'फांसी की सज़ा जारी रहेगी'

फांसी
Image caption पिछले दस वर्षो में सिर्फ एक बार ही भारत में फांसी दी गई

सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को ख़ारिज कर दिया है जिसमें फांसी की सज़ा के बदले ज़हर का इंजेक्शन देने की अपील की गई थी.

कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कहा कि इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि ज़हरीली सुई कम कष्टदायक होती है.

फांसी की सज़ा का विरोध कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अशोक कुमार वालिया का कहना था कि फांसी की सज़ा 'क्रूर और कष्टदायक' होती है, इसे हटा कर अभियुक्त को ज़हर का इंजेक्शन देने की व्यवस्था की जाए.

भारतीय अधिकारियों का कहना है आम तौर पर गंभीर मामलों में ही फांसी की सज़ा सुनाई जाती है.

पिछले 10 वर्षों के दौरान सिर्फ़ 2004 में एक अभियु्क्त को फांसी दी गई थी.

समाचार पत्र टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन का कहना था, "आप कैसे जानते हैं कि फांसी से दर्द होता है और ज़हरीली सुई देने से कैदी को दर्द नहीं होगा."

मुख्य न्यायाधीश बालाकृष्णन और जस्टिस पी सताशिवम का कहना था कि विशेषज्ञों का मानना है कि फांसी देने के बाद गले की हड्डी और रीढ़ की हड्डी टूट जाती है और ऐसे में तुरंत मौत हो जाती है.

बहुत सारे देशों में जहां मौत की सज़ा दी जाती है वहां बेहद नजदीक से गोली मार कर, गले में फांसी का फंदा लटका कर, ज़हरीली सुई लगाकर सज़ा को पूरा किया जाता है.

अख़बार के मुताबिक जज ने कहा, "भारत में सज़ा देने में मानवीय भावनाओं का ध्यान रखा जाता है. कोर्ट विरले मामलों में ही मौत की सज़ा देता है."

अदालत ने वालिया को सुझाव दिया कि वे भारत में मौत की सज़ा को पूरी तरह से ख़त्म करने के लिए अभियान चलाएँ.

उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 1983 में एक निर्णय में कहा था कि मौत की सज़ा सिर्फ़ 'विरले' मामलों में ही सुनाई जानी चाहिए.

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