शिक्षा का अधिकार और बिहार की सच्चाई

स्कूल
Image caption ये गंदी नाली ही दिख रही है लेकिन ध्यान से देखिए कोने पर एक स्कूल भी है... क्या ऐसे होते हैं स्कूल

बिहार में सरकार बच्चों के लिए मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिलाने वाले क़ानून को अगर सही मायने में लागू करके दिखा दे तो उसे चमत्कार ही माना जाएगा.

चुनौती जैसी यह बात यहाँ दबी ज़बान से नहीं, बल्कि खुलेआम कही जाती है और क्यों के जवाब में इतने कारण गिना दिए जाते हैं कि ‘क्यों’ पर ‘इसलिए’ भारी हो जाता है.

संक्षेप में कहें तो यहाँ सरकार के ज़रिए उपलब्ध कराई गई प्राथमिक शिक्षा-व्यवस्था जैसी चरमराई हुई है, वैसी शायद ही कहीं और होगी. ऐसी दुर्दशा को महज़ कुछ आंकड़ों, शब्दों और चित्रों के ज़रिए देख-समझ पाना कठिन है, फिर भी.....

बतौर बानगी, पटना के काठपुल मंदिरी मोहल्ले के सरकारी प्राइमरी स्कूल का जायज़ा पेश है.

बजबजाती गंदगी से भरे नाले के बिल्कुल किनारे पर किसी तरह टिका हुआ एक जर्जर स्कूल भवन. कोई जमी हुई दीवारों वाले दो कमरों का एक मकान, जिसमें पहली से पाँचवीं कक्षा तक पढ़ाई के लिए बने दो-दो स्कूल चलाए जा रहे हैं. बिना भवन वाले लोदीपुर उर्दू प्राइमरी स्कूल को काठपुल मंदिरी के राजकीय प्राथमिक विद्यालय में शरण दी गई है.

बदबू और बेपरवाह बच्चे

स्कूल के इर्दगिर्द फैले मलमूत्र वाले कीचड़ से किसी तरह बचते हुए मैं क्लास रूम तक पहुँच गया. वहाँ भी अगल-बग़ल से बदबू आ रही थी, लेकिन इसके आदी हो चुके वहाँ के स्कूल टीचर और बच्चे उस बदबू से बेपरवाह बने हुए थे.

शिक्षा के अधिकार विधेयक के लिए जिस दिन लोकसभा की मंज़ूरी मिली थी, मैं उसी दिन वहाँ गया था. चार शिक्षिकाएँ और कुल मिलाकर पचास बच्चे थे स्कूल में. जबकि रजिस्टर में तीन सौ से अधिक बच्चों के नाम दर्ज थे.

प्रधान शिक्षिका कल्पना बिस्वास ने कुछ हिचकिचाते हुए ‘ड्रॉप आउट्स’ यानी स्कूल आना छोड़ चुके बच्चों की बड़ी तादाद पर चिंता ज़ाहिर की. तबतक क्लास में कुछ चूहों की उछलकूद से हड़बड़ाए बच्चों पर मेरी नज़र पड़ी.

कल्पना ने चौंकाने वाली बात कही, ''अभी क्या देख रहे हैं, इस स्कूल के अंदर बिल बनाकर रहने वाले चूहों की तादाद कभी-कभी यहाँ पढ़ने वाले बच्चों से ज़्यादा नज़र आने लगती है. यहाँ दिन में भी दौड़ लगाते चूहों का उत्पात इसलिए बढ़ गया है क्योंकि मिड-डे मील स्कीम के तहत यहाँ रखे चावल खा-खा कर मोटे हो रहे चूहे मस्ती के मूड में रहते हैं.''

लेकिन दूसरी तरफ़ कुपोषण के शिकार लग रहे यहाँ के स्कूली बच्चों से जब मैंने उनकी परेशानियों के बारे में पूछा तो सहमे-सकुचाए स्वरों में वो कहने लगे. “स्कूल में चापाकल (हैंडपाइप) नहीं है इसलिए पानी पीने के लिए दूर जाना पड़ता है. बहुत दिनों से स्कूल की बिजली लाइन कटी हुई है. पंखा नहीं चलने से बहुत गरमी लगती है, शौचलाय नहीं है, ऐसे में शौच के लिए नाले के उस पार जाना पड़ता है. बरसात में जब छत से पानी चूने लगता है तो बोरिया-बस्ता लेकर इधर-उधर भागना पड़ता है.”

स्कूल का फ़र्क़

Image caption ये है क्लासरुम जिसकी हालत चूहों ने ख़राब कर रखी है. इन्हीं जगहों पर छात्रों को बैठना पड़ता है.

किसी दूर देहात का नहीं, पटना शहर के बीच का सरकारी स्कूल है ये. इसके बग़ल में चकाचक बिल्डिंग वाला एक प्राइवेट स्कूल है. वहाँ के बच्चे ‘टिफ़िन बॉक्स’ और पानी की बोतल साथ में रखते हैं, लेकिन सरकारी स्कूल में मुफ़्त मिलने वाले मध्याह्न भोजन की लालच में पढ़ने आ रहे ग़रीब बच्चे खिचड़ी खाते समय ये भी नहीं देखते कि उसमें कहीं कीड़े तो नहीं हैं.

मोटी फ़ीस वाले प्राइवेट स्कूल की वहाँ चर्चा छिड़ी तो चौथी क्लास के छात्र संजीत कुमार ने अपने साथ संतोष के कान में फुसफुसाकर कुछ कहा. संतोष ने मैडम से चुगली कर दी. “ये कहता है कि हमलोग तो डोम टोली में रहते हैं, मोटरगाड़ी वाले बच्चों के स्कूल में हम लोगों को कौन घुसने देगा.”

पाँचवी क्लास की खुशमिज़ाज लड़की करीमा ख़ातून की तरफ़ से इशारा करके उसकी स्कूल टीचर ने मुझसे कहा- ‘वो समझदार लड़की है उससे पूछिए.’

इतने में करीमा झट से बोल उठी, “ग़रीबी-ग़रीबी बार-बार बोलने से क्या फ़ायदा? घर और स्कूल में दिक़्क़त बहुत है तो क्या पढ़ना छोड़ दें?” मुश्किलों से जूझने की चमक थी उसकी आँखों में.

चलते-चलते मैंने यहाँ की महिला शिक्षकों से पूछ लिया कि ये जो ‘शिक्षा के अधिकार’ वाला क़ानून आ रहा है, उससे आपके स्कूल पर क्या फ़र्क़ पड़ेगा? जवाब था, “फ़र्क़ क्या पड़ना है, सब ऐसे ही लटपट चलता रहेगा. आप ही बताएं, अभी तक जो स्कूल चलाने का नियम-क़ानून बना हुआ है वो सब ठीक से लागू होता तो राजधानी पटना के इस सरकारी स्कूल की नरक जैसी हालत क्यों होती?”

ज़मीनी सच्चाई से उभरे इस तार्किक सवाल को यहीं छोड़ते हुए मैंने पटना शहरी क्षेत्र से आगे बढ़कर मनेर प्रखंड के ग्रामीण इलाक़े का रुख़ किया. गाँव का नाम ख़ासपुर. यहाँ के एकमात्र सरकारी प्राइमरी स्कूल की शक्ल-सूरत देखी तो लगा जैसे वर्षों से बेकार पड़े तबेले का जर्जर अवशेष देख रहा हूँ. वहाँ दो महिला शिक्षक और आठ-दस बच्चे स्कूल के अस्तित्व में होने का संकेत भर दे रहे थे.

वहाँ की शिक्षिका सुनीता कुमारी ने चौंकाने वाली जानकारी दी कि ये मकान ख़ासपुर गाँव का सामुदायिक भवन (कम्युनिटी हॉल) है. स्कूल की अपनी बिल्डिंग नहीं है इसलिए इसी भवन में स्कूल चलता है.

इस चित्र को देखिए और सोचिए कि क्या ऐसा भी होता है. सामुदायिक भवन और बच्चों का स्कूल! अद्भुत है सरकार की लीला!

Image caption क्या ऐसा होता है सामुदायिक भवन .. जहां स्कूल चलता हो.

यहां बच्चों को पढ़ाने वाली अवलेश कहती हैं. “का करें, टिफ़िनवा के बाद, मतलब खिचड़ी खा के भाग जाता है लइका लोग (बच्चें). खुली जगह है और स्कूल में तो बैठने की भी दिक़्क़त है, इसलिए जो घर भाग जाता है तो कितना दौड़े पीछे-पीछे. कंट्रोल में कोई नहीं है..”

क़ानून बेअसर रहेगा

भोजपूरी मिश्रित हिंदी में स्कूल का हाल बताने वाली इस शिक्षिका अवलेश पर एक बच्चे के अभिभावक ने आरोप लगाया कि वो तो स्कूल में अपने बाल से जूँ निकालती रहती हैं, पढ़ाएंगी क्या ख़ाक.

गाँव में प्रवेश करते ही एक मंदिर के चबूतरे पर आराम कर रहे बुज़ुर्गों में से एक जगदीश राय ने कहा, “यहाँ स्कूल की हालत या बच्चों की पढ़ाई-लिखाई सब ज़ीरो पाइंट पर है. आप प्रेस वाले बता रहे हैं कि बच्चों को स्कूल भेजना ही होगा, ऐसा क़ानून बन रहा है तो हम पूछते हैं कि कोई अभिभावक किसी मजबूरी में अपना बच्चा नहीं भेजेगा स्कूल तो सरकार क्या कर लेगी, फाँसी पर चढ़ा देगी? बड़ा आए हैं क़ानून बनाने वाले, पहले रोज़ी-रोटी का इंतज़ाम करेंगे सो नहीं. बड़ा क़ाबिल बने हैं मंत्री लोग.”

बदहाल गाँव का ये ग़ुस्सा देख-सुनकर जब मैं पटना लौटा तो राज्य के मानव संसाधन (शिक्षा) विभाग के प्रधान सचिव अंजनि कुमार सिंह से इस मसले पर मैंने बातें कीं.

वो कहने लगे, “देखिए, मूल समस्या जो है वो संसाधन की, पैसे की समस्या है. विधेयक पर चर्चा के लिए राज्य सरकार की तरफ से दिल्ली में मैंने कहा था कि बिल के प्रावधान तो बड़े अच्छे-अच्छे हैं, लेकिन उन्हें लागू करने में जो बोझ राज्य सरकार वहन ही नहीं पाएगी,उसे जबरन राज्य पर कैसे डाला जा सकता है. ठीक है, आने वाले ख़र्च का 75 प्रतिशत केंद्र दे और 25 प्रतिशत राज्य दे तो फिर ठीक है.”

लाखों बच्चे स्कूल नहीं जाते

Image caption एक ही कमरे में मध्यान्ह भोजन का भंडार घर और क्लासरुम....

शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव ने बताया कि आठ लाख बच्चे अभी भी बिहार में स्कूल नहीं जा पाते हैं, जबकि पिछले चार वर्षों में ये आंकड़ा 25 लाख से घटकर आठ लाख पर पहुँचा है. फिर उन्होंने ये बताया कि पंचायत स्तर पर दो लाख से ज़्यादा प्राइमरी और मिडिल स्कूल शिक्षकों की नियुक्ति की गई है, लेकिन ये सच्चाई उन्होंने छिपा ली कि जाली शैक्षणिक प्रमाणपत्रों को दिखाकर हज़ारों-हज़ारों अयोग्य और फ़र्ज़ी शिक्षक नियुक्त हुए हैं.

ऐसे में यहाँ लोगों का भरोसा टूटा है. सभी बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार दिलाने वाला क़ानून बिहार में ठीक से लागू हो सकेगा, इसपर थोड़ा नहीं, पूरा संदेह प्राय: सभी वर्गों में है.

अब जहाँ शैक्षणिक महकमे से जुड़ी हुई हर इकाई भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हुई हो, जहाँ राज्य सरकार की नाक के नीचे पटना के सैंकड़ों प्राइमरी स्कूल नारकीय हालात में पड़े हों, जहाँ शिक्षा व्यवस्था में सुधार के पहले से बने नियम-क़ानून बेअसर नज़र आने लगे हों, जहाँ मध्याह्न भोजन योजना से लेकर ‘आँगन बाड़ी’ या बाल पोषाहार योजना पूरी तरह से बेईमानों और भ्रष्टाचारियों के हाथों लुट रही हों. वहाँ केंद्रीय शिक्षा मंत्री कपिल सिब्बल का ड्रीम प्रोजेक्ट परिकल्पना से नीचे सरज़मीन पर उतर पाएगा?

वैसे गिनाने के लिए तो यहाँ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वंचित वर्ग के बच्चों तक शिक्षा पहुँचाने के लिए दर्जनों कार्यक्रम चलाने की घोषणा कर रखी है, लेकिन ऐसी तमाम घोषणाएं कुछ समय तक मीडिया में सुर्ख़ियाँ बटोर लेने के बाद पुरानी सरकारी चाल के मायाजाल में उलझ कर दम तोड़ने लग जाती है. इसलिए शिक्षा का अधिकार लगता है बिहार में चुनौती और चमत्कार वाला सवाल बनकर आ रहा है.

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