चिंतन बैठक से पहले चिंतित भाजपा

भाजपा नेता
Image caption भाजपा अब तक वरिष्ठ नेताओं के सहारे ही चलती रही है

भारतीय जनता पार्टी की शिमला में शुरु हो रही चिंतन बैठक से पहले उभरे मुद्दों ने पार्टी की चिंता को बढ़ा दिया है.

पार्टी ने कहा था कि वह लोकसभा चुनावों में पार्टी की हार को पीछे छोड़कर आगे की रणनीति तय करना चाहती है.

लेकिन अब जिन मुद्दों पर बातचीत होगी उनमें जसवंत सिंह की किताब में मोहम्मद अली जिन्ना को सेक्युलर बताने पर हुआ विवाद, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का युवाओं को महत्व देने का सुझाव और राजस्थान में पार्टी के भीतर की कलह प्रमुख है.

अब लग रहा है कि अब पार्टी अपने पूर्व निर्धारित एजेंडे को छोड़कर तीन दिन इन्हीं चिंताओं से जूझती रहेगी.

बीबीसी के भारत संपादक संजीव श्रीवास्तव का कहना है कि चर्चा तो इस पर होनी है थी कि पार्टी नए सिरे से किस तरह संगठित हो, जिन राज्यों में पार्टी बिखर रही है वहाँ उसे किस तरह से फिर खड़ा किया जाए लेकिन अब चर्चा इस बात पर आ जाएगी कि जसवंत सिंह, लालकृष्ण आडवाणी और राजनाथ सिंह का क्या किया जाए.

जिन्ना का ज़िक्र

वैसे तो पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने जसवंत सिंह की किताब से पल्ला झाड़कर इस विवाद को ख़त्म करने की कोशिश की है. लेकिन जसवंत सिंह पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और उनकी किताब की चर्चा जिस तरह से हुई है उससे लगता नहीं कि पार्टी के भीतर इस पर चर्चा को टाला जा सकेगा.

एक ओर भाजपा की मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और उसकी सहयोगी पार्टी शिवसेना ने जिन्ना के महिमामंडन पर नाराज़गी जताई है क्योंकि यह उनकी अब तक की राजनीति को रास आने वाली बात नहीं है.

दूसरी ओर भाजपा को सफ़ाई देनी पड़ रही है कि वह सरदार वल्लभ भाई पटेल को विभाजन के लिए ज़िम्मेदार नहीं मानती, जैसा कि जसवंत सिंह ने अपनी किताब में लिखा है.

इससे पहले लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी किताब में जिन्ना को सेक्युलर बताया था और उसके बाद से वे पार्टी में कभी नहीं उबर पाए.

संघ की राय

जसवंत सिंह की किताब का विवाद अभी चल ही रहा था कि एक टेलीविज़न चैनल पर आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत का इंटरव्यू प्रसारित हो गया.

इसमें उन्होंने एक बार फिर इस बात पर ज़ोर दिया है कि भाजपा को युवा नेतृत्व को बागडोर सौंपने के बारे में विचार करना होगा.

संघ वर्ष 2003 से कहता रहा है कि भाजपा में पार्टी नेतृत्व में परिवर्तन होना चाहिए.

उनका कहना था कि भाजपा में नेतृत्व संभालने योग्य नेताओं की कमी नहीं है.

इसी साक्षात्कार में उन्होंने इस बात से इनकार किया है कि लोकसभा में नेता के पद से इस्तीफ़ा देने और न देने को लेकर संघ ने कोई राय दी थी. उनका कहना है कि ये दोनों ही फ़ैसले उनके अपने थे.

उनकी इस बात को भी इससे जोड़कर देखा जा रहा है कि अब संघ लालकृष्ण आडवाणी को पार्टी के लिए अपरिहार्य नहीं मानता.

नई पीढ़ी के नेताओं के नाम पर आमतौर पर चार नेताओं के नाम आते रहे हैं, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू और नरेंद्र मोदी. लेकिन मोहन भागवत ने कहा है कि भाजपा को 'इन चार नामों से आगे' भी विचार करना चाहिए.

ज़ाहिर है कि चिंतन बैठक में अब विचार का एक मुद्दा यह भी होगा.

राजस्थान की कलह

पूर्व मुख्यमंत्री और इस समय विधानसभा में विधायक दल की नेता वसुंधरा राजे सिंधिया और पार्टी नेतृत्व में खींचतान पहले से ही चल रही थी.

पार्टी नेतृत्व ने उन्हें पद छोड़ने को कहा था लेकिन उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया था. बाद में रविवार को हुई संसदीय दल की बैठक में इस पर सहमति की ख़बरें आई थीं.

लेकिन मंगलवार को जब वसुंधरा राजे के दो समर्थक विधायकों को अनुशासनहीनता के आरोप में पार्टी से निलंबित किया गया तो पार्टी की यह कलह आम जनता के बीच आ गई.

बीबीसी के जयपुर संवाददाता नारायण बारेठ के अनुसार इन विधायकों के समर्थक चार वाहनों में पार्टी मुख्यालय पहुँचे और उन्होंने पार्टी मुख्यालय में तोड़फोड़ की.

उनका कहना है, "यह सत्ता की नहीं विपक्ष की कुर्सी की लड़ाई है."

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