पानी की कमी और खेती के तरीक़े

सूखा
Image caption भारत में इस वर्ष ख़रीफ़ की फ़सल की बुआई 20 प्रतिशत कम हुई है.

भारत का लगभग एक चौथाई हिस्सा सूखे की चपेट में है, बारिश का नाम-ओ-निशान नहीं. फ़सल बुरी तरह से प्रभावित हो रही है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या मॉनसून पर बहुत अधिक निर्भरता का नहीं बल्कि खेती के ग़लत तौर-तरीक़ों और पानी के ग़ैर-ज़िम्मेदाराना इस्तेमाल की है.

विशेषज्ञों का दावा है कि जल संचयन और कम पानी में होने वाली फ़सलें लगाकर ऐसी स्थिति से बचा जा सकता है जिससे भारत आजकल जूझ रहा है. देश में ख़रीफ़ की फ़सल की बुआई 20 प्रतिशत कम हुई है.

अमरीकी अंतरिक्ष संगठन नासा के एक अध्ययन से भी यह बात सामने आई है कि भूजल के इस्तेमाल को न रोका गया तो भारत को पानी की ज़बर्दस्त कमी का सामना करना पड़ सकता है.

डॉक्टर सुधींद्र मिश्र कृषि के क्षेत्र में काम करने वाले एक ग़ैर-सरकारी संगठन से जुड़े हुए हैं. वो कहते हैं कि कई स्थान पर पानी चार सौ फ़ीट की गहराई पर पहुँच गया है.

उनका कहना है, "इसकी वजह यह है कि देश में सिंचाई की कुल ज़रूरत का आधा भूजल से पूरा किया जाता है जबकि ये ख़त्म होने वाला संसाधन है."

भारत में सिंचाई के दो बुनियादी तरीक़े हैं. पंजाब में भाखड़ा नांगल जैसे बड़े बाँध या फिर पारंपरिक तालाब.

प्राथमिकता

अनुपम मिश्र उन कृषि विशेषज्ञों में हैं जो बड़े प्रोजेक्ट के ख़िलाफ़ हैं. उनका नज़रिया है कि मॉनसून की बारिश पर निर्भरता से बचना मुमकिन नहीं है लेकिन ध्यान बड़े प्रोजेक्टों पर नहीं बल्कि गाँव-गाँव में मौजूद छोटे तालाबों पर होना चाहिए जो सूखते जा रहे हैं.

अनुपम कहते हैं, "देश में सबसे कम बारिश रेगिस्तानी इलाक़े जैसलमेर में होती है. इस साल वहाँ अब तक सिर्फ़ तीन सेंटीमीटर बारिश हुई है लेकिन फिर भी वहाँ तालाब लबालब भरे हुए हैं."

मिश्र कहते हैं, "इसके उलट अगर भरपूर बारिश हुई होती तो भाखड़ा जैसे बाँध की भी ज़रूरत नहीं होती. बड़े बाँध भी मॉनसून के सहारे हैं और भाखड़ा जैसे बाँध के बावजूद पंजाब की सिंचाई की आधी ज़रूरत भूजल से पूरी होती है."

सुधींद्र मिश्र के अनुसार उन फ़सलों की खेती कम होनी चाहिए, जिन्हें पानी की ज़्यादा ज़रूरत होती है.

उनका कहना है, "पिछले 30 साल में ऐसी फ़सलों की खेती अधिक हो रही है, जिन्हें पानी की अधिक आवश्यकता होती है. ये वो फ़सले हैं जिनकी बाज़ार में अधिक क़ीमत मिलती है... और जब मॉनसून की बारिश कम होती है तो परेशानियाँ बढ़नी शुरू होती हैं."

अनुपम मिश्र भी इस बात पर सहमति जताते हैं कि पंजाब में किसानों की बदलती हुई प्राथमिकताएँ इसकी मिसाल है.

अनुपम कहते हैं, "पहले पंजाब में धान की खेती नहीं होती थी क्योंकि वहाँ प्राकृतिक रूप से धान के लिए पानी नहीं था. धान के लिए बिहार, बंगाल और उड़ीसा जैसे इलाक़े थे, लेकिन इसके बावजूद किसानों ने धान की खेती की जिसका अब नुक़सान हो रहा है."

समस्या का हल

Image caption विशेषज्ञों के अनुसार कम पानी ख़र्च होने वाली फ़सलों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए

कृषि विशेषज्ञ पंडवरंग हेगड़े का संबंध कर्नाटक के धावड़ इलाक़े से है. वो कहते हैं कि पानी की कमी हो तो ज़मीन की नमी का मामला अधिक गंभीर हो जाता है, लेकिन सरकार की नीतियाँ ऐसी हैं कि वो रासायनिक खाद के इस्तेमाल को बढ़ावा देती है, जिससे नमी तेज़ी से ख़त्म हो जाती है. प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल नमी बचाने का अच्छा हथियार है इसके प्रयोग की तरफ़ लौटने की ज़रूरत है.

लेकिन वो भी मानते हैं कि फ़सल के चुनावों में पूरी तरह से बदलाव आसान नहीं है लेकिन इसके अलावा कोई रास्ता भी नहीं है.

सुधींद्र शर्मा कहते हैं कि फ़सल के चुनाव से पानी की ज़रूरत कम हो सकती है.

उनके अनुसार, "हमें कम पानी वाली फ़सलों को लाना होगा. और यह उस समय तक नहीं हो सकता जब तक सरकार ध्यान नहीं देती. किसान चने और बासमती की खेती से तब ही हटेंगे जब सरकार किसानों के नुक़सान की भरपाई करेगी."

लेकिन सरकार ने बारिश के पानी पर निर्भरता कम करने के लिए क्या किया है, सिंचाई विभाग के पूर्व सचिव रामाकृष्मा अय्यर कहते हैं कि वर्ष 2002 में उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने देश की नदियों को जोड़ने के लिए एक काफ़ी बड़े प्रोजेक्ट की घोषणा की थी. जिसका ख़र्च भारत के कुल बजट के आधे के बराबर है. लेकिन उनका कहना ये प्रोजेक्ट सही नहीं.

दूसरी ओर पूर्व कृषि मंत्री वाईके अलग कहते हैं कि छोटे और बड़े प्रोजेक्टों की बहस फ़जूल है.

उनका कहना है, "ज़रूरत दोनों की है. बड़े प्रोजेक्ट सिंचाई और खेती की के पानी की ज़रूरत पूरी करने में अहम भूमिका अदा करते हैं. साथ ही पारंपरिक संसाधनों को दोबारा सक्रिय करने की आवश्यकता है और सरकार इस ओर काम कर रही है."

छोटे और बड़े प्रोजेक्टों पर बहस पुरानी है, और पुराना है मॉनसून की बारिश पर किसानों की निर्भरता, लेकिन समस्या का हल बड़े बाँधों और छोटे तालाबों के बीच में कहीं है. और विशेषज्ञों के अनुसार जिधर से भी शुरू करें, फ़िलहाल रास्ता लंबा है.

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