का बरखा जब कृषि सुखाने!

सूखा
Image caption सूखे की वजह से बिहार में फ़सलों को लेकर काफ़ी चिंता बनी हुई है

बिहार में अगस्त के दूसरे हफ़्ते में कुछ मज़बूत हुआ सा दिखने वाला मॉनसून फिर ऐसे कमज़ोर पड़ गया, मानो जमकर बरसना ही भूल गया हो. इसलिए यहाँ के किसान क्षोभ के मारे कहने लगे हैं कि अब जले पर नमक छिड़कने जैसी फुहार लेकर क्या होगा, जितना नुकसान होना था, हो चुका.

उत्तर बिहार के कुछ ज़िलों में इस बार मॉनसून की झमाझम शुरुआत हुई थी. तब लगा था जैसे यह शुभ लक्षण है. पूरे राज्य में वैसी ही बरसात दो महीने तक होने की उम्मीद जगी थी.

लेकिन उस उम्मीद पर सूखे की आग पड़ गई (...पानी फिर जाने वाला मुहावरा यहाँ नहीं चलेगा!!!).

धूप से तपते खेतों या झुलसते धान के पौधों को जब मूसलधार बारिश की ज़रुरत थी, तब बादलों ने पानी का थोड़ा-थोड़ा छिड़काव कर दिया. ज़ाहिर है, ओस चाटे प्यास नहीं बुझती.

बिहार में इस बार सामान्य से काफ़ी कम वर्षा होने के कारण धान की फ़सल का तो भारी नुक़सान हुआ ही है, पशुचारे के अभाव और आने वाले भू-जल संकट ने चिंता और बढ़ा दी है.

राज्य सरकार कहती है कि इस प्रदेश के कुल 38 जिलों में से 26 ज़िलों के लगभग सवा करोड़ परिवारों पर सुखाड़ की प्राकृतिक विपदा आई हुई है.

इस मौसम की दो मुख्य फ़सलें- धान और मक्के की बुआई में 50 से 60 प्रतिशत की जो कमी दर्ज की गई है, उसका मतलब है अकाल जैसे हालात पैदा होने की आशंका. आगामी रबी की फ़सल यानी तेलहन, दलहन और गेहूँ की खेती पर भी इस अल्प-वर्षा का बुरा प्रभाव हो सकता है क्योंकि खेतों में ज़रुरत के लायक नमी नहीं रहेगी.

वैसे राज्य सरकार के एक कृषि विशेषज्ञ अनिल झा ने किसानों को यह ख़ास सलाह दी है कि मौजूदा सूखे के कारण खाली पड़े खेतों में रबी फ़सल की अग्रिम क़िस्म वाले बीज बोने का यह अच्छा मौका है.

उनका कहना है- “इस समय जो कुछ-कुछ सूखा और थोड़ा नम मिट्टी वाला खेत है, उसको रबी की फ़सल के बिल्कुल उपयुक्त बनाने में बड़ी आसानी होगी. इसलिए सरकार भी किसानों के लिए खाद ,बीज और पटवन की रियायती व्यवस्था ख़ास-तौर पर रबी की फ़सल को बचाने के लिए कर रही है."

केंद्र और राज्य की खींचतान

उधर नीतीश सरकार ने राज्य को सूखा संकट से उबारने के लिए केंद्र सरकार से तेईस हज़ार करोड़ रुपए की आपात सहायता माँगी है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दिल्ली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलकर उन्हें जो ज्ञापन सौंपा है, उसमें कृषि मद में 1005 करोड़, राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी स्कीम के तहत 10885 करोड़, राशन बाँटने के लिए 10254 करोड़ और पेयजल व्यवस्था मद में 300 करोड़ रुपए की माँग की गई है.

सूखे के संकट से निबटने में राज्य सरकार को कितनी केन्द्रीय मदद दी जाए, इसका आकलन करने यहाँ केंद्र सरकार के अधिकरियों का एक दल आ रहा है.

दरअसल सूखा और बाढ़ से हुई तबाही में केंद्र से विशेष मदद को लेकर खींचतान का राजनीतिक रंग साफ़ नज़र आने लगा है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुलकर बोल रहे हैं कि बिहार को विपदा की घड़ी में भी केंद्र से सहायता का वाजिब हक़ तक नहीं मिलना सरासर अन्याय है. उधर केंद्र के सत्ताधारियों का कहना है कि बिहार सरकार अपनी विफलताओं पर से लोगों का ध्यान हटाने के लिए बात-बात पर केंद्र के असहयोग का झूठा शोर मचा रही है.

कोसी नदी ने गत वर्ष तटबंध तोड़ कर उत्तर-पूर्वी बिहार में जो कहर बरपाया था, उससे विस्थापित या पीड़ित हुए लाखों लोगों के पुनर्वास का सरकारी आश्वासन अभी तक इसी राजनीतिक खींचतान में फँसा हुआ है.

केंद्र और राज्य में अलग-अलग दलीय गठबंधन का सत्ता में होना इस विवादपूर्ण स्थिति का मूल कारण है.

लगता यही है कि बिहार के सूखा पीड़ित किसानों को अभी कई तरह के आघात सहने होंगे. दो महीने की देर से ही सही, मानसून के पूरी तरह सक्रिय होने की जो संभावना बताई जा रही है, इस पर किसान कहते हैं - "का बरखा जब कृषि सुखाने!!"

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