करगिल चौक की किसे सुध

करगिल चौक
Image caption करगिल चौक के महत्व का कम ही लोगों को पता है.

पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान से सटे पूर्वोत्तर छोर का चौराहा पिछले नौ वर्षों से ''करगिल चौक'' नाम से जाना जाता है. इस गोलम्बर पर उन 18 बिहारी सैनिकों की याद में स्मारक बना है, जो करगिल युद्ध में मारे गए थे.

26 जुलाई को यहां होने वाले औपचारिक राजकीय समारोह से ठीक एक दिन पहले इस चौराहे पर खड़े होकर मैंने कई लोगों से पूछा कि इसका नाम ''करगिल चौक'' क्यों रखा गया.

हैरत हुई कि ''नहीं जानते'' कहने वालों की ही तादाद ज़्यादा थी. इनमें स्कूली बच्चे, पुलिसकर्मी, रिक्शा वाले, खोमचे वाले और कई अन्य आम लोग शामिल थे, जो या तो उसी चौराहे के इर्दगिर्द अपना ज़्यादा समय बिताते हैं या उसी रास्ते अकसर आना जाना करते हैं.

वहां अपने स्कूल जाने वाले अन्य साथियों की प्रतीक्षा में खड़े आठवीं क्लास में पढ़ने वाले विकास और पाँचवीं में पढ़ने वाले गौतम ने कहा, ''अंगरेज़ों से देश को आज़ादी दिलाने वालों के नाम पर बना है करगिल चौक.यहां धरना प्रदर्शन होता है. इतना ही जानते हैं हम.''

रिक्शा चालक जोगेन्दर सिंह का कहना था,'' हम लोग क्या जानें कि करगिल नाम क्यों है क्या है. इतने दिनों से यहां आते जाते हैं लेकिन किसी ने बताया नहीं तो पता नहीं है.''

फुटपाथ पर सत्तू बेचने वाली महिला बोलीं, ''का जानें करगिल क्या है. हम तो इसे सब्ज़ीबाग वाला रास्ते के चौराहा कहते हैं. सिपाही से पूछिए उनको पता होगा.''

इस चौराहे के ठीक बगल में लगे तंबू में पुलिस चौकी है. वहां ड्यूटी पर तैनात एक सिपाही अपना नाम नहीं बताना चाहते लेकिन उन्होंने जो कहा वो दिलचस्प था.

वो बोले, ''बॉर्डर पर हम थोड़े गए थे जो आप हमसे इतना डिटेल पूछ रहे हैं कि करगिल क्या है. कल आइएगा सलामी परेड देखने तो हाकिम लोगों से पूछ लीजिएगा.''

वहीं एक खोमचे वाला भी खड़ा था, बोल उठा, '' लड़ाई हुआ था तब न ये चौराहा इतना अच्छा बना है इसलिए लड़ाई होना ज़रूरी है.''

आस पास रहने वाले जो पढ़े लिखे लोग भी थे उनमें से भी अधिकांश ने स्मारक के शिलापट्ट पर उकेरे सैनिकों के नाम पते नहीं पढ़े हैं.

तो क्या इन लोगों में स्मारक के प्रति कोई सम्मान नहीं है. मुझे याद है कि जब बिहार के सैनिकों के शव करगिल से पटना एयरपोर्ट पहुंचे थे तो वहां श्रद्धांजलि देने के लिए लोगों का हूजूम उमड़ पडा था.

करगिल चौक के स्मारक स्थल की धुलाई सफाई हो रही थी क्योंकि 26 जुलाई को यहां एक समारोह होना है. साल में कम से कम एक बार ज़रुर सुध ली जाती है इसकी झकझक सफेद पत्थरों के चबूतरे पर संगीन के बल गड़ी हुई बंदूक और उस पर रखी टोपी का मतलब और महत्व कहीं बिल्कुल पथरा न जाए चिन्ता इस बात की ज़्यादा होनी चाहिए.

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