'पुलिस क़ानून से ऊपर'

पुलिस
Image caption भारत में पुलिस कभी कभार ही लोगों से तमीज से बात करते हैं.

दुनिया भर में मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाओं पर नज़र रखने वाली संस्था ह्यूमन राइट्स वाच का कहना है कि भारत की पुलिस अपने को क़ानून से उपर समझती है और पुलिस प्रणाली में सुधार के लिए बड़े क़दम उठाने चाहिए.

संस्था ने मंगलवार को बेंगलुरु में जारी रिपोर्ट में कहा है कि भारत की सरकारों ने मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में पुलिस की ज़िम्मेदारी तय करने के अपने वादे पूरे नहीं किए हैं.

ह्यूमन राइट्स की 118 पृष्ठों की रिपोर्ट में उन कई घटनाओं का ज़िक्र है जिसमें पुलिस ने मानवाधिकार उल्लंघन किया है. इसमें प्रताड़ना, बिना कारण गिरफ़्तारी और हिरासत में मौत जैसी घटनाएं शामिल हैं.

यह रिपोर्ट भारत के विभिन्न शहरों में कई पुलिस अधिकारियों, पुलिस प्रताड़ना का शिकार हुए लोगों, विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से बातचीत के बाद तैयार की गई है.

दिल्ली पुलिस के पूर्व आयुक्त अरुण भगत भी मानते हैं कि समस्या गंभीर है लेकिन वो इसके लिए राजनीतिक हस्तक्षेप को अधिक ज़िम्मेदार मानते हैं.

वो कहते हैं, '' आप देखिए सुप्रीम कोर्ट ने तीन साल पहले ही ये सुझाव दिए थे पुलिस सुधारों के. क्यों नहीं लागू हुए अभी तक. पुलिस अधिकारियों के तबादले किस तरह होते है.कोई जवाबदेही नहीं होती है. गृह मंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्रियों पर सब निर्भर करता है. जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं होगी कि पुलिस का काम बेहतरीन हो तब तक मुश्किल है कि मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाएं कम हों.''

इसमें राज्य पुलिस की असफलताओं का भी ज़िक्र है. रिपोर्ट के अनुसार पुलिसवाले क़ानून की परवाह नहीं करते, पुलिसकर्मियों की संख्या कम है और उनके प्रोफेशनल मानदंड भी अच्छे नहीं हैं.

पुलिसकर्मी कई मौकों पर लोगों की उम्मीदों पर पूरे नहीं उतरते हैं.

ह्यूमन राइट्स वाच के एशिया निदेशक ब्रैड एडम्स कहते हैं, '' भारत तेज़ी से आधुनिक हो रहा है लेकिन पुलिस अभी भी पुराने तरीकों से काम करती है. वो गालियों और धमकी से काम चलाते हैं. अब समय आ गया है कि सरकार बात करना बंद करे और पुलिस प्रणाली में सुधार किया जाए.''

रिपोर्ट के अनुसार कई पुलिसकर्मियों ने बातचीत के दौरान माना कि वो आम तौर पर गिरफ़्तार लोगों को प्रताड़ित करते हैं. कई पुलिसकर्मियों का कहना था कि वो क़ानून की सीमाएं जानते हैं लेकिन वो मानते हैं कि ग़लत तरीकों यानी अवैध रुप से हिरासत में किसी को रखना और प्रताड़ित करना ज़रुरी होता है.

रिपोर्ट का कहना है कि जब तक पुलिसकर्मियों को चाहे वो किसी भी पद पर हों, मानवाधिकार उल्लंघन के लिए सज़ा नहीं दी जाएगी तब तक पुलिस कभी भी ज़िम्मेदार नहीं हो सकती है.

ह्यूमन राइट्स वाच का यह भी कहना है कि पुलिसकर्मियों की आर्थिक और काम करने की स्थिति बुरी होना भी स्थितियां ख़राब कर रहा है. रिपोर्ट में कहा गया है कि निचले पदों पर काम करने वाले पुलिसकर्मी कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं और उनके रहने की जगह भी ख़राब होती है.

अरुण भगत भी कहते हैं कि निचले पदों पर काम करने वाले पुलिसकर्मी जिन हालात में काम करते हैं वो उनके व्यवहार और काम के तरीकों पर प्रभाव डालता है. वो कहते है, '' जो ऊपर के रैंक पर हैं उनका भविष्य बेहतर है लेकिन जो कांस्टेबल है हेड कांस्टेबल है उनको कितने पैसे मिलते हैं. उसका क्या भविष्य है. उसका फ्रस्टेशन तो देखिए. उससे तो ये ग़लतियां होगीं ही. इसे बदलने की ज़रुरत है.''

रिपोर्ट के अनुसार कई बार पुलिसकर्मियों के पास जांच के लिए ज़रुरी सामान नहीं होता और ये एक बड़ा कारण है कि वो शार्टकट्स का इस्तेमाल करते हैं और मानवाधिकार उल्लंघन होता है.

संबंधित समाचार