अपनी रोशनी में जीने की कोशिश

नजमा हेपतुल्ला
Image caption नजमा हेपतुल्ला समय-समय पर महिला अधिकारों के लिए आवाज़ उठाती रही हैं

राज्यसभा की पूर्व उपाध्यक्ष नजमा हेपतुल्ला कई वर्षों से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं से जुड़े मुद्दे उठाती रही हैं.

उनका कहना है कि वो आज भी अपने दादा मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के उसूलों पर चल रही हैं.

पेश है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश.

किस तरह की यादें हैं मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की आपके साथ?

हमारी दादी अक्सर उनके किस्से हम बच्चों को सुनाया करती थीं. हम जब पढ़ रहे थे तब वह देश की सेवा में व्यस्त थे. मेरी उनसे ख़ास बातचीत तब शुरू हुई जब मैंने मैट्रिक कर लिया. मैंने उन्हें ख़त लिखा कि मैं मेडिकल में जाना चाहती हूँ. उसके जवाब में उन्होंने लिखा कि तुम ज़रूर मेडिकल में जाओ, उच्च शिक्षा हासिल करो और योग्य बनो. लेकिन तुम्हें इस बात का अहसास होना चाहिए कि तुम्हें देश और समाज की सेवा करनी है. क्योंकि अक्सर लड़कियां पढ़ाई के बाद शादी कर लेती हैं और अपने हुनर का इस्तेमाल नहीं करती हैं. मैं नहीं चाहूँगा कि एक पढ़ा-लिखा बच्चा जो देश की सेवा कर सकता है उसकी वह सीट किसी ऐसे बच्चे को जाए जो अपना यह फर्ज़ अदा न कर पाए. मैंने उनकी दोनों हिदायतों पर अमल किया और अपनी रोशनी में जीने की कोशिश की.

दादी के मुताबिक़ मौलाना के बचपन के किस्से क्या थे?

दादी बताती थीं कि जब हम चारों भाई-बहन खेलते थे तब मौलाना संदूक़ पर चढ़ कर सिर पर कपड़ा बांध लेते थे और हम भाई बहनों से कहते थे कि मैं रेल के डिब्बे से उतर रहा हूँ और तुम सब कहो दिल्ली के मौलाना आए हैं, दिल्ली के मौलाना आए है और भीड़ को हटाकर मुझे नीचे उतारो. तो इस तरह उनकी दिल्ली के मौलाना बनने की इच्छा आगे जाकर सच साबित हुई. और वह मुल्क के मौलाना क्या, दुनिया के मौलाना बनकर आगे बढ़े.

बचपन में किस तरह के शौक़ थे मौलाना के?

दादी के मुताबिक़ दादा अब्बा को बचपन से ही किताबें पढ़ने का शौक़ था. बचपन में जब उन्हें जेब ख़र्च के पैसे दिए जाते थे तो वह उनसे किताबें और मोमबत्ती ले आते थे ताकि जब घर की बत्तियां बंद हो जाएं तो वह अपनी किताबें पढ़ सकें. हमें भी मौलाना ने अच्छी शिक्षा हासिल करने की हिदायत दी थी. उनका मानना था कि इंसान की पहचान उसका इल्म और हुनर होना चाहिए न कि ये कि वह किस ख़ानदान से ताल्लुक़ रखता है.

राजनीति में आना महज़ इत्तफाक़ था या इसके लिए आपने कोशिश की?

मेरा खा़नदान चूँकि आज़ादी की लड़ाई में शामिल था तो मुझमें राष्ट्रीय भावना का होना स्वाभाविक था. मैं राजनीति से क़रीब से जुड़ी हुई थी. पार्टी के लिए काम करती थी. लेकिन संसद में आने के बारे में कभी नहीं सोचा था. मैंने पीएचडी की थी और रिसर्च करना चाहती थी. लेकिन जब मैंने देखा कि औरतें, ख़ासतौर पर पढ़ी-लिखी मुसलमान औरतें राजनीति में नहीं आती हैं, तो मैंने राजनीति में आने का मन बनाया.

राजनीति में आपको महिलाओ का भविष्य कैसा नज़र आता है?

मुझे उनका भविष्य अच्छा नज़र आता है. हाल के चुनाव इसका सबूत हैं. सभी पार्टियों से महिलाएँ जीतकर आई हैं.

महिला आरक्षण विधेयक का विवाद बहुत दिनों से चल रहा है. तो क्या महिलाओं की तरक्क़ी बिल पर निर्भर है?

पता नहीं विधेयक आएगा या नहीं. लेकिन औरतें आगे बढ़ने के लिए विधेयक की मोहताज नहीं हैं. मैं चाहती हूँ कि संसद में ख़ूब महिलाएँ आएँ. इतनी आएँ कि आरक्षण की ज़रूरत ही न पड़े.

कभी आपको अपने ख़ुद के साथ वक़्त गुज़ारने की फुरसत मिलती है?

हां क्यों नही, मैं किताबें पढ़ती हूँ, इंटरनेट सर्च करती हूँ, सिल्क पर केलीग्राफ़ी करती हूँ और कभी-कभी बावर्चीख़ाने में जाकर पतीली में चम्मचा चलाने में भी गुरेज़ नहीं करती.

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