भाजपा ने फिर सरकार को घेरा

गिलानी और मनमोहन
Image caption मिस्र में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री गिलानी और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन के बीच बात हुई

लोकसभा में गुरुवार को भारतीय जनता पार्टी के वॉकआउट के बीच वरिष्ठ कांग्रेस मंत्री प्रणब मुखर्जी ने भारतीय विदेश नीति का ज़ोरदार बचाव किया. लेकिन बहस के अंत तक सत्तापक्ष भारत-पाक साझा बयान में आतंकवाद और समग्र बातचीत के मुद्दों को अलग करने, और बलूचिस्तान के ज़िक्र पर विपक्ष को संतुष्ट नहीं कर पाया.

गुरुवार को कांग्रेस मंत्री प्रणब मुखर्जी और विदेश मंत्री एसएम कृष्णा के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मिस्र यात्रा पर भाषण के दौरान भाजपा के नेताओं ने बार-बार स्पष्टीकरण माँगा और अंत में असंतुष्ट होकर सदन से बाहर चले गए. बुधवार को पहले ही प्रधानमत्री मनमोहन सिंह ने साझा बयान के समर्थन में सरकार का पक्ष रखा था. उन्होंने ज़ोर देकर कहा था कि पाकिस्तान के साथ भारत को 'परखकर ही विश्वास करने' के सिद्धांत पर आगे बढ़ना होगा क्योंकि आज की परिस्थितियों में बातचीत ही एकमात्र रास्ता है. दूसरी ओर बुधवार को विपक्षी दल भाजपा के यशवंत सिन्हा ने भारत-पाक साझा बयान को भारतीय विदेश नीति के इतिहास में सबसे बड़ी भूल की संज्ञा दी थी.

'क्या मूलभूत बदलाव हुआ'

गुरुवार को सरकार का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि जब वे विदेश मंत्रालय का कार्यभार संभाल रहे थे तब भी उनसे पूछा गया था कि 'आप पाकिस्तान पर हमला क्यों नहीं करते' और उन्होंने कहा था कि जंग इस समस्या का समाधान नहीं है.

उनका कहना था कि बाद के घटनाक्रम ने सिद्ध कर दिया कि भारत किसी के दबाव में नहीं है.

उन्होंने सवाल उठाया -"विदेश नीति में क्या मूलभूत बदलाव हुआ है? क्या हम पड़ोसी देशों के साथ भाईचार नहीं चाहते? क्या किसी भी देश के अंदरूनी मामलों दख़ल की हमारी नीति बदली है? हमारी विदेश नीति में कोई बदलाव नहीं है." मुखर्जी का कहना था, "अनेक बार हमसे ये कहा गया कि देश की प्रभुसत्ता के साथ समझौता हो रहा है. जब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से पैसा लेने की बात आई तो कहा गया कि आर्थिक संप्रभुता पर समझौता हो रहा है. जब विश्व व्यापार संगठन के साथ वार्ता की बात आई तो कहा गया कि प्रभुसत्ता ध्वस्त हो गई है. फिर जब असैनिक मकसदों के लिए अमरीका से परमाणु समझौता की बात आई तब भी यही कहा गया...." जब वामदलों के सदस्यों ने कुछ कहना चाहा तब गुस्साए प्रणब मुखर्जी ने कहा, "हम जानते हैं कि आप दक्षिण एशिया अर्थात भारत-पाकिस्तान को परमाणु हथियारों-ऊर्जा से मुक्त देखना चाहते हैं, फिर चाहे चीन के पास ये हों, फ़्रांस के पास ये हों....पिछले चुनाव में जनता आपकी इस नीति को नकार चुकी है."

बलूचिस्तान पर तू तू - मैं मैं, वॉकआउट

बलूचिस्तान के मामले में जब प्रणब मुखर्जी ने कहा कि बलूचिस्तान के मामले में हमारे पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है तो पूर्व विदेश मंत्री और भाजपा नेता यशवंत सिन्हा ख़ड़े हुए. उन्होंने पूछा, "तो भारत का मत इस साझा बयान में क्यों नहीं शामिल किया गया?"

तभी लोकसभा में विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा, "बलूचिस्तान का ज़िक्र द्विपक्षीय बातचीत और बयान में पहले कभी नहीं आया. बलूचिस्तान का ज़िक्र साझा बयान में है ही क्यों? इसमें हमारा मत क्यों नहीं है?" इसके बाद भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने ज़ोर देकर कहा, "हमें ये बताएँ कि साझा बयान में आतंकवाद और समग्र बातचीत के मुद्दे अलग करने से कौन सा राष्ट्रीय हित पूरा होता है."

इसके बाद लोकसभा में हंगामा होने लगा और विपक्ष के सांसदों ने बहुत शोर मचाया. प्रणब मुखर्जी शोर के बीच केवल इतना कह पाए, "भारत का बलूचिस्तान में विद्रोह भड़काने या कराने का कोई एजेंडा नहीं है." इसके बाद विपक्ष ने ज़ोर दिया कि विदेश मंत्री एसएम कृष्णा बलूचिस्तान पर स्पष्टीकरण दें. एसएम कृष्णा ने कहा, "जब दोनों प्रधानमंत्री मिले तो बलूचिस्तान पर बात हुई. पाकिस्तान के अनुरोध पर हम इसे साझा बयान में डालने पर तत्काल तैयार हो गए....क्यों कि हमारे पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है." इस पर विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा, "ये अजीब जवाब है. यदि बलूचिस्तान के बारे में हमें कुछ नहीं छिपाना है तो हमें इस पर आपत्ति जताई चाहिए थी. वैसे भी साझा बयान में हमारा पक्ष ऱखा जाना चाहिए था... पहले प्रधानमंत्री ने इसका जवाब नहीं दिया..अब हमें प्रतीत होता है कि प्रधानमंत्री के बयान के बाद आपके पास इस बारे में कहने को कुछ नहीं है और इस बहस का कुछ हासिल नहीं है..हम वॉकआउट कर रहे हैं." इसके बाद भारतीय जनता पार्टी के सभी सदस्य सदन से उठकर चले गए.

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