पूर्व शाही इमाम बुख़ारी का निधन

शाही इमाम  का जनाजा
Image caption शाही इमाम के जनाजे में शामिल हज़ारों लोग

भारत की सबसे बड़ी जामा मस्जिद दिल्ली की जामा मस्जिद के पूर्व शाही इमाम सैयद अब्दुल्लाह बुख़ारी का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया है

उनकी आयु 87 वर्ष थी और पिछले कई दिनों से दिल्ली स्थिति अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में उनका इलाज चल रहा था. बुधवार की सुबह उनका निधन हो गया.

उनके परिवार में पत्नी, जामा मस्जिद के मौजूदा शाही इमाम अहमद अब्दुल्लाह बुख़ारी समेत चार पुत्र और दो पुत्रियाँ हैं.

अब्दुल्लाह बुख़ारी के बेटे और जामा मस्जिद युनाइटेड फ़ोरम के अध्यक्ष याहया बुख़ारी ने बीबीसी को बताया कि शाम की नमाज़ के बाद जामा मस्जिद से सटे उनके पैतृ्क क़ब्रिस्तान में उनको दफ़नाया गया.

याहया बुख़ारी ने अपने पिता के निधन पर कहा, "मैं बहुत बड़ी दौलत से महरूम हो गया हूँ. पिता का गुज़र जाना बहुत बड़ा धक्का है, लेकिन मेरी माँ ज़िंदा है और हम भाई-बहनों पर माँ का साया अभी बाक़ी है."

भारतीय मुसलमानों की राजनीतिक नेतृत्व के हवाले से अपने पिता के निधन पर याहया बुख़ारी ने कहा, "वो देश में धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक थे, इसलिए ये नुक़सान न सिर्फ़ मुसलमानों का है बल्कि पूरे भारत की एक बहुत बड़ी क्षति है. उनके चले जाने से लोगों पर से एक साया उठ गया है."

आपातकाल के हीरो

उर्दू दैनिक हिदुस्तान एक्सप्रैस के संपादक और मुस्लिम मामलों के जानकार अहमद जावेद ने पूर्व शाही इमाम के जीवन और उनके योगदान पर टिप्पणी करते हुए कहा, "वो न सिर्फ़ देश की सबसे बड़ी मस्जिद के इमाम थे बल्कि उन्होंने मुस्लिम नेता के रुप में सियासत में बडा़ रोल अदा किया. विशेष रुप से आपातकाल के समय इंदिरा गाँधी की निरकुंश सत्ता के ख़िलाफ़ जो आवाज़ उठी थी उसको उन्होंने जनआंदोलन बनाने में बड़ा योगदान दिया."

जावेद का आगे कहना था, "उन्होंने ज़बर्दस्ती नसबंदी के ख़िलाफ़ आपकातकाल में आंदोलन किया जब बड़े-बड़े मौलवी भूमिगत हो गए थे या देश से फ़रार हो गए थे, उनके इस दिलेरी ने उन्हें एक हीरो बना दिया."

आपातकाल के बाद अब्दुल्लाह बुख़ारी एक इमाम के बजाए बड़े मुस्लिम नेता बनकर उभरे, लेकिन उसके बाद विवादों ने उनका कभी भी पीछा नहीं छोड़ा. और फिर उनकी वो साख दोबारा उनको न मिल सकी. कुछ टीकाकारों की राय में पूर्व शाही इमाम का व्यवहार शालीन नहीं रहा.

बाबरी मस्जिद-राम जन्म भूमि आंदोलन जब चरम पर था तो वे मुसलमानों के एक अन्य बड़े नेता सैयद शहाबुद्दीन से धरने के दौरान बोट क्लब पर ही गुत्थम-गुत्था हो गए थे.

आज पूर्व शाही इमाम के निधन के बाद जब मैंने सैयद शहाबुद्दीन से उनके और इमाम साहिब के बीच संबंधों के बारे में पूछा तो उनका कहना था, "उनके साथ हमेशा हमारे अच्छे संबंध रहे और ये संबंध 1965 से थे, मेरा और उनका सिर्फ़ एक ही मामले पर विवाद था कि इमाम की हैसियत से वे सियासत नहीं करें, और मस्जिद को सियासत का अड्डा नहीं बनाएं."

सियासी इमाम

पूर्व शाही इमाम सैयद अब्दुल्लाह बुख़ारी 1973 में 2000 तक जामा मस्जिद के इमाम रहे

शहाबुद्दीन का ये भी कहना था उन्होंने इमाम साहिब को स्पष्ट कहा था कि मस्जिद की मेहराब से सियासी भाषणबाज़ी नहीं होनी चाहिए और उनके अनुसार इमाम साहिब के सियासी भाषणों की वजह से मुसलमानों का नुक़सान हुआ.

मुस्लिम मामलों के जानकारों का भी कहना है कि आपातकाल के बाद वे एक बड़े नेता के रूप में उभरे, लेकिन मुसलमानों का नेतृत्व करने में वे पूरी तरह असफल रहे.

टीकाकारों की राय में उन्हें एक ऐसे मुस्लिम नेता और इमाम के रुप में याद किया जाएगा जो बाज़ी जीत के हार बैठे और अपनी बिरादरी के लिए मौक़ा मिलने के बाद भी कुछ नहीं कर सके.

27 वर्षों की इमामत

पूर्व शाही इमाम 1973 में 2000 तक जामा मस्जिद के इमाम रहे. वे अपने पिता मौलाना सैयद हमीद बुख़ारी के बाद इमाम बनाए गए थे. वे जामा मस्जिद के 12वीं पीढ़ी के 12वें इमाम थे.

ग़ौरतलब है कि 17वीं शताब्दी में पाँचवे मुग़ल शहंशाह शाहजहाँ ने दिल्ली की जामा मस्जिद बनवाई थी जिसे मूल रूप से 'मस्जिद जहाँ नुमा' कहा जाता था.

शाहजहाँ ने मस्जिद बनावाने के बाद उज़बेकिस्तान के बुख़ारा से सैयद अब्दुल ग़फ़ूर शाह बुख़ारी को मस्जिद की इमामत के लिए बुलाया जिनका उस समय काम मस्जिद के इमामत के साथ राजा के राज्याभिषेक कराना भी होता था. 17 वीं शताब्दी में बुख़ारा इस्लामी ज्ञान और कला का केंद्र हुआ करता था.