'शादी-शुदा औरतों के साथ वो नहीं होगा...'

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पांच साल पहले लखनऊ की सबा जब पति के साथ अस्पताल पहुंचीं तो बेहद खुश थीं. एक बच्चा उनके जीवन में आने वाला था.

अस्पताल में बच्चा पैदा होने के दौरान उनके गुर्दे पर असर पड़ा. पति के मन में निराशा ने घर कर लिया.

वो बताती हैं, "जब उन्हें पता चला कि लड़की पैदा हुई है तो वो लिफ़ाफ़े में कोरे कागज़ पर तलाक़-तलाक़-तलाक़ लिखकर चले गए."

पिछले पांच सालों से 30 वर्षीय सबा लखनऊ की फ़ैमिली कोर्ट में बच्ची के ख़र्च की मांग के लिए संघर्ष कर रही हैं, जबकि पति ने दूसरी शादी कर ली है.

तीन तलाक़ बिल से खुश

इंस्टैंट ट्रिपल तलाक़ पर लोकसभा में पारित मुस्लिम वुमेन (प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स ऑन मैरिज) बिल से खुश एमए इंग्लिश कर चुकीं सबा कहती हैं, "मेरे इलाज पर हर महीने 15,000 रुपए का ख़र्च आता है. आज मेरे भइया-भाभी ये ख़र्च उठा रहे हैं. कल जब उनके ख़र्च बढ़ेंगे तब मेरा क्या होगा. मैं इस बिल से खुश हूं. कम से कम आने वाली शादी-शुदा औरतों के साथ वो नहीं होगा जो मेरे साथ हुआ."

उनके बगल में बैठी सना (बदला हुआ नाम) की इसी साल शादी हुई. शादी के मात्र 10 दिन बाद दुबई चले गए पति की अनुपस्थिति में सास-ससुर ने पहले दहेज की मांग की और फिर कहा कि उनके ऊपर जिन्न आ गया है और मारपीट कर घर से निकाल दिया.

बिल से बेहद खुश लखनऊ विश्वविद्यालय से एमकॉम की पढ़ाई कर चुकी सना चाहती हैं कि तीन साल की सज़ा के प्रावधान बढ़ाया जाए.

तीन तलाक़ 'सवाल सियासत का नहीं'

तीन तलाक़ बिल पर क्या कहती हैं मुस्लिम महिलाएं?

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बीस साल की सना कहती हैं, "मेरी ज़िंदगी शुरू होने से पहले ख़त्म हो गई है. मेरे जेठ कहते हैं कि मेरे पति मुझे कभी भी तलाक़ दे सकते हैं. मेरे पति कहते हैं कि वो वही करेंगे जो मेरे मां-बाप कहेंगे. अब मैं क्या करूं? मैं चाहती हूं कि ये बिल जल्दी राज्य सभा से पास हो."

कहीं खुशी कहीं अधूरी उम्मीदें

मुस्लिम वुमेन (प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स ऑन मैरिज) बिल से कहीं खुशी है तो कहीं उम्मीदें नहीं पूरी होने का ग़म.

एक उम्मीद ये थी कि बिल ऐसा हो जिसमें सुलह की नीयत हो और सज़ा की धमकी, और पारिवारिक मामले को आपराधिक न बनाया जाए, क्योंकि अगर आपने शौहर को जेल भेज दिया तो ससुराल वाले तो बीवी को घर पर बैठाकर रोटी खिलाने से रहे.

बिल में तीन तलाक़ देने पर तीन साल तक की सज़ा का प्रावधान है.

साथ ही जेल भेजना तो अदालती प्रक्रिया की शुरुआत है जो महीनों, सालों तक खिंचेगी. ऐसे में पीड़िता की आर्थिक, कानूनी मदद कौन करेगा?

सबा और सना मानती हैं कि बिना पुरुषों में सज़ा का डर जगाए मुस्लिम महिलाओं का भला नहीं होने वाला.

बहस की कई परतें हैं और धार्मिक भावनाओं के कारण मामला संवेदनशील है. इस कारण मुस्लिम महिलाएं भी बंटी हैं.

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'महिला को फ़ायदा नहीं होगा'

मुंबई स्थित मजलिस लीगल सेंटर की ऑड्रे डिमेलो की मानें तो नए कानून की कोई ज़रूरत नहीं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट इसे पहले ही नियम-विरुद्ध बता चुकी है.

वो कहती हैं, "इस बिल के पीछे राजनीतिक एजेंडा है. आप चाहते हैं कि अगर कोई मुस्लिम व्यक्ति के ख़िलाफ़ शिकायत करे तो उसे गिरफ़्तार किया जाए. इससे महिला को कोई फ़ायदा नहीं होगा."

"अगर किसी महिला के ख़िलाफ़ पति हिंसा करता है तो वो धारा 498 (ए) के अंतर्गत वो पुलिस की मदद ले सकती हैं."

धारा 498 ए यानि किसी महिला पर पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता करने की हालत में उसे बचाने के लिए कानून.

वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंघ ने ट्वीट किया, "हमने इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में संघर्ष नहीं किया था."

बदले हालात में जहां केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में मुसलमानों के खिलाफ़ कथित गोमांस रखने पर सामूहिक हत्या, गाय लाने-ले जाने पर पिटाई, हमले, हत्या जैसे मामले हुए हैं, इस बिल का मुस्लिम समाज पर क्या असर होगा, उस पर भी राजनीतिक बहस तीखी है.

शाह बानोका मामला

तीन दशक पहले शाह बानों मामले में राजीव गांधी सरकार पर भी राजनीति के आरोप लगे थे. शाह बानो पति से तलाक़ के बाद रखरखाव के लिए धन मांगने के लिए अदालत गई थीं.

सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में फ़ैसला सुनाया जिससे मुस्लिम पर्सनल लॉ को लेकर बहस छिड़ी और मुसलमानों के एक गुट के विरोध के बाद राजीव गांधी सरकार संसद में क़ानून लेकर आई थी.

ज़ुबैर अहमद खान शाह बानो के नवासे हैं और इंदौर में टैक्स के वकील हैं.

ज़ुबैर ने ताज़ा बिल नहीं पढ़ा लेकिन कहते हैं, उन्हें उम्मीद है कि "जो भी क़ानून आएगा, वो शरियत और क़ानून की रौशनी में आएगा."

ऐसे में समाचार एजेंसी एएनआई ने केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद का बयान ट्वीट किया जिसके अनुसार सुप्रीम कोर्ट के ट्रिपल तलाक़ पर आदेश के बाद करीब 100 ऐसे मामले सामने आए हैं.

जानकारी का सोर्स क्या है ये स्पष्ट नहीं क्योंकि इंस्टैंट ट्रिपल तलाक मामलों की कुल संख्या भी साफ़ नहीं.

आलोचक कहते है, इंस्टैंट ट्रिपल तलाक़ के पीड़ितों की संख्या छोटी है. समर्थक कहते हैं, "हादसे बहुत हैं लेकिन ज़रूरी नहीं कि वो नज़र आएं."

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शाहबानो, तीन तलाक से लेकर सोमनाथ तक...

तीन तलाक़ पर कहाँ थी महिलाओं की आवाज़?

हिंदू या मुसलमान, कहां ज़्यादा तलाक़ के मामले?

ऐसे में एक आंकड़े ने मेरा ध्यान खींचा. आपने बहसों में सुना होगा कि हिंदुओं के मुक़ाबले मुसलमानों में तलाक़ के मामले बेहद कम हैं.

ओपी जिंदल ग्लोबल युनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के एसोसिएट प्रोफ़ेसर युगांक गोयल ने साल 2011 जनगणना के आंकड़ों के आधार पर अख़बार मिंट में लिखा, "हर 1,000 शादी-शुदा हिंदू महिलाओं में से 2.6 तलाक़शुदा होती हैं, जबकि 1,000 शादी-शुदा मुस्लिम महिलाओं में 5.6 तलाक़शुदा हैं."

वो आगे लिखते हैं, "इसका ये तात्पर्य है कि अगर जनसंख्या और शादी को एडजस्ट कर लिया जाए, तो हिंदुओं के मुकाबले मुसलमानों में तलाक़ की संभावना ज़्यादा होती है और मुस्लिम महिलाओं इस शेष-भाग का ज़्यादातर हिस्सा पूरा करती हैं."

युगांक कहते हैं कि जब उन्होंने ये आंकड़े देखे तो वो खुद आश्चर्यचकित रह गए, लेकिन इन आंकड़ों के पीछे क्या कारण हैं, इस पर वो कुछ नहीं कह सकते.

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Image caption भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सह-संस्थापक ज़किया सोमन

कारण पूछने पर भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सह-संस्थापक ज़किया सोमन कहती हैं मुसलमानों में ज़्यादातर तलाक़ त्वरित ट्रिपल तलाक़ के मामले ही होते हैं.

यानि ये बहस और बहस की परतों पर बहस अभी खत्म नहीं हुई है.

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