मैं मुंबई के उस रेस्तरां में आग की चपेट से यूं बाहर निकला

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Image caption 28 दिसंबर की रात आग की चपेट में आया रेस्ट्रॉन्ट

28 दिंसबर की आधी रात मुंबई के जिस रेस्तरां में आग लगी थी उसमें बीबीसी न्यूज़ गुजराती के संपादक अंकुर जैन भी थे. जैन अपने दोस्तों और बहन के साथ उस इमारत से सुरक्षित निकलने में कामयाब रहे थे.

विस्तार से पढ़ें जैन की आंखोंदेखी:-

मुंबई के उस रेस्तरां में 28 दिसंबर की शाम बिल्कुल सामान्य थी. मुझे इसका तनिक भी अंदाजा नहीं था कि यह मेरे जीवन का एक डरावना पल बनेगा.

लोअर परेल में कमला मिल्स रेस्टोरेंट्स और शॉपिंग कंपाउंड में मेरे साथ 100 अन्य लोगों के लिए पिछली रात काफ़ी डरावनी रही.

मैं अपनी बहन और दोस्तों के साथ डिनर के लिए निकला था. हम चार देर शाम 'वन अबव' रेस्तरां में पहुंचे थे.

रेस्तरां बिल्कुल पैक था और हमें बैठने के लिए जगह नहीं मिली. हमलोगों ने जगह मिलने की उम्मीद में इंतज़ार किया.

रात के साढे़ बारह बजे थे तभी किसी ने तेज़ आवाज़ लगाई कि यहां आग लगी है और जल्दी से सब निकलो.

हालांकि हमलोग अलार्म भी सुन रहे थे. हम सभी आग की लपटें भी देख रहे थे. हमें ऐसा लग रहा था कि आग पर जल्द ही नियंत्रण पा लिया जाएगा, लेकिन हम ग़लत साबित हुए.

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Image caption आग लगने के बाद का एक दृश्य

कुछ ही पल में सबको लगा कि आग की चपेट में पूरा रेस्तरां आ चुका है. आग पर नियंत्रण पाना मुश्किल था क्योंकि छत लकड़ी की थी. ऐसे में आग की लपटें तेज़ी से फैल रही थीं.

रेस्तरां के स्टाफ़ ने हमें फ़ायर एग्जिट से निकलने के लिए कहा, लेकिन वहां भगदड़ की स्थिति थी. दूसरी ओर फ़ायर एग्जिट भी आग की चपेट में आ चुका था.

हर चीज़ एक एक कर जल रही थी. हम किसी तरह से सीढ़ी तक पहुंचे तो पता चला कि हमारी एक साथी ग़ायब है. हमें नहीं पता था कि वो कहां चली गई. हम लगातार उसका नाम लेकर आवाज़ लगाते रहे.

धमाके की आवाज़, लोगों की चीखें

किसी ने मुझसे कहा कि इमारत के दूसरे एग्जिट से भी लोग बाहर निकल रहे हैं. हमलोग उसे पागल की तरह देख रहे थे, लेकिन लगा कि वो पहले ही बाहर निकल चुकी है.

शुक्र है कि हम सभी सुरक्षित थे. हमलोग इमारत के तीसरे तले से नीचे की तरफ़ भागे थे. हालांकि सीढ़ियों से उतरते हुए धमाके की आवाज़ आ रही थी. लोगों की चीख़ें भी सुनी जा सकती थीं.

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एक रिश्तेदार ने फ़ोन पर हिदायत दी कि एग्जिट से आराम से निकलना. आख़िरकार हम किसी तरह वहां से निकलने में कामयाब रहे. जब आग लगी थी तभी हम रेस्तरां को छोड़ निकल रहे थे.

हमने वहां से निकलते हुए सब कुछ क़रीब से देखा. बाहर निकला तो नज़ारा ये था कि लोग अपनों के लिए चीख़ रहे थे.

उस वक़्त किसी को भी अहसास नहीं था कि यह हादसा इतना भयावह हो जाएगा. वहां खड़े गार्ड लोगों से बाहर निकलने की आवाज़ लगा रहे थे. इन सबके बीच हमने अपने साथ के चौथे सदस्य को भी पा लिया.

जल्द ही फ़ायर ब्रिगेड की गाड़ियां वहां पहुंचने लगीं. तब फ़ायर डिपार्टमेंट के लोगों ने हमलोगों को बताया कि तीन लोग ज़ख़्मी हुए हैं.

त्रासदी से कम नहीं

यह रात के 12 बजकर 40 मिनट की बात है. हम घर लौट चुके थे, लेकिन लगातार ख़बरें देख रहे थे. हमें आग बुझने का इंतज़ार था. यह हमारे लिए सदमा पहुंचाने वाला और परेशान करने वाला था.

रात सुबह तक पहुंच गई और हम बुरी तरह से थक चुके थे. सबकी आंखों में नींद भरी थी. हमारे लिए अगली सुबह किसी त्रासदी से कम नहीं थी.

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इस हादसे में 15 लोगों की जान जा चुकी थी. शुरू में ऐसा नहीं लगा था कि आग का दायरा इतना बड़ा होगा कि 15 लोगों की जान चली जाएगी.

आग लपटें इसलिए और जानलेवा हो गईं क्योंकि ज्वलनशील पदार्थों की कमी नहीं थी. रेस्तरां मालिक और प्रशासन इस तरह के हादसों को लेकर बिल्कुल लापरवाह रहते हैं.

सुरक्षा के सारे मानदंडों को ताक पर रखा जाता है. मीडिया रिपोर्ट्स का कहना है कि ज़्यादा मौतें महिला वॉशरूम के पास हुई हैं. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उसी रास्ते से फ़ायर एग्जिट था.

हमारे बीच की एक सदस्य आग लगने के ठीक पहले वॉशरूम गई थी. अब मैं यह सोचकर परेशान हूं कि अगर वो वक़्त पर नहीं निकल पाती को क्या होता.

रेस्तरां में फ़ायर एग्जिट के पास सबसे पहले आग लगी थी, क्योंकि वहां कार्टन्स रखे थे. दोनों एग्जिट के पास कार्टन्स रखे हुए थे.

यह सोचकर बुरी तरह से हैरानी होती है कि इन्हें बिना सुरक्षा मानदंडों को पूरा किए प्रशासन से लाइसेंस कैसे मिल जाता है?

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