ब्लाइंड बच्चों का 'लकी' हॉस्टल क्यों मिल गया मिट्टी में?

दीपक और देव

काला सा मोबाइलनुमा डिब्बा निकाल कर दीपक अपने कान पर लगाते हैं और उसमें से आवाज़ आती है:

पेज 26, हिमालय किधर है.

दीपक के बगल में खड़ा देव झट से जवाब देता है, पतंग जिस तरफ़ उड़ रही है हिमालय उधर है.

फिर से एक बार मोबाइलनुमा डिब्बा दीपक अपने कान से लगते है और उसमें से आवाज़ आती है बनारस किस के लिए जाना जाता है.

बिना किसी को बोलने का मौका दिए, देव तपाक से जवाब देता है, बनारस तो मंदिरों के लिए जाना जाता है.

देव और दीपक दोनों देख नहीं सकते इसलिए इस ढंग से पढ़ाई करते हैं.

स्कूल से मिलने वाले इस डिवाइस का नाम प्लेक्सटॉक है. इसकी क़ीमत 11,000 रुपए है लेकिन पिछले छह दिनों देव का प्लेक्सटॉक नहीं मिल रहा है.

क्या है पूरा मामला?

वजह ये है कि देव और दीपक दिल्ली में जनकपुरी के जिस ब्लाइंड हॉस्टल में रहते थे, उसे इसी महीने की 15 तारीख को दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी (डीडीए) ने तोड़ दिया.

देव और दीपक पिछले चार साल से साथी हैं और ब्लाइंड होस्टल में साथ रह कर पढ़ाई करते थे. डीडीए के रिकॉर्ड में ये होस्टल अवैध था और डीडीए की ज़मीन पर कब्ज़ा कर बनाया गया था.

डीडीए का पक्ष

2010 से मामला कोर्ट में चल रहा था, जिसके बाद डीडीए ने बहुत बार उनको वहां से छोड़ कर जाने की चेतावनी दी. जब वो नहीं माने तो अंत में डीडीए को ये क़दम उठाना पड़ा.

लेकिन डीडीए की कार्यवाई के दिन होस्टल में मौजूद दिनेश कुछ और ही कहानी सुनते हैं.

उनके मुताबिक,"जब डीडीए के अधिकारी हमारा होस्टल गिरने आये थे तो 15 पुलिस वाले भी साथ में थे. उन्होंने हॉटल के कर्ताधर्ता कमलेश को अपनी गाड़ी में बिठा लिया और फिर हमारे होस्टल पर बुलडोज़र चलवा दिया. हमारा सारा सामान अंदर ही रह गया. पढ़ाई करने वाला डिवाइस प्लेक्सटॉक और डिसेबिलिटी सर्टिफ़िकेट भी."

इतना कहते कहते दिनेश का गला रूंध जाता है. उसके आगे की बात पूछने पर वो रोते हुए कहता है, "एक प्लेक्सटॉक की क़ीमत 11 हज़ार रुपये है और गुम हो जाने पर हमें 12वीं पास होने का सर्टिफ़िकेट भी नहीं मिलेगा." यह कहते हुए आगे के भविष्य की चिंता उसके चेहरे पर साफ़ दिखती है.

जनकपुरी ब्लाइंड स्कूल में पढ़ रहे 17 बच्चों की यही सबसे बड़ी समस्या है. यहां कोई बिहार से आया है, कोई बंगाल से तो कोई उत्तर प्रदेश से. हॉस्टल बहुत विख्यात तो नहीं है, लेकिन यहां रहने वाले बच्चों की माने तो हॉस्टल बहुत लकी है.

यहां रह रहे बच्चों का दावा है कि यहां से पढ़ कर निकले बच्चे किसी न किसी सरकारी नौकरी में ज़रूर लग जाते हैं. यही सुन कर हर साल कुछ नए लड़के इनसे जुड़ते है और कुछ पुराने छोड़ कर नौकरी पर निकल जाते हैं.

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ठंड में टेंट में रहने को मजबूर

दिक्कतें दूसरी भी है. पिछले छह दिन से ठंड के मौसम में खुले आसमान के नीचे एक फटेहाल टेंट में रह रहें है. छह दिन से तीन वक़्त का खाना भी इन्हें नसीब नही हुआ.

कमलेश इन 17 लोगों में से एक हैं जो इस ब्लाइंड होस्टल में रहने वाले बच्चों की देख रेख करते हैं. वो ख़ुद भी देख नहीं सकते. लेकिन अपने साथियों की देखरेख में कोई कसर नही छोड़ते. कमलेश के मुताबिक वो पिछले 17 साल से यहां ऐसे ही रह रहे हैं.

लोगों के दान दिए आटा, चावल, कपड़ा और सामान से उनका दिन किसी तरह चलता है. लेकिन पिछले 17 साल में राशन की कभी दिक्कत नहीं आई. कमलेश कहते हैं, "कुछ ऐसे भी मदद करने वाले लोग हैं, जो कुछ घट जाए तो फ़ोन करने पर सामान पहुंचा तक जाते हैं."

जब एक ब्लाइंड लड़की से लड़के को प्यार हुआ...

हॉस्टल के बारे में बताते हुए वो कहते हैं, "ये दिल्ली अर्बन शेल्टर इंप्रूवमेंट बोर्ड (DUSIB) ने बनाया था. इसमें 7 कमरे, एक टॉयलेट और एक किचन था. हम आराम से रह रहे थे. सरकार को हटाना था, तो पहले से हमारे लिए कोई व्यवस्था करते. बताओ अब हम कहाँ जाएं."

डीडीए से जब हमने यही सवाल किया तो वहां उनका जवाब था, "इन्हें पड़ोस के कम्युनिटी हॉल में शिफ़्ट किया जा रहा है, पर ये जाने को तैयार नहीं. इनको मनाने की कोशिश जारी है."

देव, कमलेश और उनके बाक़ी साथियों का कहना है कि अगर शादी के लिए कम्युनिटी हॉल की बुकिंग होगी तो फिर हम कहाँ जाएंगे. हमें कोई स्थायी जगह चाहिए.

अब डीडीए ने अपनी ग़लती मानते हुए उन्हें यही सूचना लिखित में दे दी है, ताकि ब्लाइंड हॉस्टल में पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य संवर सके.

किसी 'ब्लाइंड' के साथ देखी है कोई फ़िल्म?

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