'मस्जिद विध्वंस का सच आना चाहिए'

बाबरी मस्जिद (फ़ाइल फ़ोटो)
Image caption छह दिसंबर वर्ष 1992 में विवादित बाबरी मस्जिद को तोड़ दिया था

बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले की जाँच के लिए गठित लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट के आने में 17 साल का समय लग जाना आपन आप में एक बड़ा सवाल है, क्योंकि ये घटना देश के ऊपर पर एक जुर्म थी.

फिर भी क़ानूनी और न्यायिक प्रक्रिया में जो देरी होनी थी वो हो गई. ऐसे में इस समय का बड़ा सवाल यह है कि रिपोर्ट में क्या है.

इस घटना के लिए भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना के कार्यकर्ताओं और नेताओं के साथ किन-किन लोगों को ज़िम्मेदार ठहराया गया है?

यह मेरी अतिवादी व्याख्या होगी लेकिन मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि अगर इस रिपोर्ट में केवल भाजपा को ज़िम्मेदार ठहराया गया तो मुझे बड़ा दुख पहुँचेगा, क्योंकि वो तो सामने थे.

मस्जिद ढाते हुए भाजपा और शिव सेना के कार्यकर्ताओं को तो सबने सामने से देखा, उनकी वीडियो फ़ुटेज भी हैं.

अगर इस रिपोर्ट में सरकार की जो कोताही थी जिसकी वजह से भी मस्जिद टूटी, अगर उसका ज़िक्र नहीं है, तो रिपोर्ट अधूरी और पूर्वाग्रह से ग्रसित मानी जाएगी.

राजनीतिक प्रभाव नहीं

इस रिपोर्ट का कोई बड़ा राजनीतिक प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि रिपोर्ट बूढ़ी हो चुकी है.

लेकिन सबसे बड़ी बात है यह कि क्या रिपोर्ट में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव या उस समय के गृह मंत्री एसबी चौहान का नाम है कि नहीं?

मस्जिद को बचाने की संवैधानिक ज़िम्मेदारी गृह मंत्री की थी, इस समय उस बात पर बहस होनी चाहिए.

मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि भाजपा और शिव सेना के कार्यकर्ताओं ने जिस तरह मस्जिद को ढाया उसके लिए लिब्रहान आयोग की जाँच आवश्यकता नहीं थी, मैं तो उनका चेहरा वीडियो फ़ुटेज पर देख रहा था.

उस समय अयोध्या में केंद्रीय सुरक्षा बल भी मौजूद थे और अगर नरसिंह राव और एसबी चौहान आदेश देते तो मस्जिद बच सकती थी.

इसलिए रिपोर्ट से क्या उस समय की सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए गए हैं कि नहीं ये बड़ा सवाल है.

रिपोर्ट में जिन लोगों का नाम आएगा तो उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई हो सकती है, लेकिन मामला केवल कार्रवाई तक सीमित नहीं है, असल बात ये है कि इस घटना की सच्चाई सामने आनी चाहिए.

यह बात तय होनी चाहिए कि कहाँ-कहाँ, किस-किस की ज़िम्मेदारी थी.

मैं समझता हूँ कि इतिहास की पुकार है कि इस घटना के पर्दे के पीछे के ज़िम्मेदार लोगों के साथ सबका नाम सामने आना चाहिए है नहीं तो रिपोर्ट बेमानी होगी.

(वरिष्ठ पत्रकार एमजे अकबर से लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट आने के बाद की गई बातचीत पर आधारित)

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