLEY PALKAR

इसरायल में अत्याचारों का सामना करके आए यहूदी परिवारों को ले जाने वाला एक जहाज भारत के पश्चिमी तट पर टूट गया था. ये जगह आज के महाराष्ट्र के रायगढ़ ज़िले के नज़दीक है. कहा जाता है कि 7 पुरुष और 7 महिलाओं को छोड़ कर जहाज़ पर सवार सभी लोगों की मौत हो गई. ये लोग बच कर नवगांव नामक गांव पहुंचे.

इसी गांव में उन्होंने अपने परिजनों के शवों को दफ़न किया. भारत में यहूदियों का पहला कब्रिस्तान यही था. इन लोगों की अलग भाषा और अलग रीति-रिवाज़ रायगढ़ ज़िले में स्थानीय लोगों की उत्सुकता बढ़ाने के लिए काफ़ी थे. जब इन नए लोगों से पूछा गया कि आप कौन हैं तो उन्होंने बताया कि "हम बेने इसराइली हैं."

रूइया कॉलेज में इतिहास के प्रोफ़ेसर मोहसिना मुकदम कहती हैं, "हिब्रू में बेने का मतलब होता है बेटा. ये समुदाय ख़ुद को इसराल का बेटा कहता है."

यरूशलम इसराइल की राजधानी: डोनल्ड ट्रंप

यरूशलम पर ट्रंप के फ़ैसले की चौतरफ़ा निंदा

इमेज कॉपीरइट SHIRLEY PALKAR

कोंकण इलाक़े में बेने इसराइलियों को शनिवार तेली के नाम से जाना जाता है. शनिवार का मतलब सप्ताह का छठा दिन यानी सैटर्डे और तेली का अर्थ होता है तेल का व्यवसाय करने वाला.

महाराष्ट्र के यहूदी समुदाय को भी शनिवार तेली के नाम से जाना जाता है. लेकिन इसका नाता यहूदी रिवाज़ शबत से है. इस रिवाज़ के अनुसार ये लोग शबत के दिन यानी शनिवार के दिन काम नहीं करते.

माना जाता है कि जिन हालातों में इस समुदाय के लोगों का भारतीय ज़मीन पर आना हुआ, उनके पास उनकी अपनी पवित्र पुस्तकें (धार्मिक ग्रंथ) नहीं थीं. और इसीलिए ये लोग लंबे समय तक अपने धार्मिक ग्रंथों से जुड़ नहीं सके. जिन लोगों को अपने धर्म की बातें याद थीं उन्होंने यहूदी परंपराओं का पालन करना जारी रखा.

ब्रिटिश शासनकाल के दौरान, कोंकण इलाके में बसे कई इसराइली मुंबई आ गए थे. जब 1948 में इसराइल बनाया गया था, तो दुनिया भर में यहूदी समुदाय के लोगों से अपील की गई कि वो वापिस उस 'ईश्वर का देश' में आएं जिसका वादा खुद ईश्वर ने किया था. कई बेने इसलरायलियों ने इस अपील के बाद इसराइल का रुख़ किया.

लेकिन इसराइल में बसने के बाद भी वो महाराष्ट्र की अपनी संस्कृति का पालन करते रहे.

'येरूशलम को लेकर अमरीका के ख़िलाफ़ विरोध'

सऊदी और इसराइल की दोस्ती से ईरान का क्या बिगड़ेगा?

पास आ गईं दो संस्कृतियां

इमेज कॉपीरइट SAM PANTHAKY/AFP/GettyImages

मोहसिना मुकादम कहती हैं, "इससे पहले बेने इसराइलियों को अलग लोगों के रूप में नहीं देखा गया था. लेकिन ब्रिटिश आए और उन्होंने इन लोगों के कुछ अलग रीति-रिवाजों को देखा."

"यहूदी मछली केवल उसके शल्क के साथ खाते हैं यानी खाल के ऊपर की पपड़ी बिना साफ किए. ये लोग शनिवार को काम नहीं करते. उनके खाना पकाने के तरीके भी काफ़ी अलग होते हैं. जानवरों को मारने के उनके तरीके भी अनूठे है. ब्रितानियों ने महसूस किया कि ये लोग तो यहूदी हैं."

पुणे में रहने वाले बेने इसराइल सैमुएल रोहेकर कहते हैं, "ब्रिटिश शासन के दौरान ईसराइलियों को काफ़ी महत्वपूर्ण दर्जा दिया गया. उन्होंने सेना, रेलवे, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में काम किया."

अमरीका ने यरूशलम में हिंसा का दोष यूएन पर डाला

इसराइल के बनने की कहानी

इमेज कॉपीरइट SHIRLEY PALKAR

सैमुएल कहते हैं, "जब वो मुंबई आए, तो उन्होंने आज जहां पर मस्जिद स्टेशन है उसके नज़दीक अपना एक यहूदी मंदिर स्थापित किया."

वो कहते हैं, "एक यहूदी मंदिर के भीतर आपको कभी कोई मूर्ति नहीं मिलेगी. हम अपनी पवित्र पुस्तकों को एक अलमारी में रखते हैं. इस अलमारी को पश्चिम की तरफ रखा जाता है. हिब्रू में इन किताबों को 'सेफेर टोरा' कहा जाता है. महीने में एक बार किसी शनिवार को इन पवित्र ग्रंथों को पढ़ा जाता है."

बेने इसराइलियों ने कई हिंदू परंपराओं को अपनाया जैसे कि शादी की रस्में निभाना या चूड़ियां पहनना.

यहूदियों के लिए विवाह अनुष्ठानों में ताज़े अंगूर के वाइन का विशेष स्थान है. इस शराब को वो किद्दुश कहते हैं. यहूदी उत्सवों में किद्दुश महत्वपूर्ण माना जाता है. शादी के समारोह में इसकी अहम भूमिका होती है.

शर्ली पालकर कहती हैं, "इज़राइलियों के उत्सवों में ख़ास तौर पर 'मालिदा' नाम के एक उत्सव का पालन किया जाता है. यह उत्सव मराठी हिंदू परंपरा 'सत्यनारायण' के जैसा ही है. हर शुभ अवसर पर ये किया जाता है."

क्या खिचड़ी पक रही है सऊदी और इसराइल के बीच?

इमेज कॉपीरइट Science Photo Library

शर्ली बेने इसरायलियों और अन्य यहूदियों के बीच के अंतर के बारे में कहती हैं, "अन्य देशों में, यहूदियों पर अत्याचार हुआ. इसलिए वो वहां के स्थानीय लोगों के साथ मिल नहीं पाए. लेकिन भारत में मामला अलग था. भारतीयों ने हमें सम्मान दिया और इज़्ज़त के साथ व्यवहार किया. ऐर हम भारतीय संस्कृति के साथ इस तरह जुड़ गए उनकी कई परंपराएं हमने अपना लीं."

जब चीन ने कहा, 'पाकिस्तान चीन का इसराइल है'

रेत में कैसे हरियाली लाता है इसराइल?

मराठी सीखने की इच्छा

मूल रूप से सबसे पहले इसराइल जाने वाले बने इसराइली अच्छी मराठी बोलते थे. लेकिन उनकी नई पीढ़ी बहुत अच्छी मराठी नहीं बोलती. और इसिलिए बेने इसराइली समुदाय ने मराठी सीखने के कार्यक्रम शुरू किए हैं.

एसे ही एक कार्यक्रम का हिस्सा बन कर प्रोफ़ेसर विजय तापस मुंबई से इसराइल गए थे. वो कहते हैं, "बेने इसराइली मराठी का बहुत सम्मान करते हैं उनमें इस भाषा को सीखने के लिए उत्साह है. भारत के साथ उनके मज़बूत संबंध हैं. भारत में अधिकांश यहूदी मंदिरों के लिए यही लोग आर्थिक मदद देते हैं."

इमेज कॉपीरइट SAM PANTHAKY/AFP/GettyImages
Image caption अहमदाबाद के यहूदी मंदिर में 'सेफेर टोरा' रखे जाने का समारोह

इसराइल में अपनी ज़िंदगी के अधिकांश साल बिताने के बद भी बेने इसराइलियों के दिलों में भारत के लिए विशेष स्थान है. शर्ली कहते हैं, "हमारे दिल में भारत का अलग ही स्थान है. हम अभी भी वहां जाते हैं. हाल तक मेरे माता-पिता ठाणे में थे. मेरी बहन मुंबई में है. जब भी मैं मुंबई जाती हूं, मैं खाने की चीज़ों की एक लंबी फ़ेहरिस्त बनाती हूं. मुझे बड़ा-पाव, चाट काफ़ी पसंद है."

शर्ली के माता-पिता हाल ही में इसराइल गए हैं, लेकिन उनके लिए इस परिवर्तन से निपटना काफ़ी मुश्किल है.

लेकिन शर्ली की बेटी इसराइल में ही पैदा हुई है. वो मराठी में बात कर सकती हैं लेकिन वो हमेशा के लिए भारत में नहीं रहना चाहती.

हमसे पूछिए: 'मुश्किल वक्त में आगे भी साथ होगा इसराइल'

अमरीकी राष्ट्रपति की घोषणा

इमेज कॉपीरइट Joe Raedle/Getty Images

शर्ली कहती हैं, "यरूशलम के बारे में अमरीका ने जो घोषणा की है उससे इसराइल में रहने वाले मराठी यहूदी खुश हैं. यरूशलम इसराइल की राजधानी था और है. लेकिन अमेरिका की इस घोषणा के बाद अब चीज़ें तेज़ी से बदलने वाली हैं. यरूशलम को अब अपने सबसे कठिन वक्त का सामना करना पड़ेगा और मैं इसके लिए चिंतित हूं."

यरूशलम में रहने वाले नोआ मसिल भी मराठी बोलते हैं. वो कहते हैं, "हम राष्ट्रपति ट्रंप के फ़ैसले का स्वागत करते हैं. यरूशलम में स्थिति हमेशा तनावपूर्ण रही है और हाल की घटनाओं से हिंसा और बढ़ने वाली है. भारत को अमरीका का साथ देना चाहिए और यरूशलम में अपना दूतावास खोलना चाहिए."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)