लॉर्ड देसाई से एक मुलाक़ात

मेघनाद देसाई
Image caption लॉर्ड मेघनाद देसाई का कहना है कि प्यार का इंजेक्शन लेने के लिए अक्सर वो भारत आते हैं

बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

बीबीसी 'एक मुलाक़ात' में इस बार ख़ास मेहमान हैं लॉर्ड मेघनाद देसाई.

आप भारत के सबसे चर्चित एनआरआई में से एक हैं. आपके बाल भी बहुत स्टाइलिश हैं. चर्चा होती है तो कैसा लगता है?

बहुत अच्छा लगता है. जब हम यहाँ आते हैं तो लोग हमें लॉर्ड कहते हैं तो बहुत अच्छा लगता है. वहाँ हम आम नागरिक हैं. लेकिन यहाँ खूब प्यार मिलता है, इसलिए प्यार का इंजेक्शन लेने के लिए यहाँ आते रहते हैं.

आपकी पैदाइश और पढ़ाई-लिखाई भारत की है. अपने बचपन के बारे में कुछ बताएँ?

मैं 1940 में बड़ौदा में पैदा हुआ. उस समय वहाँ के राजा गायकवाड़ थे. महाराजा गायकवाड़ ने कई सुधार किए थे. हमारी स्कूल की बिल्डिंग बहुत अच्छी थी. मैंने उसके बाद कई सारे कॉलेजों की बिल्डिंगें देखी, लेकिन कोई उस जैसी खूबसूरत नहीं थी. जब मैं सात साल का था तो फिर सैकेंडरी स्कूल में गया.

जब मैं 10 साल का हुआ तो मेरे पिता का ट्रांसफर बॉम्बे हो गया. बॉम्बे कॉस्मोपोलिटन शहर है और उसका लाभ हमें मिला. इसके अलावा वहाँ बहुत सारी लाइब्रेरियाँ थीं. मेरा स्कूल और कॉलेज सुबह का था. सारी दोपहर खाली रहता था. इसलिए लाइब्रेरियों में जाकर खूब पढ़ता था. फिर मैंने बीए, एमए किया. मैं आईएएस करना चाहता था, लेकिन सौभाग्य से आईएएस का फ़ॉर्म भरने से पहले ही मुझे स्कॉलरशिप मिल गई और मैं विदेश चला गया.

बड़ौदा की बात आपने की. बड़ौदा खुले मिज़ाज के शहरों में से है. आप क्या कहते हैं?

हाँ बिल्कुल. खुले मिज़ाज वाले शहरों में से था. बचपन मेरा वहाँ बीता. बहुत चौड़ी सड़कें, स्कूल, कॉलेज थे. कुल मिलाकर बड़ौदा बहुत अच्छा स्टेट था.

कॉस्मोपॉलिटन शहर बंबई की कुछ ख़ास यादें?

मुझे दिल्ली से पता चला कि वहाँ किसी को मद्रासी नहीं कहते. वहाँ जाकर पता चला कि दक्षिण भारतीय सिर्फ़ मद्रासी नहीं होते, बल्कि तमिल, कन्नड़ आदि होते हैं. वहाँ पारसी, ईसाई सभी लोग थे.

और आप जिस स्कॉलरशिप की बात कर रहे थे, वो आपको किस चीज़ के लिए मिली थी?

यूनीवर्सिटी ऑफ़ पेनसिलवेनिया में मुझे पीएचडी करने का मौका मिला. मैंने प्राइमरी सिर्फ़ एक साल किया. मैं जब दो साल का ही था, तब से ही घर में मेरी पढ़ाई शुरू हो गई थी. 14 साल में ही मैंने स्कूल पूरा कर लिया था. 18 साल में बीए, 20 साल में एमए कर लिया था और फिर 21 साल में विदेश चला गया. चार साल की स्कॉलरशिप मिली इस तरह 25 साल में पढ़ाई पूरी कर ली.

Image caption मेघनाद देसाई मुंबई के कॉस्मोपॉलिटन कल्चर से बहुत प्रभावित हैं

पीएचडी का क्या विषय था आपका?

बहुत उबाऊ विषय था. वर्ल्ड टिन इकोनॉमी में. किस तरह कीमतों में स्थिरता आनी चाहिए. इस विषय पर उस जमाने की ये पहली पीएचडी थी. बाद में मेरे सुपरवाइज़र लॉरेंस क्लाइव को नोबेल पुरस्कार भी मिला. हालाँकि ये पुरस्कार उन्हें मेरी वजह से नहीं मिला.

तो आप 1961 से लगातार भारत से बाहर ही रह रहे हैं. कैसा लगता है?

मैं तो सबसे कहता हूँ कि मेरी पैदाइश भले ही भारत में हुई है, लेकिन मैं तो परदेसी बन गया हूँ. मैं एनआरआई नहीं हूँ, बल्कि भारतीय मूल का ब्रितानी नागरिक हूँ. क्योंकि वहाँ रहते-रहते बहुत सी चीज़ें आसान हुई हैं. मैं अपने सांसद को पहचानता हूँ, लेकिन कभी उनके पास सिफ़ारिश लेकर नहीं गया. वहाँ अपने हक़ों के लिए राजनेताओं के पास जाने की ज़रूरत नहीं है. यहाँ तक कि यूनीवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान भी मुझे कभी नस्लभेद का सामना नहीं करना पड़ा.

जब पहली बार देश से बाहर निकले तो क्या कुछ घबराए हुए थे ?

नहीं, ऐसा नहीं है. मैं वहाँ जाने के लिए बेताब था. मैंने बंबई में कई प्रगतिशील किताबें पढ़ी थी. अमेरिकी और ब्रितानी लेखकों को पढ़ा था. मुझे घर की याद भी बहुत नहीं सताती थी. वहाँ जाकर लगा कि क्या पता घर जा सकूँगा कि नहीं, लेकिन मैंने तय किया जब तक यहाँ रहूँगा अपने घर की तरह रहूँगा.

उस समय जो लोग विदेश गए, उन्हें बड़ा उद्यमी समझा गया. ये माना गया कि वे देश के लिए नई सीमाएँ खोल रहे हैं. आपको क्या लगता है?

बात ये है कि उस समय कुछ करने के बहुत ज़्यादा मौके नहीं थे. हमारे पास इंग्लैंड जाने के पैसे नहीं थे. तो हमने अमरीका जाने का फ़ैसला किया. क्योंकि ब्रिटेन में फैलोशिप नहीं थी और अमरीका में थी. तो पता लगाया कि कौन सी यूनिवर्सिटी फैलोशिप देती है. उस जमाने में टेलीफ़ोन करना बहुत कठिन था. अगर आप किसी मुसीबत में फंस गए तो उससे खुद ही निपटना होता था. तो आत्मनिर्भरता से बहुत आत्मविश्वास बढ़ा.

आपने कहा कि आपको होम सिकनेस नहीं होती थी, लेकिन भारत की किस चीज़ की कमी आपको सबसे ज्यादा खलती थी?

बहुत सारी चीज़ों की कमी खलती थी. सिनेमा की कमी खलती थी, भारतीय संस्कृति की कमी खलती थी. वहाँ की भाषा और संस्कृति सीखनी पड़ी. अगर मैं भारत में रहता तो बहुत कुछ सीखता और बहुत मजा आता. मसलन मुझे शास्त्रीय संगीत का बहुत शौक था, लेकिन मुझे अफ़सोस है कि मैं शास्त्रीय संगीत के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं सीख पाया.

और हिंदुस्तानी लड़कियों की कितनी कमी खली?

बेशक, हिंदुस्तानी लड़कियों की भी कमी खली. हम तो हिंदुस्तानी सिनेमा के गानों के माध्यम से रोमांस से रूबरू हुए थे, लेकिन अमरीका में तो ये सब नहीं था.

आपने कहा कि ब्रिटेन में रहते हुए आपको किसी नेता के पास नहीं जाना पड़ता. वहाँ व्यक्ति को उसके अधिकार मिलते हैं. ये अच्छी बात है, लेकिन कुछ नुक़सान भी होंगे, वे क्या हैं?

बहुत से एसे लोग हैं जिनका परदेसीपन नहीं जाता है. बहुत से लोग हैं जो आज भी मानते हैं कि उन्हें लौटकर घर जाना है. उन्हें ये लगता है कि वे परदेसी हैं, वहाँ रहने वाले हमारे लोग नहीं हैं. वे दुश्मन तो नहीं, लेकिन दोस्त भी नहीं हैं.

सभी पंजाबी साथ रहते हैं, गुजराती साथ रहते हैं. इसीलिए मैं साउथहॉल नहीं जाता. मेरी नज़र में साउथहॉल एकांत होने की निशानी है. वे वहाँ जाकर भी घर जैसा महसूस नहीं करते, इसीलिए वहाँ रहते हैं. देखिए, हर देश की एक ख़ासियत होती है. हर समुदाय में अपने-पराए का भाव होता है. ये भावना कभी नहीं जाती.

चलिए, बात आपके विषय की करते हैं. आप अर्थशास्त्र पढ़ाते रहे हैं. उसका कौन सा क्षेत्र आपको सबसे दिलचस्प लगता है?

मुझे मैक्रो इकोनॉमिक्स पसंद है. जो मौजूदा संकट है, इसके चलते अर्थनीति में क्या उतार-चढ़ाव आए हैं और इस संकट से कैसे निपटा जाए, ये मुझे पसंद है.अगर आप ये सोचें कि आपकी अर्थव्यवस्था हमेशा स्थिर रहेगी तो आप गलत हैं. इसमें उतार-चढ़ाव तो आते ही रहेंगे. मार्क्स का दृष्टिकोण मुझे बहुत पसंद आया.

Image caption लॉर्ड मेघनाद देसाई को नई अभिनेत्रियों में प्रीति ज़िंटा का अभिनय बहुत पसंद है

और भारत के बारे में आपकी क्या सोच है. क्या सच में हम सुपर पावर बनेंगे या ये मुंगेरी लाल के हसीन सपने ही साबित होंगे?

हम ज़रूर सुपर पावर बनेंगे. मेरी राय में आज़ादी के बाद 40 साल तक हमारी अर्थनीति अच्छी नहीं रही. हमने अपनी ताक़त की अनदेखी की. हम सोवियत संघ जैसे देशों के अर्थ मॉडल पर चले. हाँ, हमारे पास अणुबम है, चंद्रयान अभियान है. लेकिन आज भी कई गाँव में सड़क नहीं है. राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए हमने बहुत कुछ कर लिया. अब हमें आर्थिक प्रगति के लिए कदम उठाने हैं. 1991 के बाद से जो कदम उठाए गए हैं, उससे अर्थव्यवस्था में सुधार होगा.

भारत की शैक्षिक व्यवस्था पर आपका क्या कहना है?

हमने प्राइमरी, सैकेंडरी शिक्षा की बहुत बेकद्री की है. इतने सालों में हमने ये नहीं सोचा कि प्राइमरी शिक्षा पर ध्यान दें. सौ फ़ीसदी साक्षरता का लक्ष्य हासिल करना चाहिए. आईआईटी, आईआईएम पर ज़ोर है यानी नज़र शिखर पर है जड़ों पर नहीं. हम इंग्लिश मॉडल का अनुसरण कर रहे हैं. भारत में बहुत सारे कॉलेज होने चाहिए. अलग-अलग विषयों की पढ़ाई होनी चाहिए. परीक्षा महत्वपूर्ण नहीं है. शिक्षा का उद्देश्य ये होना चाहिए कि व्यक्ति में जो ख़ासियत है उसे बाहर निकालें. ये नहीं होना चाहिए कि 100 विद्यार्थियों में कौन सबसे आगे आता है. होना ये चाहिए कि 100वें विद्यार्थी को भी कुछ सीखने को मिले, इस पर ध्यान देने की ज़रूरत है.

माना जाता है कि क्योंकि भारतीय छात्रों की शुरू से ही रटने और ज़्यादा मेहनत करने की क्षमता होती है, इसलिए वे विदेश में सफल हैं. लेकिन ज़्यादा सोचने-समझने की स्वतंत्रता विदेशी व्यवस्था में अधिक है. आपका क्या मानना है?

हाँ, लेकिन जो विदेश में अच्छा करते हैं, वे बेहतरीन होते हैं. अपने बारे में बताना चाहूँगा कि मैं हिंदुस्तान में कभी पहले स्थान पर नहीं आया. विदेशी व्यवस्था मुझे बहुत अच्छी लगी. उन्होंने मेरी प्रतिभा को पहचाना और उसे बाहर निकाला. ब्रिटेन में स्कूलों में कभी परीक्षा नहीं होती. 16 साल तक कोई भी छात्र परीक्षा नहीं देता. उसका कोई नुक़सान नहीं होता. कौन आगे कौन पीछे, इस दौड़ को रहने दो.अगर कोई एमबीए करने के लिए हॉर्वर्ड जा रहा है तो वहाँ ग्रेड का कोई मतलब नहीं है. ग्रेडिंग है भी तो इतनी गुप्त है कि कोई भी उसे नहीं जान सकता.

चलिए, दूसरे विषय पर चलते हैं. पढ़ाई-लिखाई के अलावा और क्या शौक हैं?

फ़िल्में देखने का शौक है. गाना गाने का शौक है. हर रोज़ जब उठता हूँ तो कोई न कोई धुन दिमाग में रहती है, लेकिन 1950 के दशक के, परदेस जाने से पहले के गाने.

हालाँकि मैं इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखता कि पुराने गाने ही अच्छे होते थे और नए गाने अच्छे नहीं होते?

मेरी राय में सिनेमा एक युवा माध्यम है. जो गाने आप युवावस्था में सुनते हैं, वैसा असर 60 साल की उम्र में नहीं होता. आप अगर सर्वे करें और लोगों से पूछें कि उनकी पसंदीदा अभिनेत्री कौन है तो वे उसे बताएँगे जो युवा अवस्था में उनकी पसंदीदा थी.

आपका पहला-पहला प्यार यानी आपकी पसंदीदा अभिनेत्री कौन थी?

हेलेन.

आपकी पसंदीदा फ़िल्में कौन सी हैं?

अंदाज़, प्यासा, देवदास, मुग़ले आज़म, मिस्टर-मिसेज 55, चलती का नाम गाड़ी मुझे बहुत पसंद है.

चलिए मधुबाला की बात करते हैं. उनमें आपको ख़ास क्या पसंद था?

उनका पूरा चेहरा. वो बहुत अच्छी हास्य कलाकार थीं. काला पानी में उनका गाना, ‘अच्छा जी मैं हारी, चलो मान जाओ ना’ में उनका अभिनय देखते ही बनता है.

Image caption लॉर्ड देसाई को दिलीप कुमार का अभिनय बहुत पसंद है

और देव आनंद के बारे में क्या कहेंगे?

वो शानदार अभिनेता थे. लेकिन मेरे पसंदीदा अभिनेता दिलीप कुमार थे.

नए अभिनेताओं में आपको कौन पसंद हैं?

कई सारे अभिनेता बहुत अच्छे हैं. इरफ़ान ख़ान. मैंने मक़बूल में उन्हें देखा है. ज़बर्दस्त अभिनय किया है. नसीरुद्दीन शाह, अनुपम खेर भी हैं, लेकिन इस पीढ़ी में इरफ़ान बहुत प्रभावशाली हैं.

और अभिनेत्रियों में कौन पसंद है?

प्रीति ज़िंटा. दीपा मेहता की फ़िल्म ‘हैवन ऑन अर्थ’ में उनका अभिनय बेहतरीन था. मैंने उनकी पहले भी कई फ़िल्में देखी हैं, लेकिन उस फ़िल्म में उनका अभिनय शानदार था. इसके अलावा, हमारी भतीजी नंदना सेन भी अच्छी कलाकार हैं.

हाल की कोई फ़िल्म जो आपको अच्छी लगी हो?

ओम शांति ओम देखी, लेकिन बहुत अच्छी नहीं लगी. तारे ज़मीं पर मैं नहीं देख सका. मुझे मारधाड़ वाली फ़िल्में पसंद नहीं हैं. ‘रंग रसिया’, ‘चक दे इंडिया’ भी मुझे पसंद आई.

क्रिकेट में कुछ दिलचस्पी है?

मैं निचले स्तर पर क्रिकेट खेलता था. टेलीविज़न पर क्रिकेट देखने का लुत्फ़ उठाता हूँ. इस बार का एशेज बहुत शानदार रहा लेकिन मैं कहूँगा कि क्रिकेट खेलने में जो मजा आता है, वो देखने में नहीं आता.

क्रिकेट के अलावा और कौन सा खेल खेलते थे?

मैं टेबल टेनिस खेलता था. जब मैं बंबई में रहता था तो बैडमिंटन खेला करता था. एक-दो टूर्नामेंट में भी खेला. लेकिन जब मैं कॉलेज गया तो वहाँ नंदू नाटेकर थे, वो चैंपियन थे. इसलिए उनके सामने तो हम खेल नहीं पाए.

आपने बताया कि आपको खाने का भी शौक है. क्या पसंद है आपको?

मैंने दुनिया की सभी किस्मों के खाने खाए हैं. सिर्फ़ हिंदुस्तानी ही नहीं, अमरीकन, ब्रितानी, थाई, वियतनामी, इटेलियन सभी तरह के व्यंजन. ख़ास बात ये है कि मैं इन्हें बना भी लेता हूँ. गुजराती कढ़ी मुझे बहुत पसंद है और मैं इसे बनाता हूँ.

घूमने की आपकी पसंदीदा जगह?

वैसे तो समय नहीं मिलता. लेकिन गोवा में हमने एक घर लिया है. समुद्र से कुछ दूर है. सबसे पुराने पुर्तगाली गांव लोतोलिम में घर लिया है.

तो किसी ख़ास प्लानिंग से वहाँ घर लिया या?

नहीं. ऐसा कुछ नहीं था. गोवा जाता रहता था. 2004 में एक फ़िल्म महोत्सव में मैं पहली बार गोवा गया था. मुझे पसंद आया. फिर मैं 2006 में वहाँ गया, एक पखवाड़ा बिताया और घर ख़रीद लिया.

आपके चाहने वालों को आपसे भविष्य में क्या उम्मीदें करनी चाहिए?

बहुत सारी किताबें. मेरा पहला उपन्यास ‘बैड ऑन टाइम’ प्रकाशित हो गया है. दूसरी बड़ी किताब ‘री डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ अक्तूबर में प्रकाशित हो जाएगी. इस किताब का विषय इतिहास है. अगर भारत एक राष्ट्र है तो क्यों है. हमने ब्रितानियों को जो कहानी बताई कि हम क्यों एक हैं, वो कहानी अब नहीं चलती. एक नज़रिया तो नेहरू जी का था कि हिंदु-मुस्लिम, गंगा-जमुनी संस्कृति के कारण ये भारत एक है.

मेरा ये मानना है कि ये सब उदाहरण उत्तर भारत के लिए दिए गए हैं. मेरा मानना है कि इसमें दक्षिण भारत कहीं नहीं है. इसमें असम, नागालैंड नहीं है. राष्ट्रगान में असम का नाम भी नहीं है. हमने जो 62 साल में बनाया है, वो ही भारत राष्ट्र है. उससे पहले सिर्फ़ बातें थी. जो नागरिकता है, लोकशाही है. कितने भी भिन्न-भिन्न मत हों, लेकिन इसके बावजूद हम भारत को राष्ट्र बना रहे हैं.

बीबीसी एक मुलाक़ात में आगे बढ़ें, आपकी पसंद के गाने?

पाकीज़ा का गाना ‘चलते-चलते’, कभी-कभी का गाना ‘कभी-कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है’, ‘प्यार किया तो डरना क्या’ पसंद है. दिल्ली-6 का गाना ‘मसक कली कली’ पसंद है. इसके अलावा ‘कभी-कभी अदिति’ भी मुझे पसंद है.

आप गाते भी हैं?

‘कभी-कभी.....’. हमारे ज़माने में रोमांस का एक ही तरीक़ा था. गाना गाना. तब लड़की का हाथ पकड़कर तो चल नहीं सकते थे.

आपके बालों को लेकर कभी कोई दिलचस्प वाकया?

पहला तो ये कि मेरे बालों के चलते लोग मुझे डॉन किंग (मुक्केबाज़) कहते हैं. दूसरा ये कि जब हमारे दोस्त और लेबर पार्टी के नेता नील कणक ने लॉर्डशिप के लिए मेरे नाम की सिफ़ारिश की तो कहा कि इससे ये फ़ायदा होगा कि एशियाइयों के साथ-साथ अफ़्रीकी भी खुश हो जाएँगे, क्योंकि आपकी शक्ल अफ़्रीकी है और आप हैं एशियाई.

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