जजों से जुड़ा विधेयक नहीं पेश हुआ

संसद
Image caption संसद में सोमवार को इस विधेयक के मुद्दे पर ख़ासा बवाल हुआ और सरकार को पीछे हटना पड़ा.

भारतीय जनता पार्टी और वाम दलों के कड़े विरोध के कारण सोमवार को यूपीए सरकार जजों की संपत्ति से जुड़े विधेयक को राज्य सभा में पेश नहीं कर सकी.

विपक्षी दलों ने इस विधेयक का यह कहते हुए विरोध किया था कि जजों का अपनी संपत्ति का ब्यौरा जन साधारण के लिए उपलब्ध नहीं कराना समानता के अधिकार का हनन है.

बीजेपी के सांसद अरुण जेटली ने संविधान की धारा 91 का हवाला देते हुए कहा कि अलग अलग लोगों के लिए दो क़ानून नहीं हो सकते.

उनका कहना था, '' एक तरफ़ आप चुनाव लड़ने वालों से कहते हैं कि अपनी संपत्ति का ब्यौरा दें और न्यायाधीशों से कह रहे हैं कि वो अपनी संपत्ति का ब्यौरा न दें.''

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की बृंदा कारत ने कहा कि जजों की संपत्ति का ब्यौरा जन साधारण के लिए न होना समानता के अधिकार का उल्लंघन है.

असल में विधेयक में प्रावधान था कि जजों की संपत्ति की जानकारी सार्वजनिक न की जाए. इतना ही नहीं विधेयक में यह प्रावधान भी था कि जजों के निकटतम रिश्तेदारों की संपत्ति जजों की संपत्ति में न जोड़ी जाए.

हालांकि विपक्ष के विरोध के बीच सरकार का यह कहना था कि जजों की संपत्ति पर सुप्रीम कोर्ट नज़र रखेगा.

क़ानून मंत्री वीरप्पा मोयली ने कहा, '' सुप्रीम कोर्ट का अंदरुनी मैकेनिज़म है जिसके तहत जजों की संपत्ति पर नज़र रखी जाएगी. न्यायपालिका में बहुत भ्रष्टाचार है. हमें इससे निपटना होगा. हम जो बिल पेश कर रहे हैं वो समग्र होगी. हम न्यायिक सुधारों के लिए एक रोडमैप पर काम कर रहे हैं.''

हालांकि विपक्ष इस बात से सहमत नहीं हुआ और राज्यसभा में यूपीए का बहुमत नहीं होने के कारण आखिरकार क़ानून मंत्रि को यह विधेयक वापस लेना पडा.

फ़िलहाल न्यायाधीशों की संपत्ति से जुड़े क़ानून के तहत हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को अपनी संपत्ति के बारे में हर साल राष्ट्रपति को बताना होता है.

नए विधेयक के तहत भी जजों की संपत्ति को सार्वजनिक नहीं किया जाना था यानी यह सूचना के अधिकार से बाहर था और विपक्ष को इस तथ्य से कड़ी आपत्ति थी.