नज़रियाः अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने इस बरस देखा सबसे बुरा वक्त

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अपने 25 वर्ष के इतिहास में समाजवादी पार्टी ने संभवत: इससे बुरा वक्त नहीं देखा था. साल 2017 समाजवादी पार्टी के लिए एक भी अच्छी ख़बर नहीं लाया.

जहां साल की शुरुआत पार्टी में टूट से हुई, वहीं अंत शहरी निकायों के चुनाव में ज़बरदस्त हार से.

इसी बीच विधानसभा चुनाव में कुल 403 सीटों में से 356 सीटें हार कर समाजवादी पार्टी ने अपने पतन की एक नई गाथा लिख दी.

पिछली एक जनवरी को पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में अखिलेश यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया था.

मुलायम सिंह यादव को संरक्षक तो ज़रूर बनाया गया लेकिन बिना किसी अधिकार वाला.

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अखिलेश और मुलायम में टूट

अखिलेश के समर्थक नरेश कुमार उत्तम को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष चुना गया. मुलायम ने इसे उनकी पीठ में छुरा घोंपने जैसा काम बताया.

उनका कहना था कि यह पार्टी उनके जीवन भर की मेहनत की कमाई थी, इसके लिए वे जेल गए, अकेले पूरे प्रदेश का कई-कई बार दौरा किया, हज़ारों बार प्रदर्शन किया.

लेकिन इसी पार्टी से उन्हें उनके बेटे अखिलेश ने बेदखल कर दिया. अखिलेश का कहना था कि 'नेताजी' लोगों के बहकाने में आ गए थे.

मुलायम भी इस अपमान को चुपचाप सहने वाले नहीं थे. दो दिन बाद ही अमर सिंह को साथ ले मुलायम ने चुनाव आयोग का रास्ता पकड़ा.

और अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी को अवैध और असंवैधानिक करार देते हुए आयोग से उसकी मान्यता रद्द करने की गुजारिश की.

चुनाव आयोग ने दोनों दलों को 9 जनवरी तक जरूरी दस्तावेज जमा करने का निर्देश दिया जिससे मालूम चल सके कि किस धड़े को पार्टी में ज्यादा समर्थन प्राप्त है.

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चुनाव आयोग तक पहुंची खींचतान

अखिलेश और उनके चाचा रामगोपाल यादव ने चुनाव आयोग को पार्टी के कुल 5731 डेलीगेट्स में से 4716 के शपथ पत्र सौंपे जिनमें अखिलेश को समर्थन दिया गया था.

इसी तरह पार्टी के 229 विधायकों में से 212 ने अखिलेश को समर्थन दिया. वहीं 68 विधान परिषद सदस्यों में से 56 सदस्यों और 24 सांसदों में से 15 ने भी अखिलेश गुट को अपना समर्थन दिया.

चुनाव आयोग के सामने अखिलेश यादव की वकालत नामी वकील राजीव धवन और कपिल सिब्बल ने की तो मुलायम सिंह यादव की ओर से बहस में पूर्व सॉलिसिटर जनरल मोहन परासरन उतरे.

परासरन का कहना था कि पार्टी में कोई बंटवारा नहीं हुआ है इसलिए चुनाव आयोग को सुनवाई करने का कोई हक नहीं है.

साथ ही उन्होंने एक जनवरी को अखिलेश यादव द्वारा बुलाए गए राष्ट्रीय अधिवेशन को अवैध करार देते हुए पार्टी अध्यक्ष के रूप में उनके चुनाव को भी ख़ारिज किए जाने का आग्रह किया.

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अखिलेश गुट की जीत लेकिन पार्टी की हार

अखिलेश यादव गुट चुनाव आयोग में जीत गया और पार्टी के चुनाव निशान साइकिल के साथ ही पार्टी संगठन पर भी लगभग शत-प्रतिशत नियंत्रण भी इस गुट हो गया.

लेकिन मतदाताओं में परिवार और पार्टी के इस विवाद का बहुत ही गलत असर पड़ा. समाजवादी पार्टी 403 में से महज 47 सीटें ही जीत पाई.

हालांकि दूसरे विपक्षी दलों को तो इससे भी कहीं कम सीटें मिलीं. बहुजन समाज पार्टी को 19, कांग्रेस को 7 और राष्ट्रीय लोक दल को सिर्फ एक सीट मिल पाई.

325 सीटें जीतकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, जिसमें से अकेले भारतीय जनता पार्टी की 312 सीटें थी, ने राज्य में सरकार बनाई.

इस नतीजे का मतलब यह हुआ कि अगले 5 सालों के दौरान समाजवादी पार्टी की राज्यसभा और विधान परिषद में भी शक्ति धीरे धीरे कम होगी.

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Image caption साधना यादव और मुलायम सिंह यादव

साधना और प्रतीक की नाराज़गी

दरअसल यह बाप और बेटे की लड़ाई अचानक शुरू नहीं हुई. इसके मूल में दो और मुख्य चरित्र रहे- मुलायम सिंह की दूसरी पत्नी साधना और उनका बेटा प्रतीक.

साधना को अभी तक यह बात हजम नहीं हुई है कि मुलायम सिंह ने अपने बड़े बेटे को मुख्यमंत्री बनाकर सरकार सौंप दी और पार्टी भी.

जबकि उनके छोटे बेटे को संपत्ति में कुछ हिस्सा मिला और राजनीतिक विरासत के नाम पर ज़ीरो.

यही वजह है उन्होंने तत्कालीन खनन मंत्री गायत्री प्रजापति को पूरी तरह संरक्षण दिया.

जबकि गायत्री के ख़िलाफ़ बलात्कार से लेकर ख़नन माफियाओं को संरक्षण देने तक के आरोप हैं.

साधना और गायत्री को साथ मिला मुलायम सिंह के सगे छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव का.

साल 2012 में चुनाव जीतने के बाद शिवपाल की निगाह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थी जिसे मुलायम सिंह ने अखिलेश की ओर सरका दिया.

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अखिलेश के लिए नए साल में चुनौतियां

इस आग में घी डालने का काम पिछले साल सितंबर में पार्टी में दोबारा शामिल हुए अमर सिंह ने किया.

उन्होंने साधना, प्रतीक, शिवपाल और गायत्री सभी को अखिलेश यादव के ख़िलाफ़ जमकर भड़काया.

यही वजह है कि अखिलेश ने सबसे पहला मोर्चा सरकार और पार्टी में दूसरे सबसे मज़बूत नेता माने जाने वाले शिवपाल के ख़िलाफ़ ही खोला था- उन्हें पार्टी से निकाल कर.

पार्टी में फूट का नतीजा ही था कि साल के आखिर में हुए नगर पालिका और नगर पंचायत चुनाव में समाजवादी पार्टी भाजपा और बसपा के बाद तीसरे नंबर पर रही.

इन चुनाव में बसपा को थोड़ा जीवन दान दे दिया जो 2014 में एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत पाई थी और विधानसभा चुनाव में भी 20 सीट तक नहीं जीत पाई थी.

लेकिन इन सब बातों के बावजूद अखिलेश के पक्ष में एक बात गई वह यह कि उन्होंने पार्टी पर अपना पूरा नियंत्रण कायम कर लिया.

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चुनाव की तैयारी

भले ही 2017 में बाकी पूरे साल अखिलेश ने कोई सक्रियता न दिखाई हो, लेकिन हर बड़े विषय पर उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दी है.

भले ही वह ईवीएम हैकिंग का मामला हो या गुजरात चुनाव या तीन तलाक़ पर लाए गए विधेयक का.

माना जा रहा है कि इतनी बुरी हार के बाद अखिलेश पार्टी को नए सिरे से खड़ा करने की कवायद कर रहे हैं. नया खून लाकर नया जोश फूंकने की कोशिश है.

लेकिन अखिलेश को याद रखना होगा कि उन्हें सिर्फ़ 2022 के विधानसभा चुनाव की तैयारी नहीं करनी है बल्कि अगले लोकसभा चुनाव 2019 के लिए भी पार्टी को तैयार करना है.

क्योंकि उसमें अब डेढ़ साल से भी कम का वक्त रह गया है.

अखिलेश को तेज़ी दिखानी होगी वरना वह अपने पिछले प्रदर्शन यानी 5 लोकसभा सीटों में ज़्यादा इज़ाफ़ा नहीं कर पाएंगे.

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