पिता के आंसुओं ने नेहा पंडित को दिखाई अफ़सर की कुर्सी

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Image caption राज्य के मंत्री नईम अख्तर ने नेहा पंडित को उनकी उपलब्धि के लिए घर जाकर बधाई दी

आग में तपकर ही सोना कुंदन बनता है. जम्मू के नज़दीक जगती टाउनशिप की रहने वाली कश्मीरी पंडित परिवार की सबसे छोटी बेटी नेहा पंडित ने कुछ ऐसा ही कारनामा कर दिखाया है.

एक जनवरी 1990 को जन्मी नेहा तब सिर्फ़ दो साल की थीं जब 1992 में उनके परिवार को शोपियां ज़िले के मनिहाल गाँव में अपना बसा-साया घर छोड़ कर जम्मू में झिरी के पास एक कैंप में शरण लेनी पड़ी थी.

विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए बनाए गए कैंप में बचपन गुज़ारने वाली नेहा ऐसी पहली कश्मीरी पंडित हैं जिन्होंने अपनी मेहनत से कश्मीर प्रशासनिक सेवा में चौथा स्थान हासिल किया है.

विस्थापित परिवारों के बहुत से बच्चे प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करते हैं और कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी विस्थापित कैंप में रहने वाली छात्रा ने प्रशासनिक सेवा में क़ामयाबी हासिल की है.

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'पापा को रोते देखना बर्दाश्त नहीं हुआ'

जम्मू के उस कैंप में अनगिनत मुश्किलों का सामना करते हुए नेहा का बचपन से बस एक ही सपना था, जो अब जाकर पूरा हुआ है.

2007 में 12वीं कक्षा पास करने के बाद नेहा के पिता रोशन लाल पंडित उन्हें पहली बार गाँव का घर दिखाने ले गए. वहां पहुँच कर वे बेटी के सामने ही फूट-फूट कर रो पड़े.

अपने पिता की आँखों में आंसू देख कर नेहा ने उस दिन यह ठान लिया कि अगली बार जब भी उनके पिता अपने गाँव लौटेंगे तो उनका सिर गर्व से ऊँचा होगा. तबसे नेहा ने अपने सपने को पूरा करने के लिए दिन-रात एक कर दिए और आख़िरकार अपनी मंज़िल को पाया.

नेहा के मुताबिक़ "उन्होंने एक लंबे सफ़र के बाद अपनी मंज़िल हासिल की है. मेरा सफ़र मुश्किल ज़रूर था लेकिन मंज़िल हासिल करने में सभी ने मेरा साथ दिया."

नेहा ने ऑर्गेनिक केमिस्ट्री में मास्टर्स किया है. उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता, टीचर, बड़े भाई, बहन और चाचा देशरतन पंडिता को देती हैं.

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ऑर्गेनिक केमिस्ट्री में मास्टर्स

नेहा बताती हैं कि शुरू में उनका परिवार सिर्फ़ राहत राशि और सरकारी राशन पर निर्भर था. वो कहती हैं, "बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले और वो अपने पैरों पर खड़े हो सकें, इसके लिए पापा ने कड़ी मेहनत की. हमें इस लायक बनाया कि हम अपने सपने पूरे कर सकें."

सरकार के मंत्रियों से लेकर विभिन्न संगठनों ने नेहा की मेहनत की दाद दी है. उनसे कश्मीरी पंडित युवाओं को प्रेरित करने के लिए सहयोग भी माँगा है ताकि और लोग भी प्रशासनिक अधिकारी बनकर अपने समाज की परेशानियों का हल ढूंढ सकें.

उन्होंने बताया, "प्रारंभिक शिक्षा सरकारी हाई स्कूल से हुई. उसके बाद स्नातक के लिए जम्मू के साइंस कॉलेज में दाखिला लिया. मास्टर्स के लिए उत्तराखंड के हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल यूनिवर्सिटी गई."

नेहा ने पहली बार केएएस (जम्मू कश्मीर लोक सेवा आयोग) परीक्षा 2013 में दी थी लेकिन वो सफल नहीं हुईं.

बड़े भाई डॉक्टर विरेश पंडित और बड़ी बहन मीनाक्षी ने उन्हें एक बार फिर परीक्षा देने के लिए तैयार किया. उन्होंने एक महीने की कोचिंग ली और बाक़ी तैयारी घर पर ही की.

2016 में प्रधानमंत्री पैकेज के तहत कश्मीरी पंडितों को दी जाने वाली नौकरियों में नेहा को शोपियां की डिस्ट्रिक्ट ट्रेजरी में अकाउंट असिस्टेंट की नौकरी मिली लेकिन क़िस्मत ने उनके लिए अलग ही योजना बना रखी थी.

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'सांप, बिच्छू के डर से रात भर सो नहीं पाती थी'

नेहा उन दिनों को याद करना नहीं भूलती जब ज़बरदस्त गर्मी में बिना बिजली-पानी के मिश्रीवाल्ला विस्थापित कैंप में वो बिना सोए रात गुज़ारती थीं.

नेहा कहती हैं कि कैंप का हर रोज़ परिवार के लिए एक जंग जैसा होता था. गर्मी के दिनों में सांप और बिच्छू का डर सताता और खुद को बचाए रखने के लिए हर वक़्त सतर्क रहना पड़ता था.

उनके एक कमरे वाले घर के सामने ईंट के भट्टे थे जिसकी वजह से गर्मी के दिनों में परेशानी बढ़ जाती थी. लेकिन आज मुबारकबाद स्वीकारने में व्यस्त परिवार अपनी दुश्वारियों को कहीं पीछे छोड़ आया है.

सबको मिठाई खिलाते उनके पिता के साथ बाक़ी सब भी उनकी छोटी बेटी के सुनहरे भविष्य की मंगल कामना कर रहे हैं.

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