संस्कृत को बचाने के लिए अभियान

भारत में संस्कृत के विद्वान इस भाषा को आम अवाम तक पहुँचाना चाहते हैं.

Image caption आम लोग संस्कृत से दूर होते जा रहे हैं

इसे आम लोगों से जोड़ने की लिए नारा दिया गया है 'संस्कृत अति सरला नहीं कठिना'.

पूर्व और पश्चिम के कई देशो में संस्कृत के प्रति रूचि पैदा हुई है और विदेशी लोग संस्कृत सीखने भारत आ रहे हैं.

मगर इन विदेशी नागरिकों को भारत में संस्कृत की उपेक्षा पर बहुत दुख होता है.

पिछले दिनों ये विद्वान जयपुर में जमा हुए तो इस बारे में लंबी बातचीत की.

भाषाओं की सिरमौर संस्कृत को दुख ज़रूर होगा कि वो वेद, उपनिषद और शिलालेखों में तो है, लेकिन उसके कद्रदानों की संख्या कम होती जा रही है.

संस्कृत का विस्तार

संस्कृत ने कभी अपना विस्तार श्रीलंका और कंबोडिया तक किया था. कंबोडिया में अब भी संस्कृत मंदिरों, स्मारकों और शिलालेखों पर शोभित है.

कंबोडिया की कुंतेह कहती हैं कि वहां संस्कृत मंदिरों और शिलालेखों पर अपनी गहरी छाप छोड़े हुए हैं. कुंतेह ने बिहार के मगध विश्वविद्यालय से संस्कृत में एमए किया है.

वे कहती हैं, "कंबोडिया में संस्कृत की हालत अच्छी नहीं है. कुछ विद्यार्थी इसे सीख रहे हैं. असल में 13वीं सदी तक कंबोडिया में संस्कृत ठीक हालत में थी. फिर अंगकोरवाट के बुरे दिन आए तो संस्कृत भी प्रभावित हो गई."

कुंतेह ने बताया, "मैं अपने देश में संस्कृत को बढ़ावा देने वाला एक संस्थान खोलना चाहती हूँ, मैं इस बारे में भारतीय अधिकारियों के संपर्क में हूँ, संस्कृत सीखना बहुत उपयोगी होगा क्योंकि वहां उपलब्ध संस्कृत सामग्री को समझने के लिए ये ज़रूरी है."

बेल्जियम की खेरदा बीस साल पहले भारत आईं तो संस्कृत से ऐसा अनुराग पैदा हुआ कि वो खेरदा से जया बन गई. जया ने बनारस रह कर संस्कृत की शिक्षा ली और संस्कृत भाषा ही नहीं, भारतीय परिधान ही अपना लिया.

लेकिन वो भारत में संस्कृत पर नज़र डालती हैं तो उदास हो जाती हैं. उनका कहना है, ''आजकल युवा कंप्यूटर और विज्ञान जैसे विषयों में गहरी रूचि ले रहे हैं, संस्कृत की किसी को भी फ़िक्र नहीं है क्योंकि अब उन्हें अधिक पैसे में ही ख़ुशी मिलती है. दरअसल पैसा और ख़ुशी अब एक ही बात हो गई है. मैं बीस साल से भारत आ रही हूँ, पहले सब भारतीय लिबास में दिखते थे. अब सब बदल गया है. लोग जींस,पेप्सी और मेक्डोनल्ड को अपना बैठे हैं."

जया कहती हैं, "भारत के पास संस्कृत के रूप में बहुत बड़ा ज्ञान का खज़ाना है. इसे नहीं संभाला तो न केवल ये भाषा बल्कि भारत की संस्कृति को भी नुकसान होगा. ना जाने क्यों सब अमरीका के रंग- ढंग को अपना रहे हैं."

पीछे छूटती भाषा

अमरीका के एक विश्वविद्यालय में भारतीय अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर फ्रांसिस कहते है, "अमरीका में कितने लोग संस्कृत सीख रहे है, ये संख्या तो बताना मुश्किल है. मगर ये संख्या कम भी नहीं है. हाँ इतना ज़रूर है की ज़्यादा लोग विज्ञान और कंप्यूटर पर ज़ोर देते हैं."

फ्रांसिस का मानना है, "भारत एक बड़ा देश है और चुनौतियाँ भी खूब है. भारत आर्थिक क्षेत्र में तरक्की करे और विश्व मंच पर अपनी मज़बूत जगह भी बनाए. मगर उसे संस्कृत को भूलने की गलती नहीं करनी चाहिए क्योंकि उसे अपनी पहचान के लिए संस्कृत और तमिल जैसी ज़बानों पर लौटना होगा."

संस्कृत को उसके विद्वानों ने इतना ऊँचा दर्जा दिया कि वो मंत्रों, मंदिरों और देवालयों तक समिति होकर रह गई.

अब विद्वान उसे आम लोगों तक पहुचने का प्रयास कर रहे है. संस्कृत के विद्वान कलानाथ शास्त्री स्वीकार करते हैं कि मध्य काल में संस्कृत को आम लोगों से दूर कर दिया गया.

वे कहते हैं, "ये एक भ्रम था कि संस्कृत केवल किसी वर्ग की भाषा है. यहाँ तक कह दिया गया कि स्त्री संस्कृत से दूर रहे. इससे संस्कृत को नुकसान हुआ. अब तो अभियान चलाया जा रहा है और महाजन वर्ग के लोग भी अच्छे पुरोहित साबित हुए हैं. न केवल महाजन बल्कि समाज में वंचित रहे तबकों के लोग भी पुरोहित बन रहे है."

विद्वान संस्कृत को एक सरल रूप पेश कर रहे हैं.

शास्त्रीय भाषा कोई भी हो, उसे बोलते तो इंसान ही हैं. लेकिन संस्कृत को देव भाषा बना दिया गया .ऐसे में भाषाओं की जननी संस्कृत देहरी पर बैठे लोगों से इतनी दूर हो गई कि अब उसे लोगों के पास लाने के लिए अभियान चलाना पड़ रहा है.

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