'अब भी वो शाम नहीं भूल सकता'

करगिल में मारे गए राजेंद्र सिंह
Image caption लांस नायक राजेंद्र सिंह पिंपल पहाड़ी पर दुश्मनों से लड़ते हुए मारे गए.

दस साल लंबा वक़्त होता है. ज़िंदगी न जाने कितने पड़ाव से गुजर चुकी होती है लेकिन आठ जुलाई, 1999 की शाम जो कुछ हु्आ उसे मेरा परिवार हर दिन, हर शाम याद करता है.

कहां से बताना शुरु करुं समझ नहीं आता. मेरा भाई राजेंद्र सिंह पढ़ने लिखने में उतना होशियार नहीं था, इसलिए सेना में जाने की तैयारी की और सफल हो गया.

जब करगिल की लड़ाई शुरु हुई थी उस समय वह जाट रेजिमेंट में लांस नायक था और उसकी तैनाती श्रीनगर में थी. लेकिन अचानक एक दिन उसके यूनिट को लेह-लद्दाख राजमार्ग की रखवाली के लिए भेज दिया गया.

ये बात है जून की. हम लोगों को वह ज़्यादा कुछ बताता नहीं था. अपनी पत्नी को अचानक एक दिन फ़ोन पर ही उसने कहा कि भईया और बाबूजी को कहना टेलीविज़न देखते रहें.

मेरी भाभी भावुक हो गईं, मैंने फ़ोन लिया तो उसने कहा कि हमारा बटालियन द्रास सेक्टर जा रहा है, वहां तुरंत जाना पड़ रहा है, मोर्चे पर ज़रूरत है.

लेकिन उसकी बातों में कोई शिकन नहीं, वो हम लोगों आश्वस्त करता रहा और कहता रहा कि टेलीविज़न देखते रहिए क्या हश्र होता है दुश्मनों का.

उसके बाद पाँच जुलाई को उसी के साथी ने फ़ोन पर बताया कि राजेंद्र सिंह ठीक है. हम लोग निश्चिंत तो नहीं ही थे, लेकिन इस ख़बर से घर में लोगों का मन थोड़ा ठीक हुआ.

पर दो दिन बाद ही उसके उसी साथी ने फ़ोन किया और रो पड़ा. बहुत पूछने पर सिर्फ़ इतना कहा, राजेंद्र नहीं रहा.

पूरे घर में मातम. आप समझ सकते हैं उस समय मेरा भतीजा सिर्फ़ आठ साल का था और उसकी पत्नी घर के बाहर गई हुई थी. वो तो घर में आईं तभी समझ गईं कि क्या हुआ.

तीन भाइयों में वो सबसे बड़े थे और हम सबका काफ़ी ख़याल रखने वाले.

दस मीटर का फ़ासला

आठ जुलाई को ही सेना के अधिकारियों ने भी हमे उस दुखद घटना की सूचना दी. मेरे मन में ये चल रहा था कि आख़िर उसकी मौत कैसे हुई.

Image caption राजेंद्र के भाई राकेश को सरकार से कोई शिकायत नहीं है

मैंने उसके साथियों से और सेना के अधिकारियों से पूछा तब पता चला. दरअसल सात जुलाई की रात द्रास सेक्टर की पिंपल पहाड़ी पर क़ब्ज़ा करने का फ़ैसला लिया गया था.

रात में अभियान शुरु हुआ लेकिन उसी रात पाकिस्तान की ओर से सबसे ज़ोरदार गोलाबारी शुरु हुई. उधर से मोर्टार के गोले दागे जा रहे थे. दुश्मन ऊपर पहाड़ी पर था इसलिए राजेंद्र के बटालियन को निर्देश आया कि कहीं भी ओट लेकर छिप जाएं.

मेरे भाई के पास स्वचालित राइफ़ल और गोलों से भरा बक्सा था. वो एक चट्टान के पीछे छिपा था और दस मीटर दूर उससे बड़े चट्टान के नीचे उसके ज़्यादातर साथी छिपे हुए थे.

उससे कहा गया कि जल्दी से इस तरफ़ आ जाओ. वह उस ओर भागा लेकिन तभी मोर्टार का एक गोला उसके पास गिरा और स्प्लिंटर उसके गर्दन में जा धँसा.

सुबह होते-होतो पिंपली की पहाड़ी तो भारतीय सेना के क़ब्ज़े में थी लेकिन मेरा भाई इस दुनिया को अलविदा कह चुका था.

आज दस साल बाद हमारा परिवार उसी की बहादुरी के सहारे जी रहा है. मेरी भाभी को पेंशन के रुप में पूरा वेतन मिलता है और मैं ये पेट्रोल पंप चलाता हूं जो सरकार ने हमारे परिवार को आवंटित किया.

सेना और सरकार से हमें कोई शिकायत नहीं है. जाट रेजिमेंट का तो मैं ख़ासकर शुक्रगुजार हूं. वे हर साल हमें सालाना आयोजन में बुलाते हैं.

ये भी बता दूं कि मेरे भाई का बेटा अब 18 साल का हो गया और ज़ोर शोर से एनडीए की तैयारी में लगा है. कहता है, "मुझे अपने पापा का नाम रौशन करना है."

(बीबीसी संवाददाता आलोक कुमार से बातचीत पर आधारित)

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