ब्लॉग: इन दलितों को भी मिलेगा 'देशद्रोही' का चितपावनी सर्टिफ़िकेट?

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Image caption पुणे के पेशवा साम्राज्य की एक पेंटिंग

जिस ईस्ट इंडिया कंपनी के राज को उखाड़ने के लिए 1857 में लगभग पूरे हिंदुस्तान में ग़दर मच गया हो, आज़ाद भारत में उसी कंपनी की विजय का उत्सव मनाने से बड़ा 'देशद्रोह' और क्या हो सकता है?

पर आप पाएँगे कि पुणे के पास कोरेगाँव भीमा गाँव में हर साल ये विजय उत्सव मनाने वाले लाखों दलितों को अब तक किसी 'राष्ट्रवादी' ने देशद्रोही का सर्टिफ़िकेट देने की हिम्मत नहीं की है.

लेकिन अखिल भारतीय ब्राह्मण महासंघ ने पुणे पुलिस से दरख़्वास्त की है कि दलितों को पेशवाओं की ड्योढ़ी 'शनिवार वाडा' में प्रदर्शन करने की अनुमति न दी जाए. ब्राह्मण महासंघ के आनंद दवे ने मीडिया से कहा है कि "ऐसे उत्सवों से जातीय भेद बढ़ेगा."

ब्राह्मण महासंघ को दलितों के इस उत्सव पर ऐतराज़ क्यों होना चाहिए?

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Image caption गुजरात के वडगाम से आज़ाद उम्मीदवार के तौर पर जीते युवा दलित नेता जिग्नेश मेवाणी इस जश्न में हिस्सा लेंगे

दलितों का उत्सव

इसे समझने के लिए ये जानना ज़रूरी है कि पेशवा शासक अंत्यज (यानी वर्ण व्यवस्था से बाहर की जातियाँ) महारों के बारे में क्या सोचते थे और कैसे उन्होंने महारों की सामाजिक और आर्थिक दुर्गति के लिए ज़िम्मेदार सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए जातीय भेदभाव के नियमों को कितनी कड़ाई से लागू किया.

कोरेगाँव भीमा वो जगह है जहाँ ठीक दौ सौ साल पहले 1जनवरी 1818 को 'अछूत' कहलाए जाने वाले लगभग आठ सौ महारों ने चितपावन ब्राह्मण पेशवा बाजीराव द्वितीय के 28 हज़ार सैनिकों को घुटने टिका दिए थे. ये महार सैनिक ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से लड़े थे और इसी युद्ध के बाद पेशवाओं के राज का अंत हुआ था.

इस बार साल के पहले दिन यानी 1 जनवरी 2018 को पर देश के कई हिस्सों से हज़ारों हज़ार दलित कोरेगाँव भीम गाँव में इकट्ठा होकर अपनी विजय की दो सौवीं जयंती मनाएँगे. इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक़ गुजरात के वडगाम से आज़ाद उम्मीदवार के तौर पर जीते युवा दलित नेता जिग्नेश मेवानी इस जश्न में हिस्सा लेंगे.

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Image caption सांकेतिक तस्वीर

अस्मिता की लड़ाई

जो इतिहासकार महारों और पेशवा फ़ौजों के बीच हुए इस युद्ध को विदेशी आक्रांता अँग्रेज़ों के ख़िलाफ़ भारतीय शासकों के युद्ध के तौर पर देखते हैं, तथ्यात्मक रूप से वो ग़लत नहीं हैं. पर ये सवाल पूछा ही जाना चाहिए कि आख़िर महार अँग्रेज़ों के साथ मिलकर ब्राह्मण पेशवाओं के ख़िलाफ़ क्यों लड़े?

महारों के लिए ये अँग्रेज़ों की नहीं बल्कि अपनी अस्मिता की लड़ाई थी. ये उनके लिए चितपावन ब्राह्मण व्यवस्था से प्रतिशोध लेने का एक मौक़ा था क्योकि दो सौ साल पहले पेशवा शासकों ने महारों को जानवरों से भी निचले दर्जे में रखा था.

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अंत्यजों यानी वर्णव्यवस्था से बाहर माने गए 'अस्पृश्यों' के साथ जो व्यवहार प्राचीन भारत में होता था, वही व्यवहार पेशवा शासकों ने महारों के साथ किया.

इतिहासकारों ने कई जगहों पर ब्यौरे दिए हैं कि नगर में प्रवेश करते वक़्त महारों को अपनी कमर में एक झाड़ू बाँध कर चलना होता था ताकि उनके 'प्रदूषित और अपवित्र' पैरों के निशान उनके पीछे घिसटने इस झाड़ू से मिटते चले जाएँ. उन्हें अपने गले में एक बरतन भी लटकाना होता था ताकि वो उसमें थूक सकें और उनके थूक से कोई सवर्ण 'प्रदूषित और अपवित्र' न हो जाए. वो सवर्णों के कुएँ या पोखर से पानी निकालने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे.

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Image caption 1680 में सूरत में ईस्ट इंडिया कंपनी की एक फ़ैक्ट्री

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी

ये प्राचीन भारत से चले आ रहे वो नियम थे जिनके ख़िलाफ़ बौद्ध, जैन, अजित केसकंबलिन या मक्खलिपुत्त गोसाल जैसे संप्रदाय बार बार विद्रोह करते रहे, पर हर बार इन दलित विरोधी व्यवस्थाओं को फिर से स्थापित किया गया.

ऐसी व्यवस्था में रहने वाले महार दलित ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की फ़ौज में शामिल होकर लड़े तो वो पेशवा के सैनिकों के साथ साथ चितपावन ब्राह्मण शासकों की क्रूर व्यवस्था के ख़िलाफ़ प्रतिशोध भी ले रहे थे.

अब इस युद्ध के दो सौ साल मनाने के लिए जब 2018 के पहले दिन सैकड़ों दलित संगठनों से जुड़े हज़ारों हज़ार लोग कोरेगाँव-भीम में इकट्ठा होंगे तो वो ईस्ट इंडिया कंपनी की नहीं बल्कि भेदभाव पर आधारित ब्राह्मणवादी पेशवा व्यवस्था के ख़िलाफ़ दलितों की विजय का जश्न मना रहे होंगे.

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जातीय भेदभाव के सबूत

इस जश्न में शामिल दलित नौजवानों के लिए दो सौ साल पुराने इतिहास का सिर्फ़ प्रतीकात्मक महत्व ही होगा, पर जातीय भेदभाव के सबूत उन्हें मौजूदा दौर की असली घटनाओं से मिल रहे हैं. यही असली उदाहरण उन्हें अपनी राजनीति तय करने में निश्चित ही मदद करेंगे.

मसलन, दलित नौजवान भूला नहीं है कि सहारनपुर के नौजवान दलित नेता चंद्रशेखर आज़ाद 'रावण' को अदालत से ज़मानत मिलते ही उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लगा दिया ताकि वो जेल से बाहर न आ सके.

लेकिन दूसरी ओर उन्हें ये भी मालूम है कि बीजेपी-शासित राज्यों में पहलू ख़ान की हत्या के जुर्म में पकड़े गए छह लोगों पर से आरोप वापिस ले लिए गए हैं. दादरी के मोहम्मद अख़लाक़ की हत्या के आरोप में गिरफ़्तार एक अभियुक्त की मौत पर देश के संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने उसे शहीदों वाली श्रद्धांजलि दी.

'अफ़राज़ुल के हत्यारे को जलाना, मारना नहीं चाहते'

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महार सैनिकों की विजय

राजस्थान के राजसमंद शहर में अफ़राज़ुद्दीन को सरेआम क़त्ल करने वाले हिंदुत्व समर्थक शंभुलाल रैगर के बारे में अब पुलिस कह रही है कि ये हत्या ग़लतफ़हमी में हो गई.

बहादुरगढ़ के पास चलती रेलगाड़ी में पीट पीट कर मार डाले गए जुनैद के घर वाले पुलिस की जाँच पर असंतोष जता चुके हैं.

इसलिए कोरेगाँव भीमा में महार सैनिकों की विजय के दो सौ साल पूरे होने के जश्न में शामिल होकर दलित दरअसल आज की राजनीति में अपनी जगह ढूँढने की कोशिश के साथ साथ ब्राह्मणवादी पेशवा व्यवस्था को आदर्श मानने वाले हिंदुत्ववादी विमर्श का प्रतिकार भी कर रहे होंगे.

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