नज़रिया: भीमा-कोरेगांव की सद्भावना में कौन रोड़े अटकाता है?

मराठा इमेज कॉपीरइट Hulton Archive

19वीं शताब्दी के दौरान अविभाजित भारत में फ़्रांसीसी, डच और पुर्तगाली इलाक़ों (कम महत्वपूर्ण) को छोड़कर केवल दो शक्तियां थीं- ब्रिटिश और मराठा.

मराठा साम्राज्य पश्चिम में गुजरात से लेकर पूरब में बंगाल और उड़ीसा तक, तो उत्तर में पेशावर (अब पाकिस्तान में) से लेकर दक्षिण में तंजौर और मैसूर तक फैला था.

अपनी सेना, प्रशासनिक अनुशासन और संसाधनों की वजह से अंग्रेज़ निश्चित रूप से कहीं बेहतर ताक़त थे, लेकिन मराठा भी कम पराकर्मी नहीं थे और वो अंग्रेज़ों के साथ तीन युद्ध लड़े.

पहला एंग्लो-मराठा युद्ध (1775-82) पेशवा परिवार में उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष के कारण लड़ा गया. इसमें अंग्रेज़ों की ईस्ट इंडिया कंपनी ने पेशवा नारायणराव के भतीजे रघुनाथराव का साथ दिया.

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क्या है इतिहास?

सिंहासन पाने के लिए रची गयी साजिश में नारायण राव की उनके महल में हत्या कर दी गयी. हालांकि, नारायण राव की मृत्यु के बाद उनके बेटे के जन्म के कारण रघुनाथराव का दावा स्वतः खत्म हो गया और उन्होंने साल्सेट और बेसिन पर नियंत्रण के बदले अंग्रेज़ी हुकूमत से मदद मांगी.

1779 में हुए उस युद्ध में अंग्रेज़ों की हार हुई लेकिन उन्होंने तब तक पीछे हटने से इंकार कर दिया जब तक कि दोनों पक्षों ने 1782 में युद्धविराम संधि नहीं कर ली.

सालबाई की सन्धि के परिणामस्वरूप 1775 से चला आ रहा पहला मराठा युद्ध समाप्त हो गया. अंग्रेज़ों ने माधवराव नारायण को पेशवा मान लिया और साल्सेट द्वीप को वापस करने के बदले मराठा सरकार ने रघुनाथराव को पेंशन देना स्वीकार कर लिया.

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मराठा हार का कारण बने

दूसरे एंग्लो-मराठा युद्ध (1803-05) में अपने ही बंधुओं से पराजित बाजीराव द्वितीय ने सिंहासन की बहाली के लिए एक समझौता किया जिससे बेसिन द्वीप अंग्रेज़ों को मिल गया. तीसरा एंग्लो-मराठा युद्ध (1817-18) वो निर्याणक लड़ाई थी जिससे भारत के अधिकांश हिस्सों पर अंग्रेज़ों का नियंत्रण हो गया.

वास्तव में तत्कालीन बॉम्बे प्रांत के कार्यकारी गवर्नर जनरल चार्ल्स मेटकाफे इसे अंग्रेज़ों और मराठों के बीच दूसरा युद्ध मानते थे.

इस युद्ध के बाद उन्होंने कहा, "भारत में केवल दो बड़ी शक्तियां हैं, अंग्रेज़ और मराठा, और बाकी सभी प्रांत इनमें से ही किसी एक का वर्चस्व स्वीकार करते हैं. जितना इंच हम पीछे हटेंगे, उसपर वो कब्जा कर लेंगे."

यह पूरी तरह से सही था. छत्रपति राजाओं के लिए उनके प्रधानमंत्री पेशवा ने अधिकांश भारतीय क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था, जिसपर वो मराठा सरदारों के समूह के ज़रिए राज करते थे. इनमें ग्वालियर में सिंधिया, इंदौर में होल्कर, बड़ौदा में गायकवाड़, नागपुर में भोंसले प्रमुख थे और बाद में पेशवाओं के ख़िलाफ़ षड्यंत्रों को अंजाम देते हुए ये ही मराठा हार का बड़ा कारण बने.

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ब्रिटिश सेना में कब शामिल हुए महार?

पेशवा चितपावन ब्राह्मण थे और उनके वंश में उत्तराधिकार के लिए हुई लड़ाई के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज के पोते और उनके वंशज छत्रपति साहूजी महाराज को अधिकारहीन कर दिया गया था.

तब सबसे पहले स्वराज की पहल करने वाले शिवाजी ने मुस्लिम आक्रमणकारियों के ख़िलाफ़ युद्ध में भारत में अछूत माने जाने वाले दलितों समेत समाज के सभी वर्गों को शामिल किया.

हालांकि, पेशवा ने वर्णाश्रम व्यवस्था के इस समूह को राज्य वापस कर दिया और इसी की वजह से अपना जीवन बेहतर करने की तलाश में दलितों का एक समूह महार ब्रिटिश सेना में शामिल हो गया.

अंग्रेज़ों ने महार रेजिमेंट की स्थापना की (जो आज भी भारतीय सेना में है) और ये वो ही महार शूरवीर थे जिन्होंने 1 जनवरी 1818 को भीमा-कोरेगांव के युद्ध में पेशवाओं को पराजित किया.

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मराठों और ब्राह्मणों के बीच दुश्मनी

तब से वो इस दिन हर साल उत्सव मनाते आए हैं. हालांकि, यह इतिहास हमेशा से ही महाराष्ट्र की तीन प्रमुख जातियों महारों, मराठाओं और ब्राह्मणों की सद्भावना के बीच आता रहा है. इन्होंने वास्तविक या काल्पनिक अत्याचारों के लिए कभी एक दूसरे को माफ़ नहीं किया.

ऐतिहासिक कारणों से मराठों और ब्राह्मणों के बीच आपसी दुश्मनी है क्योंकि मराठाओं ने छत्रपति शिवाजी के वंशजों को हाशिए पर लाने के ब्राह्मणों को कभी माफ़ नहीं किया. जबकि पेशवा विरासत के उत्ताराधिकारियों ने पेशवाओं को हटाने के कारण मराठा समूहों को कभी माफ़ नहीं किया.

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महाराष्ट्र की राजनीति

आधुनिक समय में ज़्यादा मुखर दलित समुदाय और मराठाओं के बीच झगड़े हुए हैं. (महाराष्ट्र के अधिकांश मुख्यमंत्री रहे) मराठा खुद को हमेशा ही शासक वर्ग मानते आए हैं लेकिन आज़ादी के दशकों बाद पहली बार महाराष्ट्र में सरकार से उनका नियंत्रण हट गया है.

वर्तमान मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ब्राह्मण हैं और भारतीय जनता पार्टी से ताल्लुक रखते हैं. पूर्व केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी प्रमुख शरद पवार जो कद्दावर मराठा नेता हैं, राज्य के लोगों से पूछ रहे हैं कि क्या वो महाराष्ट्र में पेशवाई शासन की वापसी चाहते हैं?

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बहुत गंभीर साजिश

हालांकि, पुणे के पास भीमा-कोरेगांव में हिंसा को भड़काने के लिए भाजपा के पूर्व नगर निगम मिलिंद एकबोटे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक संभाजी भिड़े की गिरफ़्तारी बहुत गंभीर साजिश की ओर इशारा करती है.

शिवसेना या मराठों (दोनों ही भगवा ध्वज साझा करते हैं) ने महिलाओं और बच्चों समेत निहत्थे दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा की जिम्मेदारी नहीं ली.

मराठों को हाल के दिनों में दलितों से समस्याएं रही हैं. जुलाई 2015 में तीन दलित युवकों के एक मराठा नाबालिग से बलात्कार और उसकी नृशंस हत्या के बाद पूरे राज्य में एक बहुत बड़ा मौन मोर्चा खड़ा हो गया.

हालांकि, कोई हिंसा नहीं हुई और सांप्रदायिक सौहार्द बरकरार रहा.

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पुराने घाव कुरेदने का प्रयास

अदालत ने बलात्कारी को मौत की सज़ा दे दी और इससे मराठों की पीड़ा एक हद तक कम हुई. हालांकि, ताज़ा हिंसा के बाद हुई यह गिरफ़्तारी दोनों समुदायों को जानबूझकर उकसाने के प्रयास का संकेत देता है.

अब तक भीमा-कोरेगांव की लड़ाई को मराठाओं के सिवा सभी भूल चुके थे.

संभवतः साजिशकर्ताओं ने पुराने घाव को कुरेदने के साथ ही भारतीय राजनीति की स्थिति को और भी तेज़ी से खराब करना सुनिश्चित किया है.

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भीम आर्मी जैसी सेनाएं खड़ी होने लगेंगी तो लोकतंत्र के लिए अलग चुनौती खड़ी हो सकती है.

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