भाजपा के जहाज़ में कई छेद

बीजेपी का जहाज़ जैसे तूफ़ान में फंस गया है. कप्तान और उसकी टोली पानी को अंदर घुसने से रोकने के लिए एक छिद्र बंद करते हैं तो पानी अंदर आने का कोई दूसरा रास्ता ढूंढ लेता है.

Image caption भाजपा के सामने कई चुनौतियाँ हैं.

पहले राजस्थान और वसुंधरा राजे, फिर जसवंत सिंह और उसके बाद कुलकर्णी और अब अरुण शौरी, और आगे न जाने कौन.

भारतीय राजनीति में बवंडर, तूफ़ान, भूकंप इत्यादि कोई नई बात नहीं है. 100 से ज़्यादा जिस पार्टी के पास सांसद हों, प्रमुख विपक्षी दल हो और कई राज्यों में सरकारें भी हों, बीजेपी की हालत जितनी भी दयनीय लग रही हो, उसका जहाज़ आसानी से डूबने वाला नहीं है.

पार्टी की असली परेशानी इस समय अरुण शौरी, वसुंधरा या जसवंत सिंह की ‘अनुशासनहीनता’ नहीं बल्कि पार्टी में सक्षम नेतृत्व और निश्चित दिशा का अभाव होना है.

बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री ने पार्टी की तुलना मुगलिया साम्राज्य के अंतिम चरण से की और कहा कि सल्तनत की सीमाएं तो सिमटती जा रही हैं, पर लगता है कि बची-खुची खुरचन और पदों के लिए पार्टी के क्षत्रपों ने आपस में ही बंदरबांट कर रखा है.

बीजेपी से जुड़े प्रेक्षकों और पार्टी के एक वर्ग का मानना है कि बीजेपी को इस समय छह नेताओं का एक ऐसा गुट चला रहा है जिनमें से अधिकांश का कोई खास जनाधार नहीं है. जिनका थोड़ा बहुत जनाधार है भी, उनके भी राजनीतिक क़द में पिछले वर्षों में गिरावट ही आई है.

आडवाणी की दिक्क़त

Image caption आडवाणी में अब वो संगठन क्षमता नहीं रही

इस छकड़ी में सबसे ऊपर हैं नेता प्रतिपक्ष और बीजेपी में अटल बिहारी के बाद सबसे बड़े कद के नेता लाल कृष्ण आडवाणी. आडवाणी की बीजेपी को बनाने संवारने में जो भूमिका रही है उससे उनका सबसे बड़ा आलोचक भी इनकार नहीं कर सकता.

पर साथ ही आडवाणी के सबसे प्रबल समर्थक भी कहीं न कहीं मन में जानते हैं कि वो पार्टी का भविष्य नहीं हो सकते और अगले पाँच वर्षों तक बीजेपी और संसद में प्रतिपक्ष के नेता रह विपक्ष और बीजेपी में नई ऊर्जा का संचार नहीं कर सकते.

और अब तो आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने ये कह दिया है कि आडवाणी नेता प्रतिपक्ष के पद पर बने रहें, ये सुझाव आरएसएस या उनकी तरफ़ से नहीं दिया गया था.

इशारा आरएसएस का भी साफ़ है. आडवाणी जी का पार्टी को सक्रिय नेतृत्व प्रदान करने का समय अब चला गया है. वो अब कंपनी के सिद्धांत तय करने वाले पर काम नहीं करने वाले चेयरमैन रह सकते हैं प्रबंध निदेशक नहीं.

कभी राजनीतिक टाइमिंग के माहिर समझे जाने वाले आडवाणी जी को भी समय का इशारा समझना चाहिए और दूसरी पंक्ति के नेतृत्व को आगे आने का मौका देना चाहिए. कुछ हद तक वो ऐसा कर भी रहे हैं और बीजेपी को चला रहे छह के गुट में उनके चार अनुयायी है.

जनता से दूर नेता

Image caption जेटली जैसे नेता जनता से दूर हैं और चुनाव न लड़ने वाले नेता हैं.

सुषमा स्वराज जिन्हें पार्टी का एक तबका लोकप्रिय नेता और सशक्त वक्ता की तरह देखता है, पर हरियाणा से आने वाली और दिल्ली को अपना शहर बना चुकी सुषमा जी को चुनाव जीतने मध्य प्रदेश जाना पड़ता है.

अरुण जेटली जनता से छोड़िए पार्टी कार्यकर्ताओं से भी सीधे मुँह बात नहीं करते. वो देश से मुखातिब सिर्फ़ कुछ टीवी चैनलों के ज़रिए ही होते हैं और चुनाव लड़ने से उन्हें तो खासा परहेज़ है.

वेंकैया नायडू, जिन्होंने एक लंबे अरसे से पार्टी का आंध्र प्रदेश से सूपड़ा साफ़ करवा रखा है और अनंत कुमार जिनकी चर्चा काफ़ी समय से राजनीतिक कौशल के लिए कम और चुनावी प्रबंधन के लिए अधिक होती है.

इन चारों ही नेताओं के जनाधार में कमी इन्हें आडवाणी के प्रति वफ़ादार रखती है और कुछ उखाड़-पछाड़, छिटपुट अहम और पदों के संघर्ष के बावजूद एक दूसरे से जोड़े रखती है.

पर बीजेपी और आरएसएस के एक महत्वपूर्ण तबके का मानना है कि इन तिलों में तेल नहीं है आडवाणी जी और उनकी इस चौकडी के हाथों में बीजेपी का भविष्य बहुत उज्जवल नहीं है.

छह के गुट के आखिरी नेता बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह हैं जिनके कार्यकाल में पार्टी की हालत ना सिर्फ़ देश में बल्कि उनके गृह राज्य उत्तर प्रदेश में बद से बदतर हुई है.

आगे की दशा और दिशा

Image caption आरएसएस भी युवा नेतृत्व लाने के पक्ष में है.

पार्टी के एक तबके का मानना है कि नए नेतृत्व की तलाश में बीजेपी और आरएसएस उन राज्यों की ओर देखें जहाँ पार्टी की सरकारें दोबारा जीतकर आई हैं. मसलन शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह और नरेंद्र मोदी.

नेतृत्व तो एक मुद्दा है. उससे जुड़ा हुआ है सही आत्मचिंतन का सवाल और आगे की दशा और दिशा निर्धारित करने का मामला.

पार्टी के एक बड़े नेता का कहना था कि बीजेपी ने सबसे बड़ी भूल 2004 की चुनावी हार को महज़ एक राजनीतिक एक्सीडेंट मान कर की. उससे सीखते तो 2009 की हार शायद नहीं होती.

और अब ये हार इतनी ज़बरदस्त है कि उससे कुछ सीखने या सही और ईमानदार निष्कर्ष निकालने की पार्टी नेतृत्व में हिम्मत ही नहीं रह गई है.

बीजेपी और आरएसएस के इस तबके का मानना है कि 2009 के चुनावी नतीजों का सबसे ईमानदार और पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से घातक निचोड़ यह है कि उनका वोट बैंक ही जैसे वापस कांग्रेस की तरफ़ लौट रहा है.

बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता का कहना था कि कर्नाटक को अगर छोड़ दें तो पार्टी पहले ही दक्षिण और पूर्वी भारत में कोई ज़्यादा प्रासंगिक नहीं है.

फिर मित्र दलों के साथ मिलकर भी पार्टी 400 से ज़्यादी सीटों से चुनाव नहीं लड़ती. करीब 15 फीसदी जनसंख्या यानि मुस्लिम मतदाता बीजेपी के साथ हैं ही नहीं.

फिर पार्टी का कोर वोटबैंक यानि उच्च जातियाँ भी अगर कांग्रेस की तरफ़ लौट गईं और दलित वोट में सेंध मारने की पार्टी की कोशिश असफ़ल रही तो बीजेपी क्या एक बार फिर सिर्फ़ बनियों की पार्टी रह जाएगी?

बीजेपी समर्थकों का कहना है कि पार्टी नेतृत्व इन असली मुद्दों पर चर्चा करने के बजाए ध्यान बटाने के लिए कभी जसवंत सिंह तो कभी अरुण शौरी पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही है.

इससे पार्टी का उद्धार संभव नहीं.

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