महानगरों का हाल - मुंबई

मुंबई
Image caption एक आकलन के अनुसार मुंबई के तट पर ज्वार-भाटा के बाद 650 टन कचरा जमा हुआ

करोड़ों की धन-संपत्ति वाले निवासियों का शहर मुंबई आपदा के समय किस हाल में होता है, इसका अंदाज़ा मेरे पिछले कुछ दिनों के अनुभव से लगाया जा सकता है.

मुंबई में वर्ष 2005 में बारिश के कारण आई बाढ़ के दृश्य तो लोगों को अब भी याद हैं, मैं आपको बताता हूँ पिछले दिनों की बारिश और ज्वार-भाटा के बाद के अपने अनुभव.

दो दिनों तक लगातार बारिश और ज्वार-भाटे के बाद समुद्री इलाक़े कचरे के ढेर में घिर गए. उसके अगले ही दिन मैं अपने एक फ़्रांसीसी पत्रकार दोस्त और अमरीका से लौटे एक भारतीय दोस्त के साथ मुंबई के मशहूर साहिल - मड आयलैंड गया. यह समुद्र का किनारा सुनहरा और साफ़ जाना जाता है. साथ ही, यह साहिल उन लोगों की वजह से बदनाम भी है जो यहाँ आकर रंग-रलियाँ मनाते हैं. दो घंटे गाड़ी चलाने के बाद हम इस समुद्री किनारे पर पहुंचे और पूछताछ के बाद साहिल के उस हिस्से की तरफ़ बढे जहाँ गंदगी नहीं होती और जहाँ आम तौर पर पैसे वालों की ही पहुँच होती है. हम वहाँ पहुंचे ज़रूर लेकिन वहाँ का हाल देखकर इतनी मायूसी हुई की पूछिए मत. हमारे क़दमों के नीचे सुनहरी रेत की जगह कचरा ही कचरा था...

650 टन कचरा जमा हुआ

फ्रांस के हमारे दोस्त ने कहा, "इतनी संख्या में सिरिंज यहाँ होने का मतलब है कि मुंबई के नौजवानों में ड्रग कल्चर आम है." लेकिन हमारे एनआरआई दोस्त ने कहा कि उन्हें कचरे को देखकर हैरानी नहीं हो रही क्योंकि मुंबई में हर जगह कचरा पड़ा दिख जाता है. जब हमने इस कचरे का मुआयना किया तो पाया कि सबसे अधिक प्लास्टिक की थैलियाँ थी और मादक पदार्थों के सेवन के लिए इस्तेमाल की गई सिरिंज...

स्थानीय लोगों ने बताया कि मुंबई के नौजवान वहाँ भारी संख्या में 'वीकएंड' मनाने आते हैं और नशीले पदार्थों का भरपूर इस्तेमाल होता है. दिलचस्प बात यह है कि यह कचरा समुद्र की लहरों ने वापस साहिल पर भेजा था. मुंबई नगर निगम के एक अनुमान के मुताबिक ज्वार-भाटा के बाद मुंबई के साहिली इलाकों में 650 टन कचरा इकट्ठा हो गया था.

हुआ यूँ कि मुंबई वाले हर रोज़ प्लास्टिक इत्यादि की लाखों थैलियाँ सड़कों पर फेंकते हैं जो नालियों से बहकर अरब महासागर में जमा हो जाती हैं. यही वापस आकर शहर में कई हिस्सों में जमा हो गया. ये तो बात थी कचरे की....अब बात करें जमा होने वाले बारिश के पानी की... ज्वार-भाटे के दिन शहर में काफ़ी दहशत फैली हुई थी. मैं उस दिन रिपोर्टिंग के लिए निकला तो हैरानी हुई कि सड़कें शाम चार बजे ही सूनसान हो गई थीं. नगर निगम ने लोगों को घरों से न निकलने की हिदायत दी थी.

ड्रेनेज सिस्टम में सुधार

तेज़ बारिश के बावजूद इस बार शहर के कुछ इलाकों को छोड़कर अन्य जगह पानी जमा नहीं हुआ. लेकिन क्यों?

दरअसल 2005 की बाढ़ शहर के लिए बहुत बड़ा झटका था. इस बाढ़ ने शहर में पानी की निकासी की ख़ामियों को उजागर किया था. मीठी नदी के किनारों पर ग़ैर-क़ानूनी बस्तियों और फ़ैक्टारियों के बन जाने के कारण पानी का रास्ता बिलकुल बंद हो गया था. राज्य सरकार ने पानी की सही निकासी के लिए ड्रेनेज सिस्टम की सफ़ाई की थी. इस बार पानी जमा नहीं होने का मतलब यह है की मुंबई के ड्रेनेज सिस्टम में सुधार हुआ है. नगर निगम की एक अधिकारी सीमा रेडकर कहती हैं, "शहर के ढांचों में कमियाँ निकालने की जगह शहर के लोगों को अपने गिरेबान में झाँककर देखना चाहिए. शहर वालों को सड़कों और समुद्र के किनारे कचरा फेकना बंद करना चाहिए. अगर शहर को साफ़ करने की कोशिश हो तो बरसात के कारण बाढ़ का ख़तरा बहुत हद तक कम हो जाएगा. सरकारी और निजी क्षेत्र की साझेदारी से ही शहर को प्राकृतिक हादसों से बचाया जा सकता है."

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