नजरियाः 'आधार लिंक करने के गंभीर परिणामों को पहचाने सरकार'

आधार इमेज कॉपीरइट Getty Images

केंद्र सरकार ने बैंक खातों को आधार से लिंक करने की आखिरी तारीख पर अपना फैसला टाल दिया है. वित्त मंत्रालय ने बुधवार को नोटिफिकेशन जारी कर इस बात की जानकारी दी.

केंद्र सरकार ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत आधार से बैंक खातों को लिंक करने की अंतिम तारीख 31 दिसंबर 2017 को बढ़ा दिया है. आधार पर गुरुवार को अहम सुनवाई से पहले सरकार का यह फैसला आया है. हालांकि आधार से दूसरी चीजों जैसे पैन कार्ड, मोबाइल नंबर आदि को जोड़ने की तारीख में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है.

8 दिसंबर को सरकार ने आधार को पैन कार्ड से लिंक करने की आखिरी तारीख को बढ़ाकर 31 मार्च 2018 कर दिया है. पैन कार्ड को आधार से लिंक किए बिना अगले साल टैक्स जमा नहीं कर पाएंगे. हालांकि इस साल भी जिन लोगों के आधार-पैन लिंक नहीं थे उन्हें भी टैक्स जमा करने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था.

बीबीसी ने अर्थशास्त्री रितिका खेड़ा से इस पर विस्तृत बातचीत की. उन्होंने आधार को असंवैधानिक बताते हुए इस पर विस्तृत बातचीत की.

बैंक खाते को आधार से जोड़ने की तारीख़ बढ़ी

टैक्स रिटर्न के लिए 'आधार' ज़रूरी करने की तैयारी

इमेज कॉपीरइट Getty Images

पढ़ें रितिका खेड़ा का नज़रिया

सरकार हर चीज में आधार को अनिवार्य बनाती जा रही थी. 31 दिसंबर की तारीख बैंक से लिंक करने की अंतिम तारीख थी जिसे नोटिफिकेशन के अनुसार बढ़ा दिया गया था.

सुप्रीम कोर्ट में हो रही सुनवाई में बैंक से लिंक किया जाना एक मुद्दा है. यहां कई अन्य चीजें भी हैं. करीब 22 याचिकाएं हैं. सरकार ने जनवितरण प्रणाली, नरेगा, मिड डे मील, पेंशन, स्कॉलरशिप के लिए कोई न कोई डेड लाइन दी गई हैं.

आधार से नहीं जोड़े जाने और राशन नहीं मिलने के कारण झारखंड में 11 वर्षीय दलित संतोषी, प्रेमी कुमारी और रूप लाल मरांडी की मौत हो गई.

लोगों को मिली राहत

कहीं कहीं से यह ख़बर आ रही थी लोग अपने पैसे को एक्सेस नहीं कर पा रहे थे. वित्त मंत्रालय के 13 दिसंबर की नोटिफिकेशन के कारण लोगों को राहत मिली है.

सरकार अगर दूसरी योजनाओं से भी इसे हटा दे तो हर महीने राशन या पेंशन उठाने के लिए इतनी तकलीफ नहीं उठानी पड़ेगी. क्योंकि अधिकतर मामलों में उंगलियों का मिलान नहीं हो पाया.

पैन कार्ड और मोबाइल लिंक करने के विषय में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया कहा था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने तो केवल केवाईसी के लिए कहा था, न कि आधार जोड़ने के लिए.

याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट के सामने हैं जिनमें ऐसा कहा गया है कि पूरा आधार प्रोजेक्ट ही असंवैधानिक है.

सरकार की किरकिरी

सरकार बार बार तारीख बदल रही है और अगर कारण सही है तो किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए. अगर लोगों को तकलीफ हो रही है और सरकार लोगों की आवाज़ सुनते हुए अपने निर्णय बदलती है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए.

लोकतंत्र में मतभेद की गुंजाइश है. लोग अपनी राय रखेंगे और एक दूसरे को मनाने की कोशिश करेगी.

2009 में यूपीए-2 आधार प्रोजेक्ट लायी थी, ये असंवैधानिक है, लोगों को इससे नुकसान हो रहा है. भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए इसका विरोध किया था. उसे अपने उसी स्टैंड पर कायम रहते हुए इसे वापस ले लेना चाहिए.

अहम बातें

आधार प्रोजेक्ट लाया गया तो लोगों के बताया गया कि हकों से वंचित लोगों को इससे बहुत फायदा मिलेगा. लेकिन अगर आज आपके पास आधार है तो उससे आपको जनवितरण प्रणाली से सस्ता अनाज और वृद्धावस्था पेंशन मिल जायेगा.

जो नियम हैं अगर आप उसको पूरा नहीं करते तो आपको उसकी सुविधाएं नहीं मिलेंगी.

इससे भ्रष्टाचार कम होगा. लेकिन झारखंड में राशन के लिए आधार अनिवार्य किया गया. लेकिन लोग दुकानों में जाते हैं. अंगूठा लगाते हैं. लेकिन आपको कहा जाता है कि अंगूठे का मिलान नहीं हो सका. और आप राशन से वंचित रह जाते हैं. उसका राशन (चाहे जितने किलो का भी हो) वहां चढ़ जाता है लेकिन जिसे मिलना चाहिए था उसे नहीं मिलता. भ्रष्टाचार या तो हटा नहीं है या बढ़ गया है.

अगर सरकार एक ही नंबर को हर एक डेटाबेस में डाल देगी तो उससे हमारी हर गतिविधियों को जान सकेगी जिसका दुरुपयोग किया जा सकता है.

इसे रोकने के लिए हमारे पास लीगल प्रोटेक्शन नहीं है. अगर यह लायी भी जाती है तो 2011 के अनुसार हमारे समाज में 30 फ़ीसदी लोग अशिक्षित हैं. जो शिक्षित हैं वो भी क्या इन चीजों से खुद को बचा पायेंगे या नहीं.

ये प्रोजेक्ट लोकतंत्र की जड़ पर हमला करता है. इस पर सोच विचार करने की बहुत गंभीर जरूरत है.

आधार के खतरों को पहचाने सरकार

नोटबंदी पर सरकार पूरी तरह असफल रही. अब उसके पास यह मौका है कि वो आधार से होने वाले नुकसान की गंभीरता को समझे. जीएसटी में एक आर्थिक सिद्धांत है लेकिन नोटबंदी तो तर्कहीन था. नोटबंदी की नीति ख़राब थी और उसे लागू भी बहुत बुरी तरह से किया गया.

ग्रामीण क्षेत्रों में पेंशनभोगियों, मनरेगा के लोगों को परेशानी हो रही है.

अगर लोगों की पहुंच अपने बैंक अकाउंट तक न हो तो यह बहुत गंभीर मसला होता. फिलहाल यह खतरा टल गया है. लेकिन सरकार को अन्य मसलों पर भी गंभीरता से विचार करना होगा.

(बीबीसी संवाददाता अभिजीत श्रीवास्तव से बातचीत के आधार पर)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे