संघ का है साथ, तो फिर क्या बात

Image caption कितने पास, कितने दूर

भारतीय जनता पार्टी के अन्दर चल रही उठापटक से दल के आम कार्यकर्त्ता बहुत निराश हैं, मगर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह विचलित नही हैं. उनका कहना है कि जल्दी ही सब कुछ ठीक हो जाएगा.

फ़िलहाल वो पार्टी की अंदरूनी राजनीति पर ज़्यादा बात करने के मूड में नही हैं. वो कहते हैं बस देखते रहिये और इंतज़ार कीजिए. फिर गणेश जी की फोटो की तरफ़ हाथ जोड़कर कहते हैं, मुझे इन पर भरोसा है सब ठीक हो जाएगा.

यहाँ तक कि अरुण शौरी की अत्यधिक चोट करने वाली आलोचना पर भी वह खामोश हैं. 'इससे आपको क्या परेशानी हैं?' उन्होंने सवाल करने वाले पत्रकारों से ही पलट कर पूछा.

राजनाथ सिंह पार्टी की दिवंगत नेता सीमा रिज़वी के घर श्रद्धांजलि देने लखनऊ आए थे. मगर एक रात वहां रूक कर उन्होंने पार्टी नेताओं से मुलाक़ात करके उनकी नब्ज़ टटोलने की कोशिश की.

उनके एक करीबी सूत्र ने बताया कि वास्तव में अरुण शौरी का निशाना तो लाल कृष्ण आडवाणी और उनके ख़ास अरुण जेटली हैं . इसलिए फ़िलहाल राज नाथ अरुण शौरी के खिलाफ किसी कार्रवाई के मूड में नही हैं.

राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश में जिस तरह कल्याण सिंह, कालराज मिश्र , लालजी टंडन , केशरी नाथ त्रिपाठी और ओम प्रकाश सिंह आदि को किनारे लगाकर आगे बढ़े हैं उससे उनके समर्थक आश्वस्त हैं कि दिल्ली की लड़ाई में भी आख़िर में वही विजयी होंगे.

यह किसी से छिपा नही है कि उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री रह चुकने के बाद राजनाथ सिंह की निगाह प्रधानमंत्री की कुर्सी पर है और जब तक वह नही मिलती तब तक लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर उनकी निगाह है.

आरएसएस राजनाथ के साथ

इसीलिए लोकसभा चुनाव के दौरान और उसके बाद भी दिल्ली में राजनाथ और लालकृष्ण आडवाणी के बीच लगातार उठापटक चल रही है. समझा जाता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शीर्ष पर चल रही इस लड़ाई में पूरी तरह से राजनाथ सिंह के साथ है.

संघ प्रमुख इशारों में कह चुके हैं कि अगर आडवाणी अपने इस्तीफे पर कायम रहते तो ठीक रहता.

राजनाथ सिंह के करीबी लोगों के अनुसार अगर संघ की चलेगी तो राजनाथ सिंह अगले कुछ महीनों में लोकसभा में पार्टी के नेता हो सकते हैं या फिर उन्हें ही दोबारा अध्यक्ष बना दिया जाएगा.

राजनाथ को दोबारा अध्यक्ष बनाने के लिए पार्टी संविधान में संशोधन करना पडेगा. जसवंत सिंह के जाने के बाद अब सुषमा स्वराज ही लोक सभा में राजनाथ की मुख्य प्रतिद्वंदी बची हैं और उनकी तुलना में राजनाथ का कद बड़ा माना जाता है. हाल ही में भाजपा आलाकमान ने जो भी फैसले लिए हैं वह सब संघ के इशारे पर या उसके अनुकूल ही माने जाते हैं.

चाहे उत्तरांचल के मुख्यमंत्री पद से भुवनचन्द्र खंडूरी का हटाना हो या राजस्थान में वसुंधरा राजे पर इस्तीफे का दबाव या जसवंत सिंह का निष्कासन. इन सबसे साबित होता है की अब भाजपा में आडवाणी कितने कमजोर होते जा रहे हैं.

संघ की दृष्टि में जसवंत सिंह, अरुण शौरी या सुधींद्र कुलकर्णी जैसे लोग उसकी विचारधारा या कैडर के लोग नही हैं, इसलिए उनकी बगावत का बहुत ज्यादा महत्व संघ के लिए नही है, भले ही पब्लिक में इससे पार्टी की छवि कितनी ही ज्यादा ख़राब क्यों न हो.

कहा जा रहा है कि ये लोग भद्रलोक हैं और इनका ऐसा जनाधार नही कि इनके नाम पर गाँव देहात में वोट मिले.

भाजपा सूत्र कहते हैं कि संघ को एक ऐसा नेता चाहिए जो आडवाणी की जगह ले सके. उत्तर भारत में फ़िलहाल ऐसा कोई दूसरा नेता अभी नजर नही आता.

लोक सभा का पिछला चुनाव जीतकर राजनाथ सिंह ने अपने उन आलोचकों का मुंह भी बंद कर दिया है कि वह जनता से सीधे चुनाव नहीं जीत सकते.

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