नज़रिया: सवर्ण नेतृत्व पर ही है बीजेपी का भरोसा

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हिमाचल प्रदेश और गुजरात में मुख्यमंत्री का एलान नरेंद्र मोदी और अमित शाह की राजनीतिक शैली के अनुरूप ही दिख रहा है.

हिमाचल प्रदेश में नए नेता के तौर पर जय राम ठाकुर को राज्य की कमान सौंपी गई है वहीं गुजरात में विजय रुपाणी और नितिन पटेल की जोड़ी को पार्टी ने बनाए रखा गया है.

वैसे पार्टी हाई कमान को हिमाचल प्रदेश का मुख्यमंत्री चुनने में ज़्यादा मुश्किल हुई. एक ओर प्रेम कुमार धूमल के समर्थक थे, जो उनकी हार के बाद भी धूमल को तीसरी बार मुख्यमंत्री के तौर पर देखना चाहते थे. दूसरी बात धूमल का राजनीतिक अनुभव भी था.

लेकिन पार्टी को लगा होगा कि हारे हुए नेता को मुख्यमंत्री बनाने से एक तरह से ग़लत संदेश जाएगा. ऐसे में पार्टी ने चुने हुए विधायकों में से मुख्यमंत्री चुना.

जयराम ठाकुर का चुनाव दो तीन पहलूओं को ध्यान में रखकर किया गया है. एक तो वे भारतीय जनता पार्टी के अनुभवी नेता हैं, कई सालों से विधायक रहे हैं. इसके अलावा जातीय समीकरण का ध्यान रखा गया है.

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हिमाचल की राजनीति में ब्राह्मण बनाम राजपूतों की अहमियत रही है, बीजेपी को लग रहा है कि राज्य में राजपूत उसके ज़्यादा क़रीब हैं. ऐसे में धूमल की जगह पार्टी ने एक राजपूत समुदाय से ही मुख्यमंत्री का चुनाव किया. बीजेपी के लिए जीतकर आए ज़्यादातर विधायक भी राजपूत समुदाय के ही हैं.

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एक वजह ये भी होगी जिसके चलते हिमाचल के मुख्यमंत्री के तौर पर केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा का नाम पीछे रह गया.

जय राम ठाकुर 52 साल के हैं, तो इस लिहाज से पार्टी ने एक नया नेतृत्व विकसित करने की दिशा में भी कदम बढ़ाया है. इसके अलावा जयराम ठाकुर की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी बेहद सामान्य रही है. वे एक साधारण किसान के बेटे हैं, ऐसे में भाजपा ने राजपरिवार के कांग्रेसी नेता वीरभद्र सिंह के सामने सामान्य परिवार से आए जयराम को कमान सौंपकर जनता में संदेश देने की कोशिश की है.

जय राम ठाकुर को कमान सौंपने से ये भी साफ़ हो गया है कि राज्य में प्रेम कुमार धूमल के लिए ज़्यादा विकल्प नहीं हैं. वे पार्टी से अलग कोई लाइन लेने का जोख़िम नहीं उठा सकते क्योंकि उनकी स्थिति अब पहले जैसी नहीं रही.

उन्हें अपनी राजनीति के बदले अपने बेटे अनुराग ठाकुर के राजनीतिक भविष्य को भी देखना होगा और उनकी कोशिश यही होगी कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में कोई फ़ेरबदल हो तो किसी तरह से वे अपने बेटे को केंद्र में मंत्री बनवाएं.

वहीं दूसरी ओर, गुजरात में पार्टी हाईकमान ये साफ़ संकेत दिया कि उसकी दिलचस्पी यथास्थिति कायम रखने में है. विजय रूपाणी और नितिन पटेल को एक साथ रखकर पार्टी एक संतुलन भी रखना चाहती है. नितिन पटेल, पाटीदार समुदाय से आते हैं, इस समुदाय की नाराज़गी को देखते हुए उन्हें डिप्टी सीएम बनाए रखा गया है.

वहीं रूपाणी, नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बेहद क़रीबी माने जाते हैं. उनकी एक ख़ूबी ये भी है कि वो सबको साथ लेकर चलने वाले नेता हैं. यही वजह है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने बाहर से किसी व्यक्ति को नहीं लाने का फ़ैसला लिया.

दरअसल गुजरात से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आते हैं, अमित शाह आते हैं, ऐसे में पार्टी राज्य में ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री नहीं बना सकती जो कल को सामने आकर कहे कि गुजरात मेरा है.

विजय रुपाणी लो प्रोफाइल नेता हैं. वे मोदी- अमित शाह तो दूर वहां के विधायकों से भी टकराव नहीं मोल ले सकते. हमेशा मुस्कुराते दिखते हैं, कठोर भाषा का इस्तेमाल नहीं करते. लेकिन सबसे बड़ी बात ये भी है कि उनका अपना कोई जनाधार भी नहीं है.

गुजरात और हिमाचल के मुख्यमंत्री के चुनाव में बीजेपी ने उन दो बातों का ख्याल रखा है, जो उत्तर प्रदेश के अलावा पार्टी शासित सभी राज्यों में एकसमान देखने को मिल रही है.

बीजेपी इन दिनों ऐसे नेता को मुख्यमंत्री बना रही है, जिसकी छवि साफ़ हो, बहुत विवादों भरा नहीं हो और उसका अपना कोई जनाधार भी नहीं हो. ताकि वो कल को राष्ट्रीय नेतृत्व को चुनौती देने की सोच भी नहीं सके हालांकि योगी आदित्यनाथ इसके अपवाद हैं.

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गुजरात में विजय रुपाणी और हिमाचल प्रदेश में जय राम ठाकुर के मुख्यमंत्री बनाए जाने से एक दिलचस्प राजनीतिक समीकरण भी उभर कर आता है.

असम में सर्वानंद सोनोवाल (आदिवासी), झारखंड में रघुबर दास और मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान (दोनों ओबीसी हैं) को छोड़ दें तो नौ राज्यों में पार्टी ने सवर्णों को मुख्यमंत्री बनाया हुआ है.

ये स्थिति तब है जब नरेंद्र मोदी- अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी ब्राह्मण-बनिया पार्टी की छवि से बाहर निकल आयी है. इस पार्टी में आदिवासी, दलित और ओबीसी के विधायक और सांसदों की संख्या बढ़ी है. उनको टिकट देने और उनका चुनकर आना ज़्यादा हुआ है. देश में क्षेत्रीय पार्टियों के आने से ये बदलाव हुआ है.

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Image caption नितिन पटेल

लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का उदाहरण छोड़ दें तो नेतृत्व वाली स्थिति में पार्टी सवर्णों पर ही भरोसा कर रही है. केंद्र के भी कद्दावर मंत्रियों पर नज़र डालें तो नितिन गडकरी हों, सुषमा स्वराज हों, अरुण जेटली हों, निर्मला सीतारमण हों, तमाम महत्वपूर्ण पदों पर आपको ब्राह्मण नजर आते हैं.

पहले दक्षिण भारतीय राज्यों में और अब उत्तर भारतीय राज्यों में राजनीतिक तौर पर पिछड़ी जातियों में काफी बदलाव आया है, रिवोल्यूशन हुआ है लेकिन हक़ीक़त यही है कि सत्ता अभी भी उन्हीं लोगों के साथ है जिनके हाथों में सत्ता पहले से रही है. यही स्थिति कांग्रेस के समय भी थी.

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कुछ लोग मेरे इस जातिगत विश्लेषण की आलोचना करेंगे लेकिन ऐसे लोगों से मेरा कहना है कि जिस दिन हमारे राजनीतिक दल जाति के हिसाब से टिकट देना बंद कर देंगी, उसी दिन ऐसे विश्लेषण नहीं होंगे.

लेकिन अभी तो देश की सच्चाई यही है कि सांसद, विधायक और पंचायतों में भले पिछड़ी जातियों की भागीदारी में बदलाव देखने को मिल रहा है लेकिन लीडरशिप के मामले में उस स्तर का कोई बदलाव देखने को नहीं मिला है.

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