अयोध्या के मुक़दमे

अयोध्या में विवादित भूमि
Image caption एक मुक़दमा पिछले 55 वर्षों से विचाराधीन है

राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में मुख्य रूप से दो तरह के मामले अदालतों में विचाराधीन हैं और एक आयोग इस मामले की जाँच कर रहा है.

इनमें पहली क़िस्म के पाँच मुकदमे उस ज़मीन के मालिकाना हक़ के लिए हैं जिस पर 1992 तक बाबरी मस्जिद बनी हुई थी.

ऐसा एक मुक़दमा तो पिछले 55 वर्षों से विचाराधीन है.

विवादित स्थल के मालिकाना हक़ के लिए चल रहे सारे मुक़दमे इस समय इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के पास एक साथ विचाराधीन है.

दूसरे मुक़दमे मस्जिद गिराने के लिए षडयंत्र रचने और इसके लिए लोगों को उकसाने के आपराधिक मुक़दमे हैं.

ये मामले लखनऊ और रायबरेली की विशेष अदालतों में चल रहे हैं.

विवाद की शुरुआत

वैसे तो बाबरी मस्जिद पर मालिकाना हक़ का मामला तो सौ बरस से भी अधिक पुराना है. लेकिन यह अदालत पहुँचा 1949 में.

यह विवाद 23 दिसंबर 1949 को शुरू हुआ जब सवेरे बाबरी मस्जिद का दरवाज़ा खोलने पर पाया गया कि उसके भीतर हिंदुओं के आराध्य देव राम के बाल रूप की मूर्ति रखी थी.

इस जगह हिंदुओं के आराध्य राम की जन्मभूमि होने का दावा करने वाले हिंदू कट्टरपंथियों ने कहा था कि "रामलला यहाँ प्रकट हुए हैं."

लेकिन मुसलमानों का आरोप है कि रात में किसी ने चुपचाप बाबरी मस्जिद में घुसकर ये मूर्ति वहां रख दी थी.

मुसलमानों का कहना है कि ऐसे कोई सबूत नहीं हैं कि वहाँ कभी मंदिर था.

सरकारी रिपोर्ट

9 अगस्त 1991 को भारतीय संसद में पेश की गई जानकारी के अनुसार फ़ैज़ाबाद के तत्कालीन ज़िलाधिकारी केके नैयर ने घटना की जो रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी थी उसमें लिखा था, "रात में जब मस्जिद में कोई नहीं था तब कुछ हिंदुओं ने बाबरी मस्जिद में घुसकर वहाँ एक मूर्ति रख दी."

अगले दिन वहां हज़ारों लोगों की भीड़ जमा हो गई और पाँच जनवरी 1950 को जिलाधिकारी ने सांप्रदायिक तनाव की आशंका से बाबरी मस्जिद को विवादित इमारत घोषित कर दिया और उस पर ताला लगाकर इसे सरकारी कब्ज़े में ले लिया.

16 जनवरी 1950 को गोपाल सिंह विशारद ने फैज़ाबाद की ज़िला अदालत में अर्ज़ी दी कि हिंदुओं को उनके भगवान के दर्शन और पूजा का अधिकार दिया जाए.

दिगंबर अखाड़ा के महंत और इस वक्त राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष परमहंस रामचंद्र दास ने भी ऐसी ही एक अर्ज़ी दी.

पूजा शुरू

19 जनवरी 1950 को फ़ैजाबाद के सिविल जज ने इन दोनों अर्ज़ियों पर एक साथ सुनवाई की और मूर्तियां हटाने की कोशिशों पर रोक लगाने के साथ साथ इन मूर्तियों के रखरखाव और हिंदुओं को बंद दरवाज़े के बाहर से ही इन मूर्तियों के दर्शन करने की इजाज़त दे दी.

साथ ही, अदालत ने मुसलमानों पर पाबंदी लगा दी कि वे इस 'विवादित मस्जिद' के तीन सौ मीटर के दायरे में न आएँ.

बाबरी मस्जिद में प्रशासन के आदेश से ही पूजा शुरु हुई थी

उमेश चंद्र पांडे की एक याचिका पर फ़ैज़ाबाद के ज़िला जज के एम पांडे ने एक फ़रवरी 1986 को विवादित मस्जिद के ताले खोलने का आदेश दिया और हिंदुओं को उसके भीतर जाकर पूजा करने की इजाज़त दे दी.

11 नवंबर 1986 को विश्व हिंदू परिषद ने विवादित मस्जिद के पास की ज़मीन पर गड्ढे खोदकर शिला पूजन किया.

1987 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में एक याचिका दायर की कि विवादित मस्जिद के मालिकाना हक़ के लिए ज़िला अदालत में चल रहे चार अलग अलग मुक़दमों को एक साथ जोड़कर उच्च न्यायालय में उनकी एक साथ सुनवाई की जाए.

इस अर्ज़ी पर विचार चल ही रहा था कि 1989 में अयोध्या की ज़िला अदालत में एक याचिका दायर कर मांग की गई कि विवादित मस्जिद को मंदिर घोषित किया जाए.

उच्च न्यायालय ने पाँचों मुक़दमों को साथ जोड़कर तीन जजों की एक बेंच को सौंप दिया.

इसके बाद 10 नवंबर 1989 को अयोध्या में मंदिर का शिलान्यास हुआ लेकिन अगले ही दिन फ़ैज़ाबाद के ज़िलाधीश ने आगे निर्माण पर रोक लगा दी.

1993 में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने विवादित स्थल के आसपास की 67 एकड़ ज़मीन को सरकारी क़ब्ज़े में लेकर उसे विश्व हिंदू परिषद को सौंप दिया था.

सरकार ने उस समय कहा था कि इस पूरी ज़मीन पर पर्यटन के लिए एक रामकथा पार्क विकसित किया जाएगा जिसकी ज़िम्मेदारी विश्व हिंदू परिषद को सौंपी गई थी.

1994 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस फ़ैसले को निरस्त कर सरकार को आदेश दिया था कि अयोध्या में विवादित ढांचे के आसपास की यह ज़मीन दोबारा अधिगृहीत की जाए और उस पर तब तक यथास्थिति बनाकर रखी जाए जब तक अदालत विवादित ढांचे की ज़मीन के मालिकाना हक़ का फ़ैसला न कर दे.

सर्वोच्च न्यायालय ने उस वक्त कहा था कि मालिकाना हक का फ़ैसला होने से पहले इस ज़मीन के अविवादित हिस्सों को भी किसी एक समुदाय को सौंपना "धर्मनिरपेक्षता की भावना" के अनुकूल नहीं होगा.

मस्जिद ध्वस्त

Image caption लालकृष्ण आडवाणी सहित आठ लोगों पर बाबरी मस्जिद गिराए जाने का षडयंत्र रचने का आरोप है

6 दिसंबर 1992 को भारतीय जनता पार्टी, शिवसेना, विश्वहिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया.

बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बारे में दो अलग-अलग मामलों की सुनवाई लखनऊ और रायबरेली में दो विशेष अदालतों में चल रही है.

पहले इस मामले में आडवाणी सहित 49 लोगों के ख़िलाफ़ लखनऊ में मुकदमा चल रहा था.

लेकिन उच्च न्यायालय ने आठ शीर्ष हिंदू राष्ट्रवादी नेताओं से संबंधित मामले को अलग कर दिया.

इसके बाद से इन आठ नेताओं के मामले की सुनवाई रायबरेली में हो रही है. रायबरेली की अदालत में चल रहा मुक़दमा मुख्यरुप से मस्जिद गिराने के षडयंत्र का मुक़दमा है.

मई 2003 को सीबीआई ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, साध्वी रितम्भरा, विष्णु हरि डालमिया, अशोक सिंघल और गिरिराज़ किशोर सहित आठ लोगों के ख़िलाफ़ पूरक आरोप पत्र दाखिल किए.

2003 में रायबरेली की अदालत ने आडवाणी को सभी आरोपों से बरी कर दिया था. लेकिन अदालत के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ मुस्लिम समुदाय के लोगों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया.

हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए 6 जुलाई 2003 को आडवाणी और अन्य नेताओं के ख़िलाफ़ मुक़दमा फिर से शुरू करने का आदेश दिया.

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका असलम भूरे ने दाखिल की थी कि जब बाबरी मस्जिद का मामला लखनऊ की अदालत में चल रहा है तो रायबरेली वाले मामले भी वहीं स्थानांतरित कर दिए जाएँ.

लेकिन 22 मार्च 2007 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा है कि मुक़दमा रायबरेली की अदालत में ही चलेगा.

लिब्रहान आयोग

इन मुक़दमों के अलावा बाबरी मस्जिद गिराए जाने को लेकर एक आयोग भी जाँच कर रहा है.

इस आयोग का गठन बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद 16 दिसंबर 1992 को किया गया था. कहा गया था कि यह आयोग तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट दे देगा.

लेकिन आयोग का कार्यकाल बढ़ता रहा और 14 वर्ष बीत जाने के बाद भी इसकी रिपोर्ट नहीं आई है.

हालांकि जून 2006 ने आयोग ने अपनी सुनवाई पूरी कर ली है.

आयोग ने पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव, पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों कल्याण सिंह और मुलायम सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी सहित बहुत से नेताओं के बयान दर्ज किए हैं.