गुजरात में नितिन पटेल की नाराज़गी बीजेपी को पड़ेगी भारी?

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गुजरात में भारतीय जनता पार्टी की नवगठित सरकार में अंदरूनी मतभेदों की ख़बर है. उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल ने अभी तक अपना कार्यभार नहीं संभाला है.

कहा जा रहा है कि नितिन पटेल मंत्रालयों के बंटवारे से ख़ुश नहीं हैं और वो वित्त मंत्रालय नहीं मिलने से भी नाराज़ हैं.

राज्य की पिछली सरकार में पटेल के पास वित्त और शहरी विकास जैसे महत्वपूर्ण विभाग थे लेकिन इस बार उन्हें सड़क एवं भवन और स्वास्थ्य जैसे विभाग आवंटित किए गए हैं.

गुजरात में बीजेपी सरकार के गठन के बाद गत 28 दिसंबर को विभागों के बंटवारे में पटेल को इन दो विभागों के अलावा चिकित्सा शिक्षा, नर्मदा, कल्पसर और राजधानी परियोजना का प्रभार भी दिया गया है.

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हार्दिक पटेल का न्यौता

नितिन पटेल की नाराज़गी की इन ख़बरों के बीच पाटीदार अनामत आंदोलन समिति (पास) के नेता हार्दिक पटेल ने नितिन पटेल को बातों ही बातों में न्यौता दे दिया है कि वे अपने समर्थक विधायकों के साथ हमारे साथ या फिर प्रतिपक्ष के साथ जुड़ सकते हैं.

नितिन पटेल अब क्या करेंगे और नवगठित सरकार पर कोई संकट है कि नहीं इन सब बातों को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज़ हो गई हैं.

राजनीतिक विश्लेषक अजय उमट का कहना है, ''उत्तर गुजरात के पाटीदार नेता उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल से निजी मुलाक़ात कर अपना समर्थन दे रहे हैं, एक तरह से यह शक्ति प्रदर्शन ही है.''

''हालांकि वे विद्रोह करके हार्दिक पटेल से जुड़ जाएं ऐसी संभावनाएं बहुत कम हैं.''

अजय उमट आगे कहते हैं, ''इन सब घटनाओं से भाजपा सरकार किसी तरह के संकट में है या वह किसी संकट का सामना कर रही है ऐसा फिलहाल नहीं लगता, लेकिन पार्टी को एक शर्मनाक स्थिति का सामना ज़रूर करना पड़ रहा है.''

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'नितिन पटेल के पास ज़्यादा विकल्प नहीं'

राजनीतिक विश्लेषक हरि देसाई मानते हैं, ''नितिन पटेल इस बार मुश्किल से 7000 की बढ़त से अपनी सीट बचा पाए थे, इसके लिए भी उन्हें चौधरी पटेलों का समर्थन लेना पड़ा था.''

देसाई कहते हैं, ''वर्तमान हालात में शांति से बैठकर राजनीतिक कार्यभार संभालने के अलावा और नितिन पटेल के पास और कोई विकल्प नहीं है.''

''हार्दिक पटेल ने नितिन पटेल को कोई बड़ी उम्मीद नहीं दी है. कांग्रेस भी अपना संगठन ज़्यादा मजबूत करने में लगी है. नितिन पटेल कोई शंकर सिंह वाघेला नहीं है जो बहुत बड़ा विरोध कर सकें.''

अजय उमट का मानना है कि वर्तमान स्थिति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) गुजरात के बारे में कोई बड़ा कदम उठाए ऐसी संभावनाएं कम ही हैं. संघ सिर्फ नीति निर्धारित सूचनाएं देता है और पार्टी का मार्गदर्शन करता है, रोजमर्रा के काम में वह दखलअंदाजी नही करते.

हरि देसाई का मानना है कि संघ ने इस चुनाव में कोई भूमिका न निभाई होती तो शायद ही भाजपा इस बार गुजरात चुनाव जीत पाती. आज के दौर में संघ ऐसा कोई निर्णय नहीं लेगा जो मोदी को पसंद न हो. एक जमाने में संघ के करीबी रहे लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और नितिन गडकरी के आज क्या हाल हैं वो हम अच्छी तरह जानते हैं.

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'हम नज़र बनाए हुए हैं'

इन सब घटनाक्रम के लिए भाजपा का पक्ष जानने का प्रयास किया गया जो विफल रहा.

वहीं गुजरात कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष दोषी ने कहा, ''ये भाजपा का अंदरूनी मामला है, फिर भी पार्टी वर्तमान स्थिति पर नज़र रखे हुए है''.

उन्होंने कहा, ''पाटीदार नेताओं की राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल कर चुनाव जीतना और बाद में उन्हें अपमानजनक स्थिति में डालना भाजपा की नीति-नियती रही है. केशुभाई पटेल, डॉक्टर ए के पटेल, डॉक्टर वल्लभ कथेरिया और आनंदीबेन पटेल के बाद अब नितिन पटेल की बारी आई है.''

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कहा तो ये भी जा रहा है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व उन्हें बातचीत की मेज पर लाने की कोशिशें कर रहा है. बहरहाल, नितिन पटेल की नाराज़गी ने गुजरात में बीजेपी के असंतुष्टों, कांग्रेस नेताओं और हार्दिक पटेल को फ्रंट फुट पर खेलने का मौका तो दे ही दिया है.

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