कन्यादान के लिए 'कन्या अपमान'

सामूहिक विवाह
Image caption कहा जाता है कि शिवराज सिंह चौहान की योजना से भाजपा को प्रदेश में लाभ मिला

पिछले दिनों जब मध्य प्रदेश के शहडोल ज़िले में डेढ़ सौ ग़रीब युवतियों ने मुख्य मंत्री कन्यादान योजना में शामिल होने का आवेदन दिया तो स्वीकृति से पहले उन्हें निर्वस्त्र होकर अपने गुप्तांगों की जांच करवानी पड़ी.

ऐसा उन्हें इसलिए करना पड़ा ताकि प्रशासन को इसका सबूत मिल सके कि वे गर्भवती नहीं हैं. इस तरह की जांच का एक और मामला आदिवासी बहुल इस ज़िले के बुडहार प्रखंड में भी सामने आया है. इस प्रक्रिया से गुज़री कन्याएँ इसे शर्मनाक और अपमानजनक बता रही हैं. इसे समाज का एक वर्ग औरतों के सम्मान पर कुठाराघात और मानवाधिकारों का हनन मानता है. ख़बरों के अनुसार विवाह बंधन में बंधने आई कन्याओं को क़तार में खड़े होकर एक के बाद एक अपने आंतरिक अंगों की सघन जांच करवानी पड़ी जिसके बाद उन्हें प्रमाणपत्र दिया गया कि वे गर्भवती नहीं हैं. इसके बाद उन्हें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अति प्रचारित कन्यादान योजना में शामिल होने की इजाज़त और शादी के लिए 6500 रुपयों की सरकारी आर्थिक मदद मिल सकी.

वर्जिनिटी टेस्ट

हालाँकि शहडोल के ज़िलाधीश नीरज दुबे का कहना है कि सामूहिक विवाह वाले दिन ये पाया गया कि विवाह स्थल पर आवेदन देने वाले 90 से अधिक जोड़े उपस्थित थे. उनमें से कई के पास काग़ज़ात भी मौजूद नहीं थे और कुछ मामले संदिघ्ध भी लग रहे थे इसीलिए वहाँ मौजूद अधिकारी ने चिकित्सक से इनकी जाँच करवाई.

उन्होनें कहा, "वर्जिनिटी टेस्ट (कुंवारापन निर्धारित करने के लिए की जाने वाली जाँच) वग़ैरह करवाए जाने की जो बात कही जा रही है वह ग़लत है."

लेकिन घटना स्थल पर मौजूद लोगों के मुताबिक़ शादी की इच्छुक महिलाओं की जाँच के लिए वहाँ पहले से ही महिला चिकित्सकों को तैनात किया गया था. प्रशासन के अनुसार जाँच के बाद महिला चिकित्सक ने 13 'संदिग्ध' और एक अवयस्क युवती को इस सामूहिक शादी में शामिल न किए जाने की सिफ़ारिश की. मध्य प्रदेश में साल 2006 से शुरू किए गए मुख्य मंत्री कन्यादान योजना के तहत अब तक प्रशासन 90 हज़ार से अधिक ग़रीब लड़कियों की शादी करवा चुका है. योजना के तहत राज्य सरकार शादी के आयोजन के लिए एक जोड़े पर एक हज़ार रूपये ख़र्च करती है. साथ ही उन्हें 6500 रुपयों का घरेलू सामान भी उपहार में देती है. माना जाता है कि मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान के ज़रिए चलाई गई इस योजना ने उन्हें काफ़ी राजनीतिक लाभ पहुंचाया है. हाल में हुए विधान सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की जीत में इस योजना की बड़ी भूमिका बताई गई है. लेकिन पिछले दिनों ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिसमें शादी-शुदा जोडों ने आर्थिक लाभ के लालच में आवेदन देकर सामूहिक कार्यक्रम में दोबारा शादी रचाई हैं. ऐसी ख़बरें भी आई थी कि शहडोल के ब्योहारी में सामूहिक विवाह के दौरान एक महिला को मंडप पर ही प्रसव हो गया.

बाद में शहडोल में शुरू करवाया गया गर्भ परीक्षण ब्योहारी की घटना का नतीजा बताया जाता है.

महिलाधिकारों का हनन

Image caption छत्तीसगढ़ में भी सामूहिक शादी का आयोजन किया जा चुका है

महिला अधिकारों के लिए सजग देविंदर कौर उप्पल का कहना है कि शादी के लिए इच्छुक युवतियों को इस बात के लिए मजबूर करना कि वह एक सामूहिक कार्यक्रम के दौरान अपने गर्भवती न होने का सबूत दें यानी एक प्रकार से अपने कौमार्य को जग ज़ाहिर करें-महिला अधिकारों का सरासर हनन है.

उनके अनुसार किसी महिला का शादी से पहले गर्भवती होना या न होना उसकी या उसके पति की इच्छा पर निर्भर है और सरकार का इसमें कोई दख़ल नहीं होना चाहिए. कोई औरत या जोड़ा बच्चा ठहरने के बाद भी शादी कर सकता है. राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास ने बीबीसी से कहा कि किसी प्रशासन को यह अधिकार नहीं है की वह औरतों का इस प्रकार से अपमान करे और वह इस मामले पर मुख्य मंत्री को एक चिट्ठी लिखने जा रही हैं.

इस जाँच प्रक्रिया से गुज़री महिलाओं ने बयान दिया है कि पहले तो उन्होनें अपना गर्भ परीक्षण करवाने से साफ़ इनकार किया था लेकिन उनसे कहा गया कि शासन से मिलने वाला 6500 रुपयों की क़ीमत का घरेलू सामान उन्हें तब ही दिया जाएगा जब वह मेडिकल चेक अप कराएंगी, तो उनके सामने कोई चारा नहीं रहा.