खंडित मर्यादाओं की राजनीति

दलित मतदाता
Image caption कांग्रेस और बसपा, दोनों दलितों को अपनी ओर खींचने या बनाए रखने की कोशिश में लगे हैं.

अमेठी आकर आज राहुल गांधी ने मायावती के मूर्ति प्रेम की चर्चा की, विकास कार्यों की अनदेखी का आरोप लगाया, क़ानून और व्यवस्था में गिरावट की बात कही और रीता बहुगुणा जोशी के बयान पर सिर्फ इतना ही कहा कि उनके भाव चाहे सही हों पर शब्दों का चयन बहुत दुर्भाग्यपूर्ण था.

राहुल ने उनकी गिरफ़्तारी के बारे में कुछ भी नहीं कहा और न सिर्फ कुछ किलोमीटर की दूरी पर लखनऊ में रीता जोशी के जले हुए मकान को भी देखने गए, जिसकी उम्मीद रीता जोशी के सर्मथकों को थी.

दूसरी तरफ मुख्यमंत्री मायावती ने फिर दोहराया है कि रीता जोशी का आचरण माफी के काबिल नहीं है और उन लोगों से जो ऐसी किसी माफी के तरफदार हैं, यह प्रतिप्रश्न किया कि क्या कांग्रेस वरूण गांधी के घृणा-भाषण को भी माफी देने के लिए तैयार है. बकौल मायावती रीता जोशी का बयान तो वरूण गांधी के भाषण से से भी ज़्यादा घृणास्पद है.

एक वरिष्ठ बसपाई प्रवक्ता ने तो यह भी कहा है कि वरूण गांधी की टिप्पणी में कम से कम अश्लीलता तो नहीं थी जबकि रीता जोशी का वक्तव्य तो अश्लीलता की पराकाष्ठा है.

जाहिर है कि कांग्रेस और बसपा, दोनों रीता जोशी के नितांत अशोभनीय बयान, उनकी गिरफ्तारी और उनके घर आगज़नी- इन सबके बीच उस राजनीतिक संभावना की कामना कर रही है जो उन्हें इस अशोभनीय घटनाक्रम के बाद ज़्यादा से ज़्यादा जगह दे सके.

रक्षात्मक रवैये में कांग्रेस

कांग्रेस ने काफी हद तक रक्षात्मक रूख अपना रखा है जबकि मायावती धीरे-धीरे और आक्रामक होती जा रही हैं. दोनों की अपनी-अपनी अकाट्य वजहें हैं.

कांग्रेस जानती है कि रीता जोशी का बयान उस दलित वर्ग में मायावती के प्रति अतिरिक्त सहानुभूति फिर से जगा रहा है जो पिछले लगभग एक वर्ष से कथित ऊंची सवर्ण जातियों के प्रति झुकाव, बढ़ते भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अवहेलना के कारण स्वंय को सत्ता के हाशिए पर पा रहा था जबकि मायावती के शासनकाल में उसे अपने को सत्ता के केन्द्र पर देखने की कामना थी.

दलितों पर राज्य के भीतरी हिस्सों में बढ़ते अत्याचार और सरकारी नियुक्तियों में भ्रष्ट लेन-देन से इतनी तीखी निराशा होने लगी थी कि लोकसभा चुनावों में उसने बसपा से काफी हद तक अपना हाथ खींच लिया था.

अपनों के इस मोहभंग से स्तब्ध मायावती ने लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद सबसे पहले तो अपनी सरकार में सवर्ण नेताओं के बढ़ते वर्चस्व की रोकथाम की और फिर दलितों से जुड़े विकासकार्यों को तरजीह देना शुरू किया.

इसके अपेक्षित परिणाम उन्हें अब तक मिले भी नहीं थे और दलितों का एकछत्र नेतृत्व फिर से उनके पास आने की संभावना अभी अधूरी ही थी कि रीता जोशी ने यह नितांत असामयिक, अनावश्यक और अभद्र टिप्पणी कर बुझती लौ को नई चमक दे दी है.

कांग्रेस की सबसे बड़ी परेशानी यही है कि मायावती से क्षुब्ध दलित जो धीरे-धीरे फिर से कांग्रेस के करीब आ रहे थे, रीता जोशी प्रकरण के बाद कांग्रेस को लेकर फिर से आशंकित हो गए हैं.

नफ़ा किसका और नुकसान किसका...

यही वजह है कि रीता जोशी के बयान के इस विनाशकारी असर की रोकथाम के लिए पहले तो कांग्रेस पार्टी ने अपने को बयान से अलग किया और फिर स्वयं सोनिया गांधी ने अपने दल की ही प्रदेश अध्यक्ष की टिप्पणी पर खेद प्रकट करते हुए उसे अवांछनीय ठहराया.

रीता जोशी के घर पर आगजनी के मसले को भी कांग्रेस ने उस आक्रामकता के साथ नहीं उठाया है जिससे वह उठाया जा सकता था क्योंकि कांग्रेस की राय में इस प्रसंग को जितना तूल दिया जाएगा, उतना ही यह कांग्रेस की राजनीति, रणनीति के लिए घातक सिद्ध हो सकता है. इस प्रसंग पर राहुल गांधी की सावधान टिप्पणी भी इसी सोच का परिणाम है.

मायावती लेकिन कांग्रेस के खेद-प्रकट के बाद भी अपने तेवरों की आक्रामकता बनाए हुए हैं. उनका मानना है कि औपचारिक शब्दावलियों में प्रकट किया गया खेद तो केवल आडंबर-मात्र है. आप किसी के स्वाभिमान को रौंदकर, किसी के जातीय मूल पर प्रहार करके, किसी को उसके स्त्री होने के लिये अश्लील फिकरे का शिकार बनाकर सिर्फ खेद प्रकट कर दें तो यह काफी है क्या. क्या इससे उस अपराध का परिमार्जन हो जाता है.

कांग्रेस ने रीता जोशी के घर जलाए जाने को लेकर यह सवाल उठाया है कि क्या बयान (चाहे वह आपत्तिजनक ही क्यों न हो) का जवाब गृह-दाह है, यदि ऐसा होने लगा तो यह सिलसिला कहाँ थमेगा.

बहरहाल, कांग्रेस और बसपा दोनों आमने-सामने हैं. कांग्रेस ने दशकों बाद अपने पुनः उभरते पुराने दलित वोट बैंक को पाने की चाह में रक्षात्मक मुद्राएं अपना रखी है जबकि बसपा जो दलितों को अपना राजनीतिक आधार मानती है, किसी भी कीमत पर उन्हें आंशिक रूप से भी अपने से विलग होते देखना सहन नहीं कर पा रही है.

इस दौरान मूल्य-मर्यादाएं, राजनीतिक आचरण की शुचिता, शीलता-अश्लीलता, औचित्य-अनौचित्य की प्रक्रियाएं खंड-खंड हुई जाती हैं पर इसकी किसी को कोई चिंता दिखती ही नहीं हैं.

(लेखक 'दिनमान' और 'स्वतंत्र भारत' के पूर्व संपादक हैं)

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