क्या कहते हैं दिल्ली में बसे अफ़ग़ान

अफ़ग़ानिस्तान
Image caption दिल्ली में बसे अफ़ग़ान नागरिकों की निगाहें भी वतन में हो रहे चुनाव पर टिकी हैं

भारत का अफ़ग़ानिस्तान से सदियों पुराना रिश्ता रहा है. इतिहास पर नज़र डालें तो कभी भारत का कुछ हिस्सा अफ़ग़ानिस्तान में रहा है तो फिर अफ़ग़ानिस्तान के भी कई हिस्सों पर भारतीय शासकों का राज रहा है. जब अफ़ग़ानिस्तान में हिंसा का एक दौर शुरु हुआ तब भारत में शरण लेने आने वाले अफ़ग़ान लोगों की संख्या बढ़ने लगी और एक अंदाज़े के मुताबिक केवल दिल्ली में ही लगभग दस से पंद्रह हज़ार अफ़ग़ान नागरिक हैं.

अफ़ग़ानिस्तान में हो रहे राष्ट्रपति पद के चुनावों में दिल्ली में रहने वाले अफ़ग़ान भी ख़ासी दिलचस्पी ले रहे हैं. लेकिन क्या हैं इनकी उम्मीदें इस चुनाव से....यही जानने का हमने प्रयास किया...

दिल्ली के दरियागंज इलाक़े मे स्थित रॉयल अफ़गान होटल में काम करने वाले 22 वर्षीय सैयद दाऊद हाशमी कहते हैं कि उन्हें एक अच्छा और ईमानदार राष्ट्रपति चाहिए जो तीस साल से जारी लड़ाई को ख़त्म कर सके.

'जीत से मतलब नहीं'

दाऊद का कहना है, "हमारे लिए ये अहम नहीं कि किसकी जीत होती है. असल बात ये है कि नए राष्ट्रपति अफ़ग़ान लोगों की समस्याएँ किस हद तक सुलझा सकते हैं...हम जैसे अफ़ग़ान इसलिए यहां आते हैं क्योंकि वहां हालात बहुत ख़राब हैं....चाहे मेरा देश बहुत विकसित नहीं, फिर भी अपना देश तो अपना ही होता है और अगर हम मजबूर न होते इधर न आते..."

अस्सी के दशक में अफ़गानिस्तान की फ़ुटबाल टीम के सदस्य रहे सुलेमान हाशमी कुछ ही दिन दिन पहले काबुल से दिल्ली आए. ऊर्दू या हिंदी मे अच्छी तरह बात ना कर पाने के लिए माफ़ी मांगते हुए वे बोले – "हम एक ईमानदार राष्ट्रपति चाहते हैं." चार बच्चों के पिता सुलेमान कहते हैं, "अफ़ग़ानिस्तान में तो ज़िंदगी हर वक़्त बम और रॉकेट के साए में गुज़रती है. ना जाने कब किधर से कोई गोली आए और ज़िंदगी की शाम हो जाए."

ग़ुलाम क़ादिर ख़ानज़ाइ 55 वर्ष के हैं और कुछ ही दिन पहले भारत आए हैं. पूर्व विदेश मंत्री और मौजूदा चुनाव में राष्ट्रपति पद के दावेदार अब्दुल्ला अब्दुल्ला के सहपाठी रह चुके ग़ुलाम क़ादिर कहते हैं, "हिंसा का दौर बरसों से जारी है लेकिन मौजूदा राष्ट्रपति हामिद करज़ई से काफ़ी उम्मीदें हैं. यकीन है कि अगर करज़ई दोबारा जीतते हैं तो हालात कुछ बेहतर होंगे."

'ख़तरा ही ख़तरा है'

उधर एक और अफ़गान नागरिक ग़ुलाम रज़ा कहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान मे हालात ऐसे हैं कि सुबह काम पर जाएँ तो पता नहीं होता कि शाम में जब लौटेंगे तो घर सुरक्षित रहेगा कि नहीं, बीवी बच्चे ज़िंदा होंगे या नहीं....

पच्चीस वर्षीय महदी कहते हैं, "अफ़गानिस्तान में आम आदमी का जीना दूभर हो गया है. एक तरफ़ विदेशी सेना के बम और मिसाईल का ख़तरा है तो दूसरी तरफ़ चरमपंथियों के आत्मघाती हमले का डर..."

दिल्ली मे रह रहे इन अफ़ग़ान लोगों से बात करने के बाद तो यही कहा जा सकता है कि इनकी निगाहें अफ़ग़ानिस्तान में हो रहे राष्ट्रपति चुनाव पर टिकी हुई हैं. ये लोग किसी विशेष उम्मीदवार के समर्थन या विरोध में तो नज़र नहीं आते लेकिन सभी ये चाहते हैं कि उनके मुल्क में जल्द से जल्द शांति बहाल हो ताकि वे वतन लौट सकें.

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