2017 में सुस्त रही अर्थव्यवस्था, कैसा होगा साल 2018?

2014 में जीत के बाद वडोदरा में समर्थकों के बीच नरेंद्र मोदी इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption 2014 में जीत के बाद वडोदरा में समर्थकों के बीच नरेंद्र मोदी

भारतीय प्रधानमंत्री के लिए साल 2017 आर्थिक मोर्चे पर सबसे कठिन वर्ष रहा. चलिए देखते हैं कि अर्थव्यवस्था में कैसा रहा साल 2017 और इसके बिना पर आने वाला साल 2018 कैसा हो सकता है.

केवल एक साल पहले यह लग रहा था कि भारत विश्व अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अगुवा बनने की राह पर था. 2016 में यह दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था थी, यहां तक की चीन से भी बढ़कर जो मंदी का सामना कर रहा था.

भारत को धुंधली वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक चमकते देश के रूप में देखा जा रहा था. लेकिन 2017 में वाकया बदल गया जब भारतीय अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ गयी.

2016 में जनवरी से दिसंबर के दौरान प्रत्येक तिमाही के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था में सात फ़ीसदी से अधिक की दर से वृद्धि हुई. एक तिमाही में तो इसने 7.9 फ़ीसदी को भी छुआ.

लेकिन 2017 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में ही यह, तीन सालों में न्यूनतम स्तर, 5.7 फ़ीसदी पर जा लुढका.

हां, धीमी पड़ी अर्थव्यवस्था की रफ़्तार: जेटली

'भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ रही है'

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption 2016 में अचानक हुई नोटबंदी से छोटे व्यापारियों को सबसे अधिक हुई मुश्किलें

गले की फांस बना नोटबंदी और जीएसटी

आर्थिक मोर्चे पर दो प्रमुख निर्णयों का 2017 पर खासा असर रहा. इसमें पहला था, नवंबर 2016 की शुरुआत में अचानक अर्थव्यवस्था में दौड़ रही 86 फ़ीसदी नकदी को रद्द किया जाना, जिसका असर 2017 में भी रहा.

दूसरा, स्वतंत्रता के बाद से किया गया सबसे बड़े कराधान वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लागू करने में आयी परेशानी थी, जिसने जून 2017 में कई संघीय और राज्य करों की जगह ले ली.

क्यों बेरोज़गार हैं मुसलमान युवा?

बिहारः बालू पर बवाल, कामगार बेहाल

इमेज कॉपीरइट Getty Images

लेकिन सफलताएं भी मिलीं

लेकिन ऐसा नहीं है कि 2014 में सत्ता में आयी भारतीय जनता पार्टी के लिए 2017 केवल बुरी ख़बर ही लेकर आयी हो. इस साल कुछ ख़ास उपलब्धियां भी दर्ज की गयीं.

इसमें कारोबार करने में सहूलियत के मामले में विश्व बैंक की रिपोर्ट में भारत की रैंकिंग में जोरदार सुधार हुआ. यहां भारत 30 स्थानों की उछाल मारते हुए विश्व बैंक के शीर्ष 100 देशों में शामिल हो गया.

फिर अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट एजेंसी मूडीज़ का 2004 के बाद पहली बार भारत की रेटिंग को बढ़ाया जाना भी एक बड़ी उपलब्धि रही. मूडीज़ ने भारत की रेटिंग को बीएए 3 के बदले बीएए2 किया है, यानी स्टेबल से पॉजिटिव रेटिंग हो गई है. इस बदलाव का मतलब ये है कि भारत निवेश के लिहाज से इटली और फ़िलीपींस जैसे देशों की क़तार में आ गया है.

भारतीय शेयर बाज़ार में साल दर साल आधार पर 30 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई जो दुनिया के सर्वेश्रेष्ठ प्रदर्शनों में से एक था.

गैर-निष्पादित परिसंपत्ति या नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (एनपीए) की वजह से कर्ज में डूबे सार्वजनिक बैंकों के लिए भारत सरकार ने 32 बिलियन डॉलर के बेलआउट पैकेज की घोषणा की.

लेकिन कुल मिलाकर, यह एक मुश्किल साल था और 2018 में भी मोदी सरकार के सामने कई चुनौतियां हैं.

'विफलताओं का स्मारक बनाने के लिए 48000 करोड़!'

मूडीज़ रेटिंग से गुजरात में कितना फ़ायदा मिलेगा?

इमेज कॉपीरइट Getty Images

विकास की गति में तेज़ी लाना

2018 में आर्थिक विकास में तेज़ी लाना केंद्र सरकार के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण होगा. हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि सुस्त पड़ी रफ़्तार से उबरना थोड़ा धीमा होगा, हालांकि अधिकतर विशेषज्ञ कहते हैं कि यह तेज़ी 2017 से बेहतर ही होगी.

जेपी मॉर्गन के प्रमुख एशिया अर्थशास्त्री साजिद चिनॉय कहते हैं, "नोटबंदी और जीएसटी से लगे झटकों के प्रभाव स्वाभाविक रूप से फीके पड़ जायेंगे, इससे अर्थव्यवस्था रफ़्तार पकड़ती नज़र आएगी."

जीएसटी व्यवस्था को सरल बनाने के लिए सरकार ने पिछले कुछ महीनों में कई बदलावों की घोषणा की. आलोचनाओं के बाद 178 वस्तुओं की जीएसटी दरों में संशोधन भी किए गए.

भारतीय रेटिंग एजेंसी केयर के प्रमुख अर्थशास्त्री मदन सबनविस कहते हैं, "जीएसटी लागू किए जाने के कारण 2017 भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए परिवर्तन का साल रहा. अगले कुछ सालों के निरंतर विकास के लिए यह जरूरी था."

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान है कि अगले वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था 7.4 फ़ीसदी की रफ़्तार से बढ़ेगी. हालांकि, पहले इसने 7.7 फ़ीसदी का अनुमान लगाया था.

क्या इसलिए भारत में बेरोज़गारी बढ़ रही है?

रोजगार रहित विकास

भले ही अगले साल आर्थिक विकास की संभावनाएं अच्छी दिख रही हैं, लेकिन सरकार के लिए सबसे बड़ी बाधा नौकरी का सृजन करना है.

भारत दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है ,जिसे हर साल 1.2 करोड़ नौकरियों के सृजन करने की ज़रूरत है.

छोटे कारोबारी अभी नवंबर 2016 की नोटबंदी से उबरे भी नहीं थे कि जीएसटी ने फिर उनकी कमर तोड़ दी. इनमें से कई बंद तक हो गये, इससे लाखों लोग बेरोजगार हो गये, खास कर असंगठित क्षेत्र की नौकरियों पर इसकी बड़ी मार पड़ी.

कृषि, निर्माण और छोटे उद्यम भारत में सबसे बड़े रोजगार देने वाले क्षेत्र हैं, क्योंकि इनमें बड़े पैमाने पर श्रम शक्ति का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन ये तीनों क्षेत्र पिछले कुछ सालों से रोजगार पैदा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

गुजरात चुनाव में मुद्दों पर भारी पड़े मोदी

इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption धीमी हो रही है भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था

रोजगार सृजन बड़ी समस्या

प्रधानमंत्री मोदी के आर्थिक नीतियों में रोजगार सृजन नहीं कर पाना एक बड़ी समस्या बना हुआ है. हालांकि अधिकांश विशेषज्ञ मानते हैं कि यह अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालीन समस्या है, उन्हें उम्मीद है कि 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों को देखते हुए सरकार रोजगार को लेकर 2018 में क़दम उठाएगी.

चिनॉय कहते हैं, "हमें उम्मीद है कि सरकार कृषि और निर्माण जैसे छोटे बिज़नेस और सेक्टर में कुछ रोज़गार पैदा करेगी."

इमेज कॉपीरइट Thinkstock

बढ़ती तेल की क़ीमतें और मुद्रास्फीति

मुंबई स्थित ब्रोकरेज फर्म एंजेल ब्रोकिंग के उपाध्यक्ष मयूरेश जोशी के मुताबिक, कच्चे तेल की क़ीमतों में बढ़ोतरी और छोटे स्तर पर निजी निवेश का कम होना सरकार के सामने एक और बड़ी चुनौती है.

उनका कहना है कि बढ़ती कच्चे तेल की क़ीमतों का सरकार के वित्त पर असर पड़ेगा और इससे मुद्रास्फीति भी बढ़ सकती हैं, जो पिछले कुछ सालों से लगातार रिजर्व बैंक के लक्ष्य के अनुसार 4 फ़ीसदी से कम रही है.

घरेलू मांग को पूरा करने के लिए भारत अपने 70% तेल का आयात करता है. अब जबकि वैश्विक स्तर पर लगातार कच्चे तेल की क़ीमतों में बढ़ोतरी हो रही है, तो सरकार के पास दो विकल्प हैं- एक यह खुदरा क़ीमतें बढ़ा सकती है और दूसरा इसके फ़र्क का भुगतान वो खुद करे.

सबनवीस कहते हैं, "लोकसभा चुनाव केवल एक साल बाद हैं, इसलिए सरकार बढ़ी हुई पूरी क़ीमतों को सीधे ग्राहकों से नहीं वसूलना चाहेगी. यह एक अलोकप्रिय क़दम होगा."

रुक पाएगी मोदी, शाह की विजयी जोड़ी?

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption कृषि समस्याओं को लेकर तमिलनाडु के किसानों ने विरोध का अनूठा तरीका अपनाया

कृषि संकट

साल 2017 में पूरे देश में किसानों ने कई विरोध प्रदर्शन किए. पिछले कुछ सालों से अस्थिर विकास के कारण कृषि क्षेत्र खेती से आमदनी को लेकर संघर्ष कर रहा है. आधी से अधिक भारतीय आबादी कृषि पर निर्भर है. इस दौरान लाखों किसान कर्ज नहीं चुका सके जिससे परेशानियां बढ़ी हैं.

कुछ राज्यों, जैसे उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र ने किसानों के लिए कर्ज माफ़ी की घोषणा की लेकिन इसे लागू करने में समस्याएं हैं.

सबनवीस ने कहा, "मोदी सरकार वास्तव में इस पर कुछ नहीं कर सकती क्योंकि कृषि राज्य का विषय है और इसकी समस्या राज्य सरकार ही सुलझा सकती है. हालांकि आम जनों में इसे लेकर धारणा है कि यह केंद्र के अधीन है."

2018 में आठ राज्यों में चुनाव होंगे, इसमें से चार बड़ी ग्रामीण जनसंख्या वाले हैं.

भारतीय जनता पार्टी इनमें से तीन राज्यों में सरकार में है इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र सरकार कृषि की समस्या नहीं सुलझाती है तो इससे उसे चुनाव में नुकसान उठाना पड़ सकता है.

इस साल कितनी बढ़ी मुकेश अंबानी की संपत्ति?

इमेज कॉपीरइट Getty Images

2018 में कोई सुधार नहीं?

सत्ता में आने के बाद से मोदी को महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों को लागू करने का श्रेय दिया जा सकता है. लेकिन 2017 में सुस्त अर्थव्यवस्था और 2019 में चुनाव के मद्देनज़र लोगों को उम्मीद है कि वो आगामी वर्ष में सतर्क रहेंगे और कुछ प्रमुख सुधारों को अमलीजामा पहनायेंगे.

जोशी ने कहा, "सरकार को पिछले 40 महीनों में लाये गये सभी सुधारों को और मजबूत करने की ज़रूरत है. उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि सुधार ठीक से लागू किए गए हैं और आगे और बदलाव की कोई आवश्यकता नहीं है."

सरकार से ग्रामीण भारत पर अपना ध्यान केंद्रित करते हुए वहां समाज कल्याण योजनाओं पर ख़र्च बढ़ाने की उम्मीद किया जा रहा है.

नरेंद्र मोदी के लिए 2018 एक निर्णायक साल होगा. उनकी सरकार देश की अर्थव्यवस्था का संचालन कैसे करती है, निश्चित ही 2019 में उनकी चुनावी संभावनाएं बहुत हद तक इस पर टिकी होंगी.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)