नवाबी ख़ानदानों को सौ रुपए का भत्ता

मोहम्मद रफ़ीक़
Image caption मोहम्मद रफ़ीक़ के अनुसार ये मुद्दा इज़्ज़त से जुड़ा हुआ था

राजस्थान में मुसलमान रियासत रहे टोंक के पूर्व नवाबों के वारिसों के लिए भत्ते की रकम छोटी हो या बड़ी इसका कोई मोल नहीं है.

लेकिन इन वारिसों ने इस रक़म में बढ़ोत्तरी के लिए लंबी क़ानूनी लड़ाई लड़ी और अब इन नवाबी ख़ानदान के 570 वारिसों में से किसी को भी हर माह सौ रुपए से कम का भत्ता नहीं मिलेगा.

टोंक की 'अंजुमन सोसाइटी ख़ानदान ए अमीरिया' के पूर्व सचिव अस्मत अली खान कहते हैं, "ये राशि छोटी हो सकती है,मगर इसमें समाहित सम्मान बहुत बड़ा है."

क़ानूनी जंग का फ़ैसला 13 साल बाद इन ख़ानदानों के हक़ में आया तो इन्हें बीते 20 साल का बकाया भी मिलेगा.

टोंक के ज़िला प्रशासन ने हिसाब लगाकर बताया की ये राशि कोई एक करोड़ सोलह लाख और नब्बे हज़ार तक जा पहुँची है.

टोंक के ज़िला मजिस्ट्रेट सुबीर कुमार कहते हैं, ''चूँकि इन लोगो के पक्ष में अदालत का फ़ैसला हो चुका है लिहाजा हमने राज्य सरकार से ये राशि भुगतान के लिए माँगी है."

अंजुमन के मुताबिक ख़ानदानी भत्ते की ये राशि ब्रिटिश राज के दौरान 1944 में शुरू हुई थी और ये उन रियासतों में शुरू की गई थी जिनके हुक्मरानों के शासन चलाने के अधिकार अंग्रेज़ों ने छीन लिए थे तब से ये भत्ता मिलता आ रहा है.

राज्य के वित्त विभाग ने 1979 में भत्ते की राशि दो रुपए से बढ़ाकर 40 रुपए कर दी. लेकिन 1987 में राज्य सरकार ने इसे फिर घटा दिया.

ये अंजुमन को बुरा लगा और वे इसके विरुद्ध उच्च न्यायालय में चले गए. अदालत ने 2006 में भत्ते की ये राशि बढ़ा कर कम से कम सौ रुपए कर दी.

'गुज़रे ज़माने का गौरव'

लेकिन सरकार को ये गँवारा नहीं हुआ और सरकार ने इसे उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी न्यायालय ने सरकार की अपील को ख़ारिज कर दिया.

Image caption अस्मत अली ने इस मामले में क़ानूनी लड़ाई लड़ी

इस पूरे मामले में क़ानूनी लडाई लड़ने वाले अंजुमन के पूर्व सचिव अस्मत अली ख़ान कहते हैं, "इस छोटी सी रक़म में इतिहास की यादें समाई हैं. मुट्ठी में जब भत्ते की ये राशि आती है तो लगता है गोया गुज़रे ज़माने का गौरव सजीव हो उठा है."

वैसे अस्मत अली ख़ान को अब तक महज 13 रुपए 64 पैसे ही हर माह मिलते थे. वह कहते हैं, ''ये बढ़ी हुई रकम हमें ईद के त्यौहार से पहले मिलने का मौक़ा मिला है इसलिए हमारी ख़ुशियाँ दोगुनी हो गई हैं."

इन्हीं वारिसों में से एक मोहम्मद रफ़ीक़ कहते हैं, "यूँ तो हम नवाबी ख़ानदान के वारिस हैं. लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं."

उनके लिए बक़ाया रक़म मिलना एक बड़ा सहारा होगा. वह कहते हैं, ''ये एक इज़्ज़त से जुड़ा मुद्दा है. ये हमें ख़ानदानी आन-बान-शान की याद दिलाता है."

राजस्थान में आज़ादी से पहले रियासतें तो बहुत थीं मगर टोंक राजस्थान में अकेली मुस्लिम रियासत थी.

टोंक 1817 से 1947 तक अपनी रियासत की राजधानी रहा है. इसे 1817 में एक मुसलमान शासक ने स्थापित किया था. अब इन पूर्व नवाबी ख़ानदान के वारिसों को जब ये राशि मिलती है तो वे इसके आईने में अपने अतीत की झलक देखते हैं.

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