लोकप्रिय और मिलनसार वाईएसआर

वाईएस राजशेखर रेड्डी
Image caption मुस्कुराते और मिलनसार वाईएस राजशेखर रेड्डी आस-पास के लोगों का ध्यान रखते थे

वाईएस राजशेखर रेड्डी को पिछले लगभग 25 वर्षों से काफ़ी नज़दीक़ से जानने और समझने के बाद मेरे लिए ये विश्वास करना काफ़ी मुश्किल और दुखद था कि वह नहीं रहे.

उन्हें लोग वाईएसआर के नाम से जानते थे. सफ़ेद धोती-कुर्ते में मुस्कुराते और मिलनसार वाईएसआर अपने आस-पास के लोगों का ख़ास तौर पर ध्यान रखते थे.

राज्य के राजनीतिक परिदृश्य से वो अचानक जिस तरह चले गए वो पिछले 30 वर्षों में उनके धीरे-धीरे हुए उदय के बिल्कुल ही विपरीत था.

राजनीतिक हिंसा और गुटबाज़ी का शिकार कडप्पा ज़िले के एक मध्यमवर्गीय परिवार से आए रेड्डी ने राजनीतिक जीवन की शुरुआत में ही सफलता का स्वाद चख लिया था. 1978 में पहली बार विधान सभा चुनाव जीतने के बाद उन्हें मंत्री बनाया गया था.

मगर मेरी उनसे पहली मुलाक़ात हुई थी 1983 में जबकि एनटी रामाराव के हाथों कांग्रेस को राज्य में बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा था और उस समय इंदिरा गाँधी ने वाईएसआर को पार्टी का नेतृत्त्व सौंप दिया था.

उस समय लोग समझते थे कि एनटी रामाराव के सामने वाईएसआर टिक नहीं पाएँगे मगर रेड्डी को अपने पर पूरा भरोसा था.

युवा और लोकप्रिय

रेड्डी 1980 में युवा नेता के रूप में आगे बढ़े और 1990 के दशक में उन्हें पार्टी के अन्य नेताओं से विरोध का भी सामना करना पड़ा मगर वर्ष 2000 तक वो एक परिपक्व नेता हो चुके थे जो कि पिछले तीन दशक में राज्य में कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय नेता भी साबित हुए.

बतौर एक पत्रकार मुझे राजनीति में उनके विकास को काफ़ी नज़दीक़ से देखने का मौक़ा मिला.

उनके मिलनसार स्वभाव का पता मुझे तब चला जब 1992 में तब के प्रधानमंत्री नरसिंह राव कांग्रेस पार्टी की एक बैठक में शामिल होने आए थे.

बैठक से जब मैं निकल रहा था तो अचानक मेरे कंधे पर किसी का हाथ आया और किसी ने मेरी पीठ पर एक थपकी दी. मैंने घूमकर देखा तो राजशेखर रेड्डी मुस्कुरा रहे थे.

वो यूँ तो कम ही बोलते थे मगर मिलते काफ़ी गर्मजोशी से थे. उन्होंने पूछा, "कैसे हैं आप, क्या चल रहा है?"

बतौर एक राजनेता उनकी जो एक कड़क छवि थी व्यक्तिगत स्तर पर वो उससे कहीं अलग थे.

पिछले कुछ वर्षों में रेड्डी ने अपनी जो भी छवि बनाई उसकी शुरुआत हुई 2003 से. उनकी प्रतिबद्धता लोगों के सामने तब आई जब उन्होंने चिलचिलाती गर्मी में भी पूरे राज्य की 1600 किलोमीटर की यात्रा की.

अनुभव और राजनीति

तटवर्ती आंध्र प्रदेश तक जब वह पहुँचे तो उनका चेहरा झुलसा हुआ था, उन्हें लू लग चुकी थी, पानी की क़मी हो रही थी और न जाने कितनी तरह की परेशानियाँ.

Image caption एनटी रामाराव के हाथों कांग्रेस की हार के बाद इंदिरा गाँधी ने राजशेखर रेड्डी को कमान सौंपी थी

डॉक्टरों ने उन्हें यात्रा आगे न बढ़ाने की सलाह दी मगर फिर भी वह श्रीकाकुलम् तक बढ़ते ही गए.

मई 2004 में मुख्यमंत्री बनने के बाद जब उन्होंने साक्षात्कार दिया तब कहा, "जीवन की कड़वी सच्चाइयों और ग़रीबों की मुश्किलों के प्रति उस पदयात्रा ने मेरी आँखें खोल दीं."

उस अनुभव के बाद ही मैंने कई कल्याणकारी योजनाएँ शुरू कीं जिनमें ग़रीबों को मुफ़्त बिजली, सस्ता चावल और कमज़ोर तबके के लोगों को बढ़ी हुई पेंशन जैसी चीज़ें शामिल थीं.

वादा निभाना, दोस्तों को न भूलना और दुश्मनों को माफ़ नहीं करना- रेड्डी के ये कुछ ऐसे गुण थे जो उन्हें बाक़ी राजनेताओं से अलग खड़ा करते थे.

चुनाव में किया हर वादा उन्होंने निभाया और भले ही कितने भी छोटे कार्यक्रम में उन्होंने जाने का वादा किया हो वो वहाँ पहुँचे ज़रूर.

मेडिकल कॉलेज के अपने दोस्त केवीपी रामचंद्र राव के प्रति उनकी दोस्ती जहाँ जग जाहिर थी तो साथ ही उन्होंने चंद्रबाबू नायडू या राज्य में मीडिया जगत के बादशाह रामोजी राव जैसे प्रतिद्वन्द्वियों को बख़्शा भी नहीं.

विरासत

मगर अन्य राजनेताओं से उनकी जो चीज़ मेल खाती थी वो थी उनके एकमात्र बेटे जगन मोहन रेड्डी के प्रति उनका प्रेम. वह चाहते थे कि जगमोहन उनकी राजनीतिक विरासत सँभालें. उन्होंने उन्हें इस बार के लोकसभा चुनाव में जितवा भी दिया मगर वो सपना पूरा नहीं हो सका.

लोग उन्हें कैसे याद करेंगे? इतिहास उन्हें कैसे याद रखेगा?

अगर पिछले छह वर्षों के आधार पर इसका फ़ैसला होना होगा तो उन्हें ग़रीबों के मसीहा के तौर पर याद किया जाएगा. एक बार जब मैं उनके घर से लौट रहा था तो एक ऑटो ड्राइवर कृष्णा ने मुझसे कहा था, "मेरे जैसे ग़रीबों के लिए वो भगवान की तरह हैं. मेरे घर की दो महिलाएँ सिर्फ़ इसीलिए ज़िंदा हैं क्योंकि उन्हें बड़े अस्पतालों में मुफ़्त इलाज मिल गया."

मगर उनकी अचानक इस तरह हुई मौत से मेरे जैसे आम नागरिक को झटका ज़रूर लगा है.

अभी कुछ ही समय पहले मैंने अपने एक साथी से कहा था, "मुख्यमंत्री की गद्दी पर चंद्रबाबू नायडू हों या वाईएसआर आंध्र प्रदेश भाग्यशाली है कि उसे पास युवा, स्वस्थ और सक्रिय नेतृत्त्व है और एक आम आदमी के तौर पर मैं इससे काफ़ी राहत महसूस करता हूँ."

वो राहत शायद अब नहीं रही.

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