उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार की अनदेखी

मायावती
Image caption राज्य सरकार पर अपने ही लोक सेवकों पर लगे आरोपों की अनदेखी के आरोप लग रहा है

उत्तर प्रदेश के लोक आयुक्त, न्यायमूर्ति केएन मेहरोत्रा ने राज्यपाल बीएल जोशी से मिलकर शिकायत की है कि राज्य सरकार भ्रष्टाचार के दोषी पाए गए लोक सेवकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं कर रही है.

लोकायुक्त ने इस वर्ष जिन 10 लोगों के ख़िलाफ़ राज्यपाल को भ्रष्टाचार की विशेष रिपोर्ट दी है उनमें मायावती सरकार के बेसिक शिक्षा मंत्री धर्म सिंह सैनी भी शामिल हैं.

न्यायमूर्ति मेहरोत्रा ने बताया कि उन्होंने बेसिक शिक्षा मंत्री धर्म सिंह सैनी के खिलाफ़ कार्रवाई के लिए मुख्यमंत्री को लिखा था मगर कोई क़दम नहीं उठाए गए हैं.

उन्होंने कहा, ''मेरी संस्तुति यह थी कि मंत्री जी का आचरण एक भ्रष्ट बेसिक शिक्षा अधिकारी को बचाने में संदिग्ध है इसलिए माननीय मुख्यमंत्री इसमें मंत्री के खिलाफ़ कार्रवाई करें.''

धर्म सिंह सैनी के खिलाफ़ दो मामले थे जिनमें एक पर आंशिक कार्रवाई करते हुए मुख्यमंत्री की ओर से उन्हें चेतावनी भर दी गई है. लोकायुक्त को अपेक्षा थी कि मुख्यमंत्री ज़्यादा नहीं तो कम से कम सैनी का विभाग बदल देंगी.

लोकायुक्त ने यह सिफारिश भी की थी कि बेसिक शिक्षा अधिकारी के पद पर केवल लोक सेवा आयोग से चुने अफ़सरों को तैनात किया जाए, न कि टीचरों को, क्योंकि इसमें भी भ्रष्टाचार हो रहा है.

लोकायुक्त ने इस वर्ष जिन अन्य मामलों में सरकार द्वारा कार्रवाई न किए जाने की रिपोर्ट राज्यपाल को दी है, उनमें कुछ इंजीनियर, विधायक और समाज कल्याण, शिक्षा और अल्पसंख्यक कल्याण जैसे विभागों के अधिकारी शामिल हैं. विधायकों पर विधायक निधि के दुरुपयोग के आरोप हैं. इनमें बड़े पैमाने पर धन का गबन और दुरुपयोग हुआ.

आरोपों की अनदेखी

लोकायुक्त कार्यालय के अनुसार पिछले 10 वर्षों में भ्रष्टाचार के 91 मामलों में विशेष रिपोर्ट राज्यपाल को दी गई ताकि इन्हें विधानसभा में पेश किया जाए मगर इन 10 बरसों में किसी मुख्यमंत्री ने न तो कार्रवाई की और न ही नियमानुसार लोकायुक्त की रिपोर्ट विधानसभा में रखी.

लोकायुक्त न्यायमूर्ति मेहरोत्रा ने नए राज्यपाल जोशी से मिलकर उन्हें इस स्थिति से अवगत कराया है. मेहरोत्रा ने वर्तमान सरकार के दौरान ही लगभग 50 मामलों में विशेष रिपोर्ट गवर्नर को दी हैं जिन पर मायावती सरकार कार्रवाई करने से क़तरा रही है.

न्यायमूर्ति मेहरोत्रा कहते हैं कि सरकार दुनिया को दिखाने के लिए कहती है कि भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए एक स्वतंत्र लोक आयुक्त है लेकिन न तो उसकी रिपोर्ट पर अमल करती है, न ही उसे पर्याप्त कानूनी ताकत और संसाधन देती है.

लोकायुक्त ने सिफारिश की है कि ग्राम प्रधान और विश्वविद्यालयों को भी उनकी जांच के दायरे में लाया जाए लेकिन राज्य सरकार ने इस मांग पर भी ध्यान नहीं दिया है.

वो यह भी चाहते हैं कि सतर्कता विभाग को उनके अधीन कर दिया जाए ताकि शिकायतों की जांच के लिए पर्याप्त पुलिस स्टाफ़ मिल जाए मगर उत्तर प्रदेश सरकार सतर्कता विभाग को अपने ही नियंत्रण में रखना चाहती है.

लोकायुक्त मेहरोत्रा का कहना है कि मध्य प्रदेश और बंगलौर में लोक आयुक्त को बहुत अधिकार हैं इसलिए उन राज्यों में लोकायुक्त ज़्यादा प्रभावी हैं.कर्नाटक में तो लोक आयुक्त अखबार की ख़बर पर स्वयं भी जांच शुरू कर सकते हैं जबकि उत्तर प्रदेश में शपथ पत्र पर लिखित शिकायत के बाद ही लोक आयुक्त जांच शुरू कर सकते हैं.

लोकायुक्त के अनुसचिव अरविंद कुमार सिंघल का कहना है कि सीमित अधिकार और स्टाफ के बावजूद लोक आयुक्त प्रशासन ऐसे बहुत से लोगों को राहत और न्याय दिलवा देता है जिनमें अफ़सर लोगों को दौड़ाते रहते हैं. इनमें से अधिकतर मामले पेंशन एवं रिटायरमेंट के बाद अन्य देयों से संबन्धित होते हैं.

जेपी आंदोलन के बाद बनी जनता सरकार ने वर्ष 1977 में इस उद्देश्य से लोक आयुक्त की स्थापना की थी कि इससे भ्रष्टाचार और कुप्रशासन पर अंकुश लगेगा लेकिन मुख्यमंत्रियों ने लगातार लोक आयुक्त की उपेक्षा की.

अलग अलग राज्यों में लोक आयुक्तों के लिए अलग-अलग क़ानून हैं. न्यायमूर्ति मेहरोत्रा का कहना हैं कि लोक आयुक्त संस्था को कारगर बनाना है तो केंद्र को एक समान कानून बनाकर इस संस्था को अधिकार और साधन संपन्न करना होगा.

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