ब्लॉग: गर्व से कहो हम हिंदू हैं और हमें कोई चिंता नहीं

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सरकार लगातार कह रही है कि जनता देश पर गर्व करे, उम्मीद है कि इसी फ़ॉर्मूले से जनता देश चलाने वालों पर भी गर्व करने लगेगी, क्योंकि देश, सरकार, भाजपा, हिंदू और मोदी आदि एक ही तो हैं.

प्रधानमंत्री ने 'गुजराती गौरव' का शंखनाद करते हुए चुनावी सभाओं में बताया कि 'गुजरात के बेटे' ने दुनिया भर में भारत का डंका बजा दिया, इसलिए देश पर, मोदी पर, सरकार पर और भाजपा पर गर्व करना चाहिए, और वोट देने से सुंदर क्या अभिव्यक्ति हो सकती है गर्व की?

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जो लोग असहमत हैं उनसे यही कहा जा रहा है--तुम शर्म करो, क्योंकि हिंदू-विरोधी, राष्ट्रविरोधी, कांग्रेसी, सिकुलर, लिबरल, वामिये, बुद्धिजीवी, पाकिस्तान-समर्थक, मुसलमान, आतंकवादी और देशद्रोही आदि एक ही तो हैं.

बहरहाल, कुछ लोग ऐसे ढीठ हैं कि उनसे 'शर्म करो' कहा जाता है लेकिन वे चिंता करने लगते हैं, कभी संविधान की, कभी लोकतंत्र की, कभी संसद की, कभी संस्थानों की, कभी दलितों, आदिवासियों, औरतों और मुसलमानों की, कभी किसानों और मज़दूरों की.

चिंता करने वालों की चिंता नहीं

कुछ लोगों का बार-बार चिंता करना सरकार को कभी-कभी, थोड़ा-बहुत चिंतित करता है, क्योंकि चिंता करने वाले गर्व करने वालों को भ्रमित करते हैं, निगेटिविटी फैला देते हैं, इन्हें ऐसा करने से रोका जाए ताकि पूरा देश बिना बाधा के गर्व कर सके.

वैसे तो सरकार की प्राथमिकता साफ़ है, वह चिंता करने वालों की चिंता नहीं करती, लेकिन गर्व करने वाले जब चिंता करते हैं तो सरकार को उनसे भी गहरी चिंता होती है, जैसे कि रानी पद्मावती का सम्मान बचाने के लिए चिंतित हुए लोगों का तलवार निकालना.

सरकार तुरंत हरकत में आई रानी पद्मावती को भारत माता, गौमाता और गंगा माता के बराबर 'राष्ट्रमाता' का दर्जा दिया गया, फ़िल्म को रिलीज़ होने से पहले बैन कर दिया गया, ताकि क्षणिक चिंता में घिरे लोग गर्व करने की स्थिति में वापस लौट सकें.

चिंतामुक्त और गर्वयुक्त समाज के सपने आसान नहीं है, लोग कभी भात-भात रटते हुए मर गई बच्ची की माँ का वीडियो शेयर करने लगते हैं तो कभी किसी बेकसूर की हत्या का, जिससे गर्व करने में बाधा उत्पन्न होती है. सरकार बयान देकर बात बढ़ाने की जगह, चुप रहकर धैर्य के साथ इंतज़ार करती है कि लोग जल्दी ही गर्व वाली मनोदशा में लौट आएँगे.

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Image caption भूख से मरने वाली संतोषी

गर्व करने की मात्रा निर्धारित हो

असल में चिंता करने वाले लोगों का नज़रिया ही ग़लत है, जिस झारखंड में बच्ची आधार कार्ड न होने की वजह से भूख से मर गई उसी राज्य में गायों के लिए एंबुलेंस सेवा भी तो सफलतापूर्वक चल रही है, गायों के लिए भी तो आधार कार्ड बनवा रही है सरकार, उस पर गर्व करना चाहिए या नहीं?

गर्व और चिंता, इन दोनों में से क्या करें, किस बात पर गर्व करें, किस पर चिंता, और कितनी मात्रा में करें, यह अभी साफ़ नहीं हो पाया है. सरकार को इस पर स्पष्ट नीति बनानी चाहिए तभी देश एकजुट होकर गर्व कर पाएगा, देश में चिंता का निगेटिव माहौल बनाने वालों से सख़्ती से निबटना चाहिए.

जैसा गर्वयुक्त समाज उत्तर कोरिया का है वैसा कहीं और नहीं देखा जाता, वे जानते हैं कि गर्व कैसे किया जाता है. वहाँ चिंता वग़ैरह करने की कोई गुंजाइश नहीं है, सरकार की नीति स्पष्ट है, वहाँ चिंता करने वालों को हमेशा के लिए चिंतामुक्त कर दिया जाता है.

उत्तर कोरिया को ग़ौर से देखें तो समझ में आता है कि भरपूर गर्व करने, और चिंता न करने में लोकतंत्र बाधक है, सरकार को इस बारे में भी विचार करना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र के चक्कर में बहुत सारी गर्व करने लायक बातों पर भी चिंतित लोग सवाल उठा देते हैं जिससे गर्व करने का मज़ा किरकिरा हो जाता है.

लोग चिंता करने से बाज़ नहीं आएँगे इसलिए सरकार को एक सूची जारी करनी चाहिए कि चिंता करना हो तो इन विषयों पर कर लें, जैसे गांधी परिवार का वंशवाद, कांग्रेस, लालू, मुलायम, मायावती का भ्रष्टाचार, पाकिस्तान, आतंकवाद, मुसलमानों की बढ़ती आबादी और कट्टरता, लव जिहाद, स्कूलों में पढ़ाया जाने वाला 'ग़लत इतिहास', हिंदू पात्रों का ग़लत चित्रण और केरल-बंगाल (जब तक सरकार नहीं बदल जाती तब तक) की स्थिति आदि.

जम्मू-कश्मीर एक अपवाद है, जहाँ गर्व करने वाले सरकार में साझीदार हैं और चिंता करने वाले मुसलमान बहुसंख्यक हैं, इसलिए वहाँ गर्व से पैलेट गन चलाए जाते हैं और उनसे घायल हुए नौजवानों की चिंता होती है तो इलाज के लिए एम्स से एक्सपर्ट भेजे जाते हैं.

चिंता करने वालों ने कभी कश्मीरियों से बात करने की कोशिश की थी, मणिशंकर अय्यर तो देशद्रोही का तमग़ा पा गए, यशवंत सिन्हा को पुराने रिश्तों ने बचा लिया. गर्व करने वालों ने अब इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व प्रमुख को अपनी चिंता सौंप दी है.

गोबर के ज़रिए अरब देशों को पछाड़ेंगे

ग़रीबी, बेरोज़गारी, भुखमरी, किसानों की दुर्दशा पर चिंता प्रकट करने वालों को राष्ट्रव्यापी प्रचार के ज़रिए बताया जाना चाहिए कि वे भारत के अरबपतियों पर गर्व करें ताकि उनसे प्रेरणा ले सकें कि किस तरह इन लोगों ने अपने कठिन परिश्रम से अमीरी के मामले में दुनिया के बड़े-बड़े लोगों से बराबरी की है.

दलितों की बात करने वाले जातिवादी हैं और आदिवासियों की बात करने वाले माओवादी इसलिए उन पर अधिक ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है, मुसलमानों की चिंता जिन्हें है उन्हें समझाना चाहिए कि रोहिंग्या मुसलमानों से कितने बेहतर हाल में हैं भारत के मुसलमान.

विज्ञान के क्षेत्र में पुष्पक विमान पर रिसर्च हो रहा है, चिकित्सा के क्षेत्र में गोमूत्र पर गहन शोध जारी है, ऊर्जा के क्षेत्र में भारत गोबर के ज़रिए अरब देशों को पीछे छोड़ देगा, उद्योग के मामले में बाबा के आयुर्वेदिक उत्पाद विदेशी कंपनियों की बैंड बजा रहे हैं, रक्षा के क्षेत्र में रफ़ायल विमान पर पूरी रिलायंस है, शिक्षा के क्षेत्र में हर यूनिवर्सिटी में राष्ट्रवाद का गहन अध्ययन-अध्यापन हो रहा है, विदेश नीति में देखें तो कौन सा देश है जिसका पीएम-प्रेसिडेंट मोदी जी से गले नहीं मिलता.

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किस हिसाब से मुसलमान हिंदुओं से अधिक होंगे?

इस प्रकार तार्किक दृष्टि से देखें तो भारत में सब कुछ गर्व करने लायक है, जो गर्व करने लायक नहीं है उसे जितनी जल्दी हो सके बदला जाए, इस दिशा में राजस्थान सरकार ने मिसाल कायम की है, महाराणा प्रताप पर गर्व करें जिन्होंने कभी हार नहीं मानी, नहीं तो सरकार पर ही गर्व कर लें जिसने उन्हें बैकडेट से जिता दिया, बस गर्व करें.

स्वेट मार्डेन की एक एवरग्रीन बेस्टसेलर है जो हर रेलवे स्टेशन पर पिछले चालीस सालों से बिक रही है--'चिंता छोड़ो, सुख से जियो', उसका एक रिवाइज़्ड वर्ज़न भारत में हर कोर्स में अनिवार्य होना चाहिए--'चिंता छोड़ो, गर्व करो.'

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